सरकार हमारी ही बनेगी (व्यंग्य)

By संतोष उत्सुक | Dec 01, 2018

विधानसभाओं के जिन क्षेत्रों में वोटिंग हो चुकी है वहां हौले हौले फैलती सर्दी के मौसम में चुनाव की गर्मी आसमान छूकर ठंडा रेगिस्तान होने लगी है। अब कयासों की बारिश का मौसम आ गया है वहां, जो तब तक चलेगा जब तक सरकार बन न बैठे और वोटरों को बनाना शुरू न कर दे। वोटिंग होने के बाद भी विवादवार जारी है। हर पार्टी राजनीति के निम्नतम स्तर पर चढ़ कर कह चुकी है कि हम ही जीतेंगे और सरकार हमारी ही बनेगी। वादे इरादे बांटे जा चुके हैं, आम आदमी की बात तो हर चुनाव में बहुत होती है लेकिन इस बार गधे काफी नाराज़ दिखे हैं, वह खुंदक में हैं कि इस बार उनकी कोई बात ही नहीं हुई।

  

सरकार किसकी होगी इस बार यह अंदाजा लगाने का काम ज्यादा मेहनत से किया जा रहा है, धुरंधर बयानबाज काम खत्म होने के बाद भी आराम से नहीं बैठे हैं। दिग्गज नेताओं के दावे पतंग की तरह लूटे जा रहे हैं। कई दिमागों में सरकार पूरी तरह से साकार हो चुकी है। संभावित मंत्रालयों से किस किस की गोद भराई होगी यह भी लगभग तय हो चुका है। जिन बड़े अफसरान का तबादला आशंकित व संभावित है, वे मानसिक रूप से तैयार होने लगे हैं। कौन कौन से अफसर जाएंगे और कौन मनपसंद आएंगे यह भी दिमाग में पकाना शरू हो गया है। राजनीति की चारित्रिक विशेषता एवं घोर आवश्यकता बदली नहीं है कि सरकार, अपनी पार्टी व अपनों का जी भर कर विकास करे, किसान व गरीबों के किए बढ़िया स्वादिष्ट योजनाएं पकाए और सबको खाने का अवसर दे।

 

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इस बार भी ‘जा रही सरकार’ ने बहुत सलीके से समझाया कि कितना ज़्यादा विकास किया और ‘आ रही सरकार’ ने आने वाले पांच वर्षों के दौरान आशा जगाऊ, ख़्वाब दिखाऊ शैली में संभावित अति विकास के सपने दिखाए हैं। असली चुनावी दंगल अक्सर कम राजनीतिक पार्टियों में ही होता है। कुछ व्यक्ति अपने दम पर जीतते हैं, बाकी दसियों नहीं सैंकड़ों तो, पता होते हुए भी, अपनी ज़मानत ज़ब्त करवा कर सरकारी खजाने की आय बढ़ाने के लिए ही खड़े होते हैं। सरकार तो बन ही जाएगी, हो सकता है स्वतंत्र विजेताओं का सोना-चांदी हो जाए या उन्हें मलाल रहे कि वे सरकार बनाने जा रहे बहुमत प्राप्त दल में शामिल क्यूं  नहीं हुए अच्छी आफर के बावजूद।

 

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प्रसिद्ध व समझदार व्यक्तियों व संस्थाओं की तरफ से बार-बार आग्रह करने के बावजूद बहुत से नासमझ नागरिक वोट नहीं देते। क्या वे उदास वोटर हैं जिन्हें अभी तक दास वोटर नहीं बनाया जा सका। शायद उन्हें नहीं पता कि वोट की कीमत जितना मिल जाए उतने सामान जितनी तो है। कई घिसेपिटे, पुराने, धोखा खाए पैसा लुटाए और साथ-साथ शरीर तुड़वा चुके पूर्व राजनीतिज्ञ अब मानने लगे हैं कि जिन नक्षत्रों में आम वोटरों ने जन्म लिया व जिन निम्न स्तरीय, कहीं कहीं तो नारकीय जीवन परिस्थितियों में जी रहे हैं, से उन्हें भगवान के सामने दिन रात की गई लाखों प्रार्थनाएं नहीं निकाल सकीं, हाथ पसार कर वोट मांगने वाला, दिल का मैला व्यक्ति कैसे निकाल सकता है। वे कहते हैं कि यह जो हम हर बार कहते रहते है, लोकतंत्र की जीत हुई, ऐसा नहीं है हम सब मिल कर लोकतंत्र को हराते हैं। हमारे देश के हर चुनाव में आशा, विश्वास, मानवता, धर्म की भी हार होती है। वे इस बारे में स्वतंत्र भारत के सात दशक से ज़्यादा स्वर्णिम इतिहास पर भी विश्वास करते हैं। हर बार की तरह इस बार भी अठारह से बीस प्रतिशत वोटों से विधायक बन जाएंगे। क्या अब यह झूठ है कि अधिकतर नेताओं द्वारा भाग्य तो अपना, अपना, अपना, अपने रिश्तेदारों का या सरमाएदारों का ही बदला जा सकता है। क्या असली भाग्य विधाता ताक़त और पैसा नहीं है। यह तो आने वाली सरकार का निर्माण करने वाले भी जानते हैं।

 

-संतोष उत्सुक

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