संवाद और संचार की दुनिया में बज रहा हिंदी का डंका

By प्रो. संजय द्विवेदी | Jun 02, 2025

कोलकाता से 200 साल पहले जब पं. युगुलकिशोर शुक्ल ने हिंदी का पहला पत्र 30 मई, 1826 को प्रारंभ किया होगा, तो उन्होंने यह सोचा भी न होगा कि हिंदी पत्रकारिता देश की आवाज बन जाएगी।‌ वह इस महान देश के सपनों, आकांक्षाओं, संघर्षों, आंदोलनों, दुखों और आर्तनाद की सबसे प्रखर भाषा की वाहक बनेगी। हिंदी पत्रकारिता के पहले संपादक का सपना था, हमारी पत्रकारिता 'हिंदुस्तानियों के हित के हेत' हो। यह वाक्य उन्होंने अपने पहले संपादकीय में लिखा और हमें हमारा संकल्प बता दिया। हमारी कृतध्नता देखिए कि इस महान नायक की स्मृति में देश में कोई स्मारक नहीं है। न कोलकाता में, न ही उनकी जन्मस्थली पर। अपने पुरखों के प्रति हम कितने लापरवाही से भरे हुए हैं, उसका उदाहरण है कि शुक्ल जी का कोई चित्र हमारे पास नहीं है। इसलिए 'उदंत मार्तण्ड' का पृष्ठ लगाकर उन्हें याद करते हैं। हद तो तब हो गई जब दो-तीन वर्षों से युगल किशोर शुक्ल के नाम पर हिंदी पत्रकारिता दिवस पर अनेक अखबारों में साहित्यकार श्री शिवपूजन सहाय के चित्र छापे जा रहे हैं। आज भी गूगल में सर्च करने पर शुक्ल जी के नाम पर सहाय जी का चित्र आंखों के सामने तैरता है। मैंने भारतीय जन संचार संस्थान (आईआईएमसी) में अपनी पदस्थापना के दौरान वहां के पुस्तकालय और वाचनालय का नामकरण शुक्ल जी के नाम पर किया। वह देश में उनकी स्मृति में पहला स्मारक था। यह तो रही हमारी स्मृति हीनता की बात। लेकिन शुक्ल जी रोपा पौधा आज लहलहा रहा है। 

हिंदी पत्रकारिता देश की सबसे खास आवाज बन चुकी है। इसके साथ ही संचार और संवाद की हिंदी सबसे खास भाषा है। सिर्फ पत्रकारिता से नहीं अपने विविध माध्यमों पर उपलब्ध कंटेंट से हिंदी को बड़ा आधार मिला है।

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रजिस्ट्रार आफ न्यूजपेपर्स फार इंडिया (आरएनआई) 2024 की रिपोर्ट के मुताबिक भारत में 1 लाख, 47 हजार से अधिक पत्र-पत्रिकाएं पंजीकृत हैं, जिनमें 45 प्रतिशत हिंदी के हैं। इंडियन रीडरशिप सर्वे की मानें तो हिंदी अखबारों की पाठक संख्या 38 करोड़ से अधिक है। भारत में 750 से अधिक टीवी चैनल हैं , जिनमें 35 प्रतिशत हिंदी के हैं। ये आंकड़े बताते हैं हिंदी पत्रकारिता ने एक लंबी यात्रा में अपना सामाजिक आधार विस्तृत किया है। 

डिजिटल दुनिया में राज कर रही हिंदी:

हिंदी पत्रकारिता का विस्तार अब डिजिटल दुनिया में भी संभव हुआ है। डिजिटल का सूरज कभी डूबता नहीं और जो डिजिटल पर है, वह ग्लोबल होने की संभावना से भरा हुआ है। इस दुनिया में भी हिंदी का डंका बज रहा है। गूगल और केपीएमजी की 2024 की रिपोर्ट बताती है कि भारत में इंटरनेट उपभोक्ता अब 85 करोड़ से अधिक हैं। इनमें 70 प्रतिशत भारतीय भाषाओं, विशेषकर हिंदी में सामग्री पढ़ना,सुनना, देखना चाहते हैं। हिंदी डिजिटल का बाजार हर साल 20 प्रतिशत की दर से बढ़ रहा है। 2024 के आंकड़े बताते हैं कि 75 प्रतिशत से अधिक वीडियो कंटेंट हिंदी और भारतीय भाषाओं में देखे जा रहे हैं। नए समय में ए-आई, भाषा माडल्स और वायस टू टेक्स्ट तकनीक से हिंदी कंटेंट को बहुत बढ़ावा मिल रहा। कल तक हिंदी टेक्स्ट को पढ़ने में कठिनाइयां महसूस कर रहे लोग दुनिया भर में हिंदी कंटेंट को सुन और देख रहे हैं। 2016 में डिजिटल माध्यम पर हिंदी पढ़ने वालों की संख्या 5.5 करोड़ थी, जो 2025 में बढ़कर 15.6 करोड़ होने का अनुमान है। 

सोशल मीडिया पर भी दमदार उपस्थिति:

हिंदी में हर माह 10 अरब घंटे से ज्यादा वीडियो देखे जाने का आंकड़ा बताता है भाषा का विस्तार, शक्ति और गहराई क्या है। देश में यूट्यूब के उपयोगकर्ताओं की संख्या 50 करोड़ से ऊपर है, जो इसे संभव  बनाते हैं। भारत में इंस्टाग्राम के 30 करोड़ उपयोगकर्ताओं ने संचार की दुनिया में गहरा हस्तक्षेप किया। इंस्टा पर हिंदी रील्स की औसत व्यूवरशिप अंग्रेजी के मुकाबले दोगुनी से अधिक है। यूट्यूब और इंस्टा पर हिंदी कंटेंट बनाने वालों की संख्या भी 2020 के मुकाबले दोगुनी हो गई है। वायस सर्च में हिंदी का उपयोग उसे विस्तार दे रहा है।

ओटीटी पर हिंदी राज

कोरोना में मनोरंजन संचार की सबसे बड़ी घटना थी, ओटीटी कंटेंट का विस्तार और स्वीकार। आज भारत में यह लगभग 23,000 करोड़ रुपए का बाजार है। अनुमान है कि 2027 तक यह 40,000 करोड़ का हो जाएगा। भारत में ओटीटी के 50 करोड़ से अधिक उपभोक्ता हैं, जिनमें 70 से अधिक हिन्दी भाषी हैं। कंपनियां सबसे ज्यादा ओरिजनल कंटेंट हिंदी में बना रही हैं।

समग्रता में देखें तो 1826 में एक पत्र चलाना कितना कठिन था। शुक्ल जी उसे दो साल भी नहीं चला सके। आज इतने सारे संचार माध्यमों पर राज कर रही हिंदी का विस्तार देखकर उनकी आत्मा निश्चित ही प्रसन्न होकर संचार के साधकों पर आशीर्वाद की वर्षा कर रही होगी। अब जबकि हम हिन्दी पत्रकारिता के 200 साल पूरे करने जा रहे हैं, तो हमारी जिम्मेदारी है कि हम अपने सभी संचार माध्यमों को ज्यादा जनपक्षधर, मानवीय, संवेदनशील, अश्लील सामग्री मुक्त और विमर्श का केंद्र बनाएं।

- प्रो.संजय द्विवेदी

(लेखक भारतीय जन संचार संस्थान- आईआईएमसी, नई दिल्ली के पूर्व महानिदेशक हैं।)

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