नेपाल के Gen-Z के साथ फिर बड़ा धोखा हो गया क्या?

By संतोष कुमार पाठक | Sep 13, 2025

नेपाल और नेपाल जैसे कई लोकतांत्रिक देशों में युवाओं के साथ लगातार छल होता रहा है। कई देशों में युवाओं ने सड़क पर उतर कर अपने साथ किए गए धोखे का जवाब भी देने की कोशिश की लेकिन विडंबना देखिए कि एक लंबी लड़ाई लड़ने के बावजूद भी युवाओं के हाथ अंत में खाली ही रह जाते हैं। नेपाल के ज्यादातर युवा आंदोलनकारी अपने आपको अब इसी स्थिति में महसूस कर रहे हैं।

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नेपाल की सड़कों पर उतर कर हंगामा करने वाले Gen-Z प्रदर्शनकारियों की मुख्य मांगों में भ्रष्टाचार पर लगाम लगाना, राजनीतिक अव्यवस्था एवं भाई-भतीजावाद को खत्म करने के साथ ही सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर लगे प्रतिबंध को हटाना था। लेकिन सड़कों पर उतरे युवा एक सुर में कह रहे थे कि उन्होंने अपने देश में बुजुर्ग नेताओं से तंग आकर आंदोलन किया है।

नेपाली युवा एक सुर में सत्ता सुख भोग रहे या सत्ता सुख भोग चुके नेताओं को पूरी तरह से हटा देना चाहते थे। लेकिन क्या वाकई उनकी यह मंशा पूरी हुई ? नेपाल में शांति स्थापित करने के नाम पर पूर्व मुख्य न्यायाधीश सुशीला कार्की को अंतरिम सरकार के प्रधानमंत्री के रूप में सत्ता सौंप दी गई है।

आपको बता दें कि, 7 जून 1952 को जन्मी सुशीला कार्की, नेपाल के सर्वोच्च न्यायालय की प्रथम महिला मुख्य न्यायाधीश रह चुकी हैं। प्रधानमंत्री पद की शपथ लेते ही, वह नेपाल की पहली महिला प्रधानमंत्री बन गई हैं। लेकिन बुजुर्ग नेताओं से त्रस्त नेपाल को शांति स्थापित करने के नाम पर 73 वर्ष की एक नई प्रधानमंत्री के हाथों में सौंप दिया गया है। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल तो यही खड़ा हो रहा है कि क्या 73 वर्ष की सुशीला कार्की नेपाल के Gen-Z प्रदर्शनकारियों के साथ न्याय कर पाएंगी? उनकी परेशानियों और दिक्कतों को समझ कर, दूर कर पाएंगी ? अगर सिर्फ चुनाव करा देना ही समस्या का समाघान होता तो नेपाली युवाओं को सड़कों पर क्यों उतरना पड़ता? यह भी ध्यान रखिएगा कि जो भी व्यक्ति (भले ही वह किसी भी पद पर रहा हो) सत्ता प्रतिष्ठान का हिस्सा रहा हो वो उस व्यवस्था में कभी भी बड़ा और व्यापक बदलाव नहीं ला सकता है।

सबसे बड़ी बात तो यह है कि इतने बड़े बवाल के बावजूद बुजुर्ग नेताओं के रवैए में कोई बड़ा बदलाव देखने को नहीं मिल रहा है। ये सब आज भी अपने-अपने राजनीतिक दलों पर कब्जा जमाए बैठे हैं और अभी से इन्होंने बदलाव का विरोध करना शुरू कर दिया है।

नेपाल के राष्ट्रपति राम चंद्र पौडेल ने शुक्रवार शाम को सुशीला कार्की को शीतल निवास में अंतरिम प्रधानमंत्री के तौर पर पद और गोपनीयता की शपथ दिलाई। राष्ट्रपति पौडेल ने संविधान के अनुच्छेद 61 के तहत कार्की को प्रधानमंत्री नियुक्त किया है। 2015 में नए संविधान के लागू होने के बाद से सभी पिछली सरकारें अनुच्छेद 76 के तहत गठित हुई थीं लेकिन पहली बार अनुच्छेद 61 के तहत कार्की को नेपाल का प्रधानमंत्री बनाया गया है। राष्ट्रपति कार्यालय की तरफ से यह भी बताया गया है कि अंतरिम प्रधानमंत्री को छह महीने के भीतर देश में चुनाव कराने का निर्देश दिया गया है। गौर कीजिएगा, सुशीला कार्की के शपथ ग्रहण समारोह का नेपाल की संसद के दोनों सदनों के अध्यक्षों और सांसदों ने बहिष्कार किया। राष्ट्रपति भवन से निमंत्रण मिलने पर भी प्रतिनिधि सभा के स्पीकर देवराज घिमिरे और राष्ट्रीय सभा के अध्यक्ष नारायण दहल शपथ ग्रहण समरोह में नहीं पहुंचे। ध्यान रहे, घिमिरे केपी ओली की पार्टी के सांसद हैं जबकि दहल पूर्व प्रधानमंत्री पुष्प कमल दहल प्रचण्ड की पार्टी के नेता है। नेपाल के राजनीतिक दल या दूसरे शब्दों में कहें तो नेपाल के बुजुर्ग नेता संसद भंग के फैसले का विरोध कर रहे हैं। ऐसे में अगर 6 महीने के भीतर जब भी चुनाव होंगे तो यही राजनीतिक दल और यही नेता तो लड़ेंगे। चुनाव में किसी को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला तो यही बुजुर्ग नेता आपस में जोड़-तोड़ कर सरकार बनाएंगे और मिल कर नेपाल की जनता खासकर नेपाली Gen-Z के सपनों को रौंदते रहेंगे। नेपाल के Gen-Z ने नेताओं की संगठित लूट को फिर से देखने के लिए तो इतना बड़ा आंदोलन नहीं ही किया था।

सीतामढ़ी में पैदा होने के कारण, नेपाल और नेपाली लोगों से मेरा एक भावनात्मक लगाव भी है। राजा जनक का महल जनकपुर (नेपाल) में होने के कारण, हम मिथिला के लोग उसे अपना दूसरा घर भी मानते हैं। इसलिए, हमारी दिल से दुआ है कि नेपाल की नई अंतरिम प्रधानमंत्री सुशीला कार्की व्यवस्था बदलने के अपने मकसद में कामयाब हो सके। नेपाल में शांति और तरक्की, यह नेपाल के साथ-साथ भारत के हित में भी है।

- संतोष कुमार पाठक

लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं राजनीतिक विश्लेषक हैं।

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