अमेरिका से उठा भरोसा, ईरान से पिटने वाला कुवैत क्यों दौड़ा पाकिस्तान?

By अभिनय आकाश | Jul 29, 2026

मिडिल ईस्ट में चर्चा जोरों पर रही कि ईरान कुवैत में घुस जाएगा। अगर अमेरिका ने ईरान की जमीन पर कदम भी रखा तो ईरान इराक के रास्ते कुवैत में घुस जाएगा और अमेरिकी बेस पर कंट्रोल हासिल कर लेगा। कुवैत पर ईरान ने पिछले दिनों काफी बड़े और ताकतवर हमले अंजाम भी दिए थे। अब खबर आई है कि सऊदी की तरह कुवैत ने भी पाकिस्तान से डिफेंस डील कर ली है। कुवैत ने पाकिस्तान के साथ हुए रक्षा सहयोग समझौते को करीब 3 साल बाद आधिकारिक मंजूरी दे दी है। कुवैत के शाही फरमान के बाद अब यह समझौता लागू हो गया है। दोनों देशों के बीच इस डील पर 11 जून 2023 को ही हालांकि दस्तखत हो गए थे, लेकिन कानूनी दांव पेच पूरे होने में वक्त लग गया। अब कुवैत सरकार ने इसे अपने कानून का हिस्सा बना लिया है। 

कुवैत-पाकिस्तान रक्षा समझौते के मुख्य बिंदु:

संस्थागत ढांचा: यह समझौता कुवैत सशस्त्र बलों और पाकिस्तान सशस्त्र बलों के बीच एक व्यवस्थित और संस्थागत संबंध स्थापित करता है।

सहयोग के प्रमुख क्षेत्र: इसके तहत संयुक्त सैन्य प्रशिक्षण, सैन्य शिक्षा, खुफिया जानकारी साझा करना , लॉजिस्टिक्स, रक्षा प्रौद्योगिकी, अनुसंधान, इलेक्ट्रॉनिक्स संचार प्रणाली और सैन्य विशेषज्ञता का आदान-प्रदान शामिल है।

सैन्य निर्माण और तकनीक: इसमें सैन्य निर्माण और रक्षा प्रौद्योगिकी के विकास में आपसी सहयोग के प्रावधान शामिल हैं।

संयुक्त सैन्य समिति: समझौते की देखरेख और संचालन का जिम्मा एक 'संयुक्त सैन्य समिति' का होगा, जो संयुक्त युद्धाभ्यास, द्विपक्षीय यात्राओं और रक्षा आदान-प्रदान का प्रबंधन करेगी।

अवधि व नवीनीकरण: यह समझौता 5 साल के लिए मान्य है और यदि कोई भी देश इसे औपचारिक रूप से समाप्त करने का नोटिस नहीं देता है, तो इसका स्वचालित नवीनीकरण हो जाएगा।

सऊदी-पाक समझौते से अंतर: सितंबर 2025 के सऊदी-पाकिस्तान समझौते (SMDA) में किसी एक देश पर हमले को दोनों पर हमला मानने की स्पष्ट पारस्परिक रक्षा/सामूहिक सुरक्षा शर्त थी। इसके विपरीत, यह कुवैत-पाकिस्तान समझौता केवल एक रक्षा सहयोग समझौता है—यह सैन्य सहयोग, लॉजिस्टिक्स और प्रशिक्षण का ढांचा तो देता है, लेकिन किसी युद्ध स्थिति में स्वचालित सैन्य सहायता या युद्ध की गारंटी नहीं देता। 

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गौरतलब है कि मुस्लिम देशों के बीच पाकिस्तान की सेना काफी प्रोफेशनल मानी जाती है। रिटायरमेंट के बाद भी पाकिस्तानी जनरल कर्नल मिडिल ईस्ट में ही जमे रहते हैं, पड़े रहते हैं और वहां की फौजों को ट्रेंड करते रहते हैं। यह और बात है कि जब पानी सर से गुजरता है तो अरब देशों को अमेरिका ही बचाता है वो भी इसराइल की खातिर। खैर, कुवैत पाकिस्तान डील में कुल 12 पॉइंट शामिल हैं। इसमें दोनों देशों की सेनाओं के बीच सहयोग का ढांचा तय किया गया है। समझौते के तहत सैन्य प्रशिक्षण, रक्षा संस्थानों के बीच संपर्क, संयुक्त गतिविधियां और अनुभव साझा करने जैसे विषय शामिल हैं। इसके अलावा दोनों देश संवेदनशील सैन्य जानकारी की सुरक्षा और गोपनीयता बनाए रखने और रक्षा क्षेत्र से जुड़ी तकनीकी जानकारी को भी सुरक्षित रखने में सहमत हुए हैं। पाकिस्तान पहले से ही खाड़ी देशों के साथ सैन्य संबंध रखता है। कुवैत के साथ यह समझौता पाकिस्तान को अपनी सैन्य ट्रेनिंग और रक्षा विशेषज्ञता साझा करने का एक मौका देगा और कुवैत के लिए भी पाकिस्तान के साथ यह रक्षा सहयोग बहुत अहम है। खाड़ी क्षेत्र में बदलते सुरक्षा हालात के बीच यह जरूरी भी हो गया था। कुल मिलाकर 3 साल बाद लागू हुआ यह समझौता पाकिस्तान और कुवैत के बीच सैन्य सहयोग का नया रास्ता खोलता है और इस पूरे इलाके यानी गल्फ रीजन में बदलते सुरक्षा समीकरणों के बीच दोनों देशों की साझेदारी को मजबूत करेगा। 

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यहां एक बात नहीं भूलना चाहिए कि पाकिस्तान ने पिछले कुछ महीनों या यूं कहें कि सालों में खाड़ी क्षेत्र में अपना दखल बढ़ाया है। सऊदी अरब में स्थित सरकारी तेल कंपनी अरामको के अबक ऑयल प्रोसेसिंग प्लांट और पाइपलाइन के पंपिंग स्टेशन पर ड्रोन हमले के बाद भीषण आग लग गई है। सेटेलाइट आधारित सर्विलांस सिस्टम नासा फर्म्स की सेटेलाइट तस्वीरों में संयंत्र के आसपास बड़े पैमाने पर आग लगी दिखी जिससे ऑयल सेंटर को नुकसान पहुंचने की बड़ी आशंका जताई जा रही है। हालांकि सऊदी अधिकारियों ने नुकसान का आकलन अभी सार्वजनिक नहीं किया है। लेकिन घटना ने दुनिया के सबसे अहम ऊर्जा केंद्रों में से एक की सुरक्षा को लेकर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। ये दुनिया का सबसे बड़ा क्रूड ऑयल स्टेबलाइजेशन प्लांट माना जाता है। यहां सऊदी अरब के बड़े हिस्से का कच्चा तेल निर्यात से पहले प्रोसेस्ड किया जाता है। अनुमान है कि यह संयंत्र वैश्विक तेल आपूर्ति के लगभग 5 से 7% हिस्से की प्रोसेसिंग से जुड़ा है। ऐसे में यहां किसी भी प्रकार की बाधा का असर अंतरराष्ट्रीय तेल बाजार पर पड़ सकता है। जानकार मानते हैं कि अगर संयंत्र की उत्पादन क्षमता लंबे समय तक प्रभावित रहती है तो कच्चे तेल की कीमतों में तेजी से और वैश्विक आपूर्ति पर दबाव बन सकता है। 

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