जीकर मरने वाले और मरकर जीने वाले (व्यंग्य)

By डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ | Nov 07, 2020

जिंदगी जीने के दो ही तरीके हैं। जीकर मरो या मरकर जियो। जीकर मरने वालों की जिंदगी पानी के बुलबुलों की तरह होती है। इसमें जय जवान-जय किसान वर्ग के लोग आते हैं। जबकि मर कर जीने वाले कछुए की तरह होते हैं। इसमें भोग-विलासी नेता, अधिकारी, पूंजीपतियों की भरमार होती है। कछुआ, नेता, अधिकारी, पूंजीपतियों में यह समानता होती है कि वे अपनी ऊर्जा बेकार में बर्बाद नहीं करते। इनकी नींद को चिंतन, जागने को क्रांति, भूखे रहने को अनशन, नाखून-बाल कटाने को त्याग और रोने को राष्ट्रीय अवसाद कहते हैं।

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मरकर जीने वालों का पारा सातवें आसमान पर था। उनमें से एक वकील टाइप ने कहा– देश की रक्षा जवान करता है। उनका पेट किसान भरता है। किसान को बीज, खाद, पानी, सही कीमत हम देते हैं। अगर हम यह नहीं करेंगे तो किसान को किसान और जवान को जवान कौन कहेगा? किसान का काम अपनी जिंदगी के दुखों को सान कर हमें सुख का निवाला खिलाना है। जवानों का काम अपनी जवानी लुटाकर हमारी रवानी बचाना है। जिसकी नियति में टूटना और मिटना लिखा होता है उसे सवाल पूछने का कोई अधिकार नहीं होता। किसान और जवान को मारने के लिए कानूनों की जरूरत नहीं पड़ती। उन्हें केवल किसान और जवान कहना बंद कर दो वे अपने आप मर जायेंगे। देश ऐसे स्वाभिमानी लोगों से नहीं चलता। देश तो चलता है, मोटी खाल ओढ़े गेंडों से। गिद्धी आँखों पर विकास का डुप्लीकेट चश्मा लगाए कपटियों से। गाली-गलौज, बदनामी, थू-थू सहकर भी अविचलित होने वाले निर्लज्जों से। तुम जैसे लोगों से नहीं जो जरा-जरा सी बातों पर देश के लिए मर मिटते हो। अगर सभी ऐसे मरने लगें तो देश को कौन चलाएगा? कोई तो होना चाहिए जो देश की देख-रेख कर सके। इसलिए देश में जो हो रहा है, होने दो। जैसा चल रहा है, चलने दो। ज्यादा बदलने की कोशिश मत करो। वरना इस देश का इतिहास जानते ही हो कि बदलने वालों को ही लोग बदल देते हैं। इतना सुनना था कि जीकर मरने वाले अपना इतना सा मुँह लिए वहाँ से चलते बने।

-डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त'

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