क्या है करतारपुर साहिब का इतिहास जहां सिर्फ सिख ही नहीं मुसलमान भी झुकाते हैं सिर, पाकिस्तान में होने के बावजूद भारत के श्रद्धालु कैसे करते हैं दर्शन?

By अभिनय आकाश | Nov 16, 2021

1947 के भारत के बंटवारे के दौरान अगर किसी ने सबसे ज्यादा इस बंटवारे का दंश झेला तो वो है पंजाब राज्य। पंजाब के लोगों ने इस बंटवारे में न सिर्फ अपनों को खोया बल्कि उन्होंने एक चीज और खो दी और वो थे उनके धार्मिक स्थल। सिखों के कई गुरुओं के जन्मस्थान बंटवारे के बाद पाकिस्तान में ही रह गए। यहां तक की सिखों के पहले गुरु गुरुनानकदेव जी ने अपनी आखिरी सांस यहीं ली। इन धार्मिक स्थलों पर माथा टेकने के लिए सिख संगतें हमेशा आतुर रहती हैं। लेकिन कभी वीजा तो कभी दोनों मुल्कों के बीच के तनावपूर्ण हालात इनके अरमानों पर पानी फेर देते हैं। करतारपुर से सिखों का कनेक्शन क्या है?

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सिर्फ सिख ही नहीं मुसलमान भी यहां पर सिर झुकाते हैं

कहते हैं कि जब नानक गुजरे तो उनकी लाश गायब हो गई। लाश की जगह कुछ फूल पड़े मिले। आधे फूल सिख ले गए और उन्होंने फूल को जलाकर नानक का अंतिम संस्कार कर दिया। ऊपर समाधि बना दी गई। मुसलमानों ने अपने हिस्से में आए आधे फूलों को दफनाकर इस्लामिक दस्तूरों के मुताबिक क्रियाक्रम कर दिया। करतारपुर गुरुद्वारे में वो समाधि और वो कब्र अब भी मौजूद है। कब्र बाहर आंगन में और समाधि इमारत के अंदर है। इतने सालों बाद भी मुसलमान गुरुनानक की दर पर आते हैं। जहां सिखों के लिए नानक उनके गुरु हैं वहीं मुसलमानों के लिए नानक उनके पीर हैं।

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करतारपुर साहिब कॉरिडोर क्या है?

भारत में पंजाब के डेरा बाबा नानक से अंतर्राष्ट्रीय सीमा तक कॉरिडोर का निर्माण किया गया है और वहीं पाकिस्तान भी सीमा से नारोवाल जिले में गुरुद्वारे तक कॉरिडोर का निर्माण हुआ है। इसी को करतारपुर साहिब कॉरिडोर कहा गया है।

कॉरिडोर कहां बनाया गया?

इस कॉरिडोर को डेरा बाबा नानक जो गुरुदासपुर में है, वहां से लेकर अंतर्राष्ट्रीय बॉर्डर तक बनाया गया है। यह बिलकुल एक बड़े धार्मिक स्थल के जैसा ही है। यह कॉरिडोर लगभग 3 से 4 किमी का है और इसको दोनों देशों की सरकारों ने फंड किया है।

भारत के श्रद्धालु कैसे करते हैं दर्शन

बंटवारे के बाद पाकिस्तान में चले जाने के बाद भारत के नागरिकों को करतारपुर साहिब के दर्शन के लिए वीजा की जरुरत होती है। जो लोग पाकिस्तान नहीं जा पाते हैं वो भारतीय सीमा में डेरा बाबा साहिब नानक स्थित गुरुद्वारा शहीद बाबा सिद्ध सैन रंधावा में दूरबीन की मदद से दर्शन करते हैं। ये गुरुद्वारा भारत की तरफ की सीमा से साफ नजर आता है। पाकिस्तान में सरकार इस बात का ध्यान रखती है कि इस गुरुद्वारे के आस-पास घास जमा न हो पाए, इसलिए इसके आस-पास कटाई-छटाई करवाती रहती है ताकि भारत से इसको अच्छे से देखा जा सके और श्रद्धालुओं को कोई तकलीफ न हो। भारत के सिखों ने हमेशा ऐसे वीजा फ्री कॉरिडोर की मांग की है जिसके जरिये वो जब चाहे गुरुद्वारे में दर्शन करने लौट आए। गुरुनानक देव की 550वीं जयंती से पहले सिद्धू इमरान खान की ताजपोशी में पाकिस्तान गए। पाकिस्तान के आर्मी चीफ बाजवा को गले भी लगाया। जिसको लेकर देश में खूब राजनीतिक बवाल भी हुआ। लेकिन वहां से लौटकर 7 सितंबर 2018 को सिद्धू ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर ये ऐलान कर दिया कि गुरुनानक जयंती पर पाकिस्तान करतारपुर से जुड़ी सीमा खोलने वाला है। करतारपुर कॉरिडोर खोलने का एलान होने के बाद दोनों देशों में शिलान्यास कार्यक्रम रखा गया। सिद्धू भारत में आयोजित शिलान्यास कार्यक्रम में तो नहीं आए। लेकिन पाकिस्तान में आयोजित शिलान्यास कार्यक्रम में पहुंच गए। हालांकि वहां केंद्रीय मंत्री हरसिमरत कौर बादल और हरदीप पुरी भी गए थे। कोविड-19 के प्रकोप के कारण करतारपुर साहिब गुरुद्वारे तक तीर्थयात्रा मार्च 2020 में निलंबित कर दी गई थी।

करतारपुर को लेकर फिर से क्यों चर्चा होने लगी 

श्री गुरु नानक देव जी के प्रकाश पर्व से पहले केंद्र सरकार ने फिर से करतारपुर कॉरिडोर खोलने का फैसला किया है। गुरु पर्व 19 नवंबर को है, इससे पहले मोदी सरकार सिख तीर्थयात्रियों के हित में ये बड़ा फैसला किया है। इसे 16 मार्च, 2020 को कोरोना महामारी के कारण बंद कर दिया गया था। पूर्व सीएम कैप्टन अमरिंदर सिंह ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से अपील की थी कि सिख संगत की भावनाओं का सम्मान करते हुए 19 नवंबर से पहले करतारपुर कॉरिडोर खोल दिया जाए। इससे पहले पंजाब के बीजेपी नेताओं ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात की थी। इस दौरान नेताओं ने उनसे अनुरोध किया कि गुरुपर्व से पहले करतारपुर कॉरिडोर को पुन: खोला जाए।

-अभिनय आकाश 

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