हिजाब विवादः सिर्फ औरतें चेहरा क्यों छिपाएँ?

By डॉ. वेदप्रताप वैदिक | Feb 19, 2022

कर्नाटक के उच्च न्यायालय में हिजाब के मुद्दे पर अभी बहस जारी है लेकिन अंतरराष्ट्रीय इस्लामी सहयोग संगठन (ओआईसी) ने भारत के खिलाफ अपना बयान जारी कर दिया है। उसने पहले धारा 370 हटाने के विरोध में भी बयान जारी किया था। पाकिस्तान के मुल्ला-मौलवी और नेता भी एकतरफा बयान जारी करने में एक-दूसरे से आगे निकल रहे हैं। कर्नाटक की अदालत में हिजाब का पक्ष रखनेवाले वकील हिंदू हैं और वे जो तर्क दे रहे हैं, वे ऐसे हैं, जिन पर खुले दिमाग से विचार किया जाना चाहिए। उनका तर्क यह है कि जब हिंदू औरत के सिंदूर, बिंदी और चूड़ियों, सिखों की दाढ़ी-मूंछ और पगड़ी तथा ईसाइयों के क्रॉस पहनने पर कोई प्रतिबंध नहीं है तो मुस्लिम महिलाओं के बुर्के और हिजाब पर प्रतिबंध की क्या तुक है? क्या ऐसा करना पूर्णतः सांप्रदायिक कदम नहीं है? क्या यह इस्लाम और मुसलमानों पर सीधा आक्रमण नहीं है? हिजाब के बहाने यह मुस्लिम लड़कियों को शिक्षा से वंचित करने का कुप्रयास नहीं है? ये तर्क बहुत वाजिब दिखाई पड़ते हैं लेकिन अभी कर्नाटक में हिजाब के सवाल ने जैसा सांप्रदायिक और राजनीतिक रुप धारण कर लिया है, यदि हम उससे ज़रा अलग हटकर सोचें तो यह मूलतः नर-नारी समता का सवाल है! यदि हिजाब धार्मिक चिन्ह है तो इसे औरतों के साथ-साथ मर्द भी क्यों नहीं पहनते? आजकल औरत और मर्द- सभी मुखपट्टी (मास्क) पहनते हैं, वैसे ही वे हिजाब भी पहन सकते हैं। सिर्फ औरतें ही क्यों हिजाब पहनें? उनका गुनाह क्या है? और फिर मुस्लिम औरतों को ही यह सजा क्यों है ? हिंदू और ईसाई औरतें भी इसे क्यों नहीं पहनें? हिजाब, बुर्का, घूंघट, सिंदूर, बिंदी, चूड़ी, भगवान दुपट्टा आदि इनमें से किसी भी चीज को पहनने का आदेश किसी ईश्वर, अल्लाह या अहुरमज्द का नहीं है। ये सब परंपराएं मुनष्यों की बनाई हुई हैं और ये देश-काल के मुताबिक चलती हैं।

- डॉ. वेदप्रताप वैदिक

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