By प्रभासाक्षी न्यूज़ डेस्क | Sep 12, 2026
कांग्रेस द्वारा उत्तराखंड सरकार पर 7000 बीघा जमीन निजी निवेशकों को दिए जाने के आरोपों को पूरी तरह गलत बताते हुए प्रदेश भाजपा अध्यक्ष महेंद्र भट्ट ने कहा कि उत्तराखंड निवेश एवं अवसंरचना विकास बोर्ड (यूआईआईडीबी) के नाम पर फिलहाल केवल 18 हेक्टेअर भूमि है जिसका इस्तेमाल आर्थिक गतिविधियों के लिए किया जाना है। कांग्रेस पर चुनावी लाभ के लिए झूठे, बेबुनियाद आरोप लगाकर जनता में भ्रम फैलाने की कोशिश करने का आरोप लगाते हुए भट्ट ने कहा कि यूआईआईडीबी तय नियमों के अनुसार जमीन हासिल कर रहा है और अनुपयोगी जमीनों का निवेश एवं रोजगार सृजन की दृष्टि से आर्थिक प्रबंधन किया जाएगा। प्रदेश भाजपा अध्यक्ष ने यहां जारी एक बयान में कहा, ‘‘यूआईआईडीबी के नाम पर अभी सिर्फ 18 हेक्टेयर भूमि है।
उन्होंने कहा कि देश में सूचना प्रोद्यैगिकी, डाटा सेंटर, सेमी कंडक्टर चिप इंडस्ट्री, ऑटो मोबाइल आदि क्षेत्रों की दुनिया भर की दिग्गज कंपनियां निवेश करने आ रही हैं जबकि खुद कांग्रेस की तेलंगाना और कर्नाटक सरकारों में निवेश के लिए उद्योग लाए जा रहे होंगे। उन्होंने पूछा कि क्या ये उद्योग अपने साथ जमीन बाहर से लेकर आ रहे हैं, इसका ज़बाब होगा नहीं क्योंकि उन्हें निवेश को संसाधन वहां की कांग्रेस सरकारें ही उपलब्ध करा रही होगी। राज्यसभा सदस्य भटट ने कहा कि लगातार पराजय से कांग्रेस बौखलाई हुई है और यही वजह है कि उन्हें राज्य में हो रहा विकास हजम नहीं हो रहा है।
हालांकि, उन्होंने कहा कि प्रदेश में विकास की रफ्तार और तरक्की को जनता अनुभव कर रही है तथा उसे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के मार्गदर्शन और मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व वाली सरकार की नीतियों पर पूरा भरोसा है। उन्होंने कहा, ‘‘ राज्य की सवा करोड़ जनता इस भरोसे को बार-बार जता चुकी है और 2027 में भी तस्वीर यही रहने वाली है।’’ इससे पहले दिन में कांग्रेस ने मुख्यमंत्री पर प्रॉपर्टी डीलर की तरह काम करने का आरोप लगाते हुए कहा था कि सरकार ने उद्यान विभाग सहित विभिन्न विभागों की खाली अथवा कम उपयोग वाली करीब 7,000 बीघा सरकारी जमीन का भूमि बैंक तैयार किया है जिसे निजी निवेशकों को 90 साल तक की लीज पर देने की योजना है। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष गणेश गोदियाल और पार्टी की चार्जशीट समिति के अध्यक्ष करन माहरा ने आरोप लगाया कि योजना के तहत यूआईआईडीबी के माध्यम से राज्य की बेशकीमती जमीनों को चुनिंदा कारपोरेट कंपनियों को सौंपने की कोशिश की जा रही है।