रहोगे जो तुम कुटिया में, नहीं जाओगे लुटिया में (व्यंग्य)

By डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ | May 29, 2021

एक दिन कोरोना पर हिंदी फिल्मों का भूत सवार हो गया। कई शहरों में लॉकडाउन देख वह कहने लगा- इतना सन्नाटा क्यों है भाई और जोर से ठहाका मारकर हंसने लगा। तभी उसकी हंसी पर ब्रेक लगाने के लिए वैक्सिन कूद पड़ा। दीवार फिल्म में ईमानदारी का देवता बने फिरने वाले शशि कपूर के स्थान पर वैक्सिन को देख कोरोना अमिताभ बच्चन बन बैठा और कहने लगा कि मुझे मिटाने से पहले उन लोगों की साइन लेकर आओ जो मास्क लगाना भूल जाते हैं। जाओ उन लोगों की साइन लेकर आओ जो सैनिटाइजर से हाथ साफ़ करना भूल जाते हैं और जाओ उन लोगों की साइन ले आओ जो दो गज की दूरी की ऐसी की तैसी करते हैं। वैक्सिन डॉन फिल्म में अमिताभ को डराने के चक्कर में ऐसा न जाने क्या कह देता है कि कोरोना बदतमीजी पर उतर आता है- मैं बिना मास्क, सेनिटाइजर और दो गज की दूरी न निभाने वालों को आज भी नहीं छोड़ता। कोरोना की दबंगई यहीं तक नहीं रुकी। कहने लगा- मैं लोगों के सीने में इतना उतर जाऊँगा कि लोग कंफ्यूज हो जाएंगे कि मरे कैसे और जिएँ कैसे। यह सुन डर से थरथराते कोविडियों ने कुछ कुछ होता है कि स्टाइल में कहा- इस सीने में कुछ-कुछ होता है सरकार नहीं समझेगी।

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दूसरी ओर सरकार कोरोना को धमकाते हुए चुटकियों में काम तमाम करने का अल्टीमेटम जारी करती है। इस पर कोरोना भड़क उठा और बाजीराव के अंदाज में बोला- कोरोना की चाल, उसकी नजर और उसके इंफेक्शन पर संदेह नहीं करते कभी भी चपेट में ले सकता है। इस पर सरकार देवदास की स्टाइल में कहती है- विपक्ष कहता है कुर्सी छोड़ दो, जनता कहती है यह गंभीरता का स्वांग छोड़ दो और कोरोना कहता है कि यह दुनिया छोड़ दो। इस पर कोरोना कहता है– अभी तो खेला शुरू हुआ है। असली पिक्चर तो अभी बाकी है। वैरिएंट और लहरों का बाप हूँ मैं, नाम है मेरा कोरोना। लाख चिल्लाओ तुम भला, मैं तो तुम्हें छोड़ूँ न। मेरे नाम की हवा में ही डर है साहब! मुझे कुछ देर के लिए तो रोक लोगे, लेकिन इस हवा को कैसे रोकोगे? वैसे भी मास्क या सैनिटाइजर खरीदने से नहीं उसके सही उपयोग से हमसे बच पाओगे। जो कि तुम्हारे बस की बात नहीं है।

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यह सब देख जनता परेशान हो उठती है। कहती है- लॉकडाउन पे लॉकडाउन लगाते रहे, लेकिन कोरोना का टीका मिलता नहीं। मिलता है तो लॉकडाउन। इस पर कोरोना सलाह देते हुए कहता है– रहोगे जो तुम कुटिया में। नहीं जाओगे लुटिया में। मुझे दो तरह के लोग कतई पसंद नहीं है। एक वो जो मेरी हिदायतें नहीं मानते। दूसरे जो हद से ज्यादा मानकर घरवालों का जीना हराम कर देते हैं। रिश्ते में तो हम तुम्हारे कुछ नहीं लगते, लेकिन संभलकर रहने की हिदायत जरूर देते हैं, नाम है मेरा कोरोना। कहीं भूल मत जाना। वैसे भी याद उन्हें किया जाता है, जिन्हें भुला दिया जाता है। और मैं कोई भुलाने वाली चीज़ थोड़ी न हूँ। विश्वास न हो तो अपनी खोई हुई नौकरी, पानी की तरह बहाई बचत और अपनों को खोने का दर्द ही टटोल लो। तुम सच में अपनी जिंदगी की सुरक्षा चाहते हो तो न उठो, न चलो, न दौड़ो हाथ पर हाथ धरे कुछ दिन के लिए चुपचाप पड़े रहो। इसी में तुम्हारी भलाई है।


-डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

(हिंदी अकादमी, मुंबई से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार)

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