Lebanon में नागरिकों की बढ़ती मौतों पर भारत ने जताई चिंता, Pakistan में US-Iran वार्ता को लेकर लग रहीं तमाम तरह की अटकलें

By नीरज कुमार दुबे | Apr 10, 2026

पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के बीच इस समय पूरी दुनिया की नजर पाकिस्तान पर टिकी हुई है, जहां ईरान और अमेरिका के बीच अहम वार्ता होनी है। लेकिन हालात बेहद अलग तस्वीर दिखा रहे हैं। इस्लामाबाद में सन्नाटा पसरा हुआ है, कड़ी सुरक्षा के बीच लगभग लॉकडाउन जैसी स्थिति बना दी गई है और सड़कों पर आवाजाही बेहद सीमित है। जिन प्रतिनिधिमंडलों को इस वार्ता में शामिल होना है, उनके आने को लेकर अब भी संशय बना हुआ है। हालात ऐसे हैं मानो पाकिस्तान वार्ता की मेज सजाकर, समोसे और जलेबी रखकर इंतजार कर रहा हो, लेकिन मेहमान अभी तक पहुंचे ही नहीं हैं।

भारत ने अपनी ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए विविध स्रोतों की नीति अपनाई है। इसी क्रम में रूस और अमेरिका दोनों से ऊर्जा आपूर्ति सुनिश्चित की गई है। इसके साथ ही भारत अपने पड़ोसी देशों की सहायता भी कर रहा है। हाल ही में श्रीलंका को पेट्रोलियम उत्पाद की आपूर्ति की गई, जबकि मॉरीशस के साथ तेल और गैस आपूर्ति को लेकर समझौते को अंतिम रूप दिया जा रहा है।

दूसरी ओर, लेबनान में हालात चिंताजनक बने हुए हैं। इजराइल के हमलों के कारण नागरिकों की बढ़ती मौतों पर भारत ने गहरी चिंता जताई है। भारत ने स्पष्ट किया है कि वह लेबनान की शांति और सुरक्षा के प्रति प्रतिबद्ध है और वहां संयुक्त राष्ट्र मिशन में उसकी सक्रिय भागीदारी है। हम आपको बता दें कि लेबनान में लगभग एक हजार भारतीय नागरिक भी रह रहे हैं, जिससे भारत की चिंता और बढ़ गई है।

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इस बीच, इजराइल के प्रधानमंत्री ने साफ कहा है कि लेबनान में कोई युद्धविराम लागू नहीं है और हिजबुल्लाह के खिलाफ कार्रवाई जारी रहेगी। हालांकि उन्होंने यह भी संकेत दिया कि यदि अनुरोध किया गया तो शांति वार्ता के लिए रास्ता खुला है।

इस पूरे संकट के बीच ईरान से जुड़ी एक महत्वपूर्ण खबर भी सामने आई है। ईरान के पूर्व विदेश मंत्री कमाल खराजी जोकि हवाई हमले में घायल हो गये थे, उनकी मृत्यु हो गयी है। हम आपको याद दिला दें कि उन्होंने ईरान की परमाणु क्षमता के बारे में बयान देते हुए कहा था कि तेहरान के पास परमाणु बम बनाने की तकनीकी क्षमता है।

उधर, कूटनीतिक स्तर पर भी गतिविधियां तेज हो गई हैं। लेबनान ने संकेत दिया है कि वह वाशिंगटन में प्रस्तावित वार्ता में शामिल हो सकता है, जिससे युद्धविराम की संभावनाओं को बल मिल सकता है। हालांकि इस प्रक्रिया में कई बाधाएं बनी हुई हैं, जिनमें सबसे बड़ी समस्या लेबनान को युद्धविराम समझौते में शामिल करने को लेकर मतभेद है।

दूसरी ओर, इस संघर्ष का एक महत्वपूर्ण पहलू होर्मुज जलडमरूमध्य की स्थिति है, जो वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति का प्रमुख मार्ग है। ईरान ने यहां जहाजों की आवाजाही पर सख्त नियंत्रण लगा दिया है। प्रतिदिन सीमित संख्या में जहाजों को अनुमति दी जा रही है, जिससे तेल आपूर्ति प्रभावित हो रही है और वैश्विक बाजार में अस्थिरता बढ़ रही है। जहाजों के लिए नए नियम, अनुमति प्रणाली और संभावित शुल्क ने अंतरराष्ट्रीय व्यापार को जटिल बना दिया है।

बताया जा रहा है कि ईरान इस मार्ग से गुजरने वाले जहाजों पर शुल्क लगाने पर विचार कर रहा है, जिसे लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आलोचना हो रही है। इस स्थिति ने बीमा लागत, कानूनी जोखिम और परिवहन खर्च को बढ़ा दिया है, जिससे कई कंपनियां सतर्क हो गई हैं।

इसी बीच, चीन की भूमिका इस पूरे संकट में उभरकर सामने आई है। कूटनीतिक सूत्रों के अनुसार, जब युद्धविराम की संभावना कमजोर पड़ रही थी, तब चीन ने हस्तक्षेप कर ईरान को प्रारंभिक सहमति देने के लिए राजी किया। चीन के विदेश मंत्री ने कई देशों के साथ लगातार संपर्क बनाए रखा और क्षेत्र में सक्रिय कूटनीति के माध्यम से तनाव कम करने की कोशिश की। माना जा रहा है कि भले वार्ता के लिए मेज पाकिस्तान में सजी हो लेकिन असल मध्यस्थता चीन ने ही की थी। वैसे अभी यह स्पष्ट नहीं है कि ईरान, इजराइल और अमेरिका के बीच औपचारिक बातचीत शुरू हुई है या नहीं। ईरान ने इस बात से इंकार किया है कि उसका कोई प्रतिनिधिमंडल पाकिस्तान पहुंचा है। उसने यह भी कहा है कि जब तक लेबनान में युद्धविराम नहीं होता, तब तक वह व्यापक वार्ता में शामिल नहीं होगा। अमेरिका की ओर से उपराष्ट्रपति जेडी वेंस के पाकिस्तान जाने की तैयारी इस बात का संकेत है कि वार्ता को आगे बढ़ाने की कोशिशें जारी हैं। हालांकि यह स्पष्ट नहीं है कि बातचीत प्रत्यक्ष होगी या अप्रत्यक्ष।

कुल मिलाकर देखें तो फिलहाल स्थिति बेहद जटिल बनी हुई है। परमाणु कार्यक्रम, क्षेत्रीय संघर्ष, समुद्री सुरक्षा और लेबनान का मुद्दा जैसे कई बड़े प्रश्न अभी अनसुलझे हैं। कूटनीतिक प्रयास जारी हैं, लेकिन स्थायी समाधान के लिए सभी पक्षों को कठिन समझौते करने होंगे। बहरहाल, इस पूरे घटनाक्रम ने यह स्पष्ट कर दिया है कि पश्चिम एशिया का संकट केवल क्षेत्रीय नहीं बल्कि वैश्विक प्रभाव वाला है, जिसमें ऊर्जा, सुरक्षा और कूटनीति के कई आयाम जुड़े हुए हैं।

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