Holi Festival: सामाजिक भेदभाव मिटाने वाले इस पर्व का क्या है महत्व?

By शुभा दुबे | Mar 03, 2026

वसंत ऋतु में मनाया जाने वाला महत्वपूर्ण त्योहार है होली। फाल्गुन मास की पूर्णिमा को पड़ने वाला रंगों का यह त्योहार सामाजिक भेदभाव को मिटाकर सबको गले मिलने का अवसर उपलब्ध कराता है। इस दिन हर वर्ग के लोग टोलियां बनाकर अपने घर से निकलते हैं और दूसरों के घर जाकर रंग लगाते हैं, मिठाई खाते, खिलाते हैं और एक दूसरे को शुभकामनाएं प्रदान करते हैं। कई जगह तो इन टोलियों की ओर से सांस्कृतिक आयोजन भी किये जाते हैं। यह पर्व पारंपरिक रूप से दो दिन मनाया जाता है। पहले दिन को होलिका जलायी जाती है, जिसे होलिका दहन भी कहते है। दूसरे दिन, जिसे धुलेंडी कहा जाता है, लोग एक दूसरे पर रंग, अबीर-गुलाल इत्यादि फेंकते हैं और ढोल बजा कर होली के गीत गाये जाते हैं।

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होली में जिस तरह रंगों की विभिन्नता देखने को मिलती है उसी प्रकार इसको मनाये जाने के प्रकार में भी देश के विभिन्न प्रांतों में भिन्नता देखने को मिलती है। इस दिन उत्तराखंड के कुमाऊं की गीत बैठकी में शास्त्रीय संगीत की गोष्ठियां आयोजित की जाती हैं तो हरियाणा में भाभी द्वारा देवर को सताए जाने का सब आनंद लेते हैं। महाराष्ट्र में सूखा गुलाल खेलने और गोवा में जलूस निकालने के बाद सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है तथा पंजाब में होला मोहल्ला में सिखों की ओर से शक्ति प्रदर्शन किये जाने की परंपरा है। छत्तीसगढ़ की होरी में लोक गीतों की अद्भुत परंपरा है और मध्य प्रदेश के मालवा अंचल तथा दक्षिण गुजरात के आदिवासी इलाकों में यह पर्व बेहद धूमधाम से मनाया जाता है। बिहार में फगुआ जम कर मौज मस्ती करने का पर्व है। दिल्ली और आसपास के इलाकों में इस दिन डीजे और ढोल की थापों पर लोग नाचते गाते और एक दूसरे को गुजिया खिलाते नजर आते हैं।

बंगाल में होली को 'डोल यात्रा' व 'डोल पूर्णिमा' कहते हैं और होली के दिन श्री राधा और कृष्ण की प्रतिमाओं को डोली में बैठाकर पूरे शहर में घुमाया जाता है। बंगाल में होली को 'बसंत पर्व' भी कहते हैं। इसकी शुरुआत रवीन्द्र नाथ टैगोर ने शान्ति निकेतन में की थी। ओडिशा में भी होली को 'डोल पूर्णिमा' कहते हैं और इस दिन भगवान जगन्नाथ जी की डोली निकाली जाती है। राजस्थान में मुख्यतः तीन प्रकार की होली होती है। माली होली- इसमें माली जात के मर्द, औरतों पर पानी डालते हैं और बदले में औरतें मर्दों की लाठियों से पिटाई करती हैं। इसके अलावा गोदाजी की गैर होली और बीकानेर की डोलची होली भी काफी चर्चित हैं। कर्नाटक में यह त्योहार कामना हब्बा के रूप में मनाया जाता है। कहा जाता है कि इस दिन भगवान शिव ने कामदेव को अपने तीसरे नेत्र से जला दिया था। इस दिन कूड़ा-करकट फटे वस्त्र, एक खुली जगह एकत्रित किए जाते हैं तथा इन्हें अग्नि को समर्पित किया जाता है।

ग्रामीण क्षेत्रों में इस पर्व से सामाजिक जुड़ाव काफी गहरा देखने को मिलता है क्योंकि होली के पंद्रह बीस दिन पहले से ही गोबर के पतले पतले उपले और अंजुलि के आकार की गुलेरियां बनाना प्रारम्भ हो जाता है। इनके बीच में बनाते समय ही उंगलि से एक छेद बना दिया जाता है। इनके सूख जाने पर इन्हें रस्सियों में पिरोकर मालाएं बनाई जाती हैं। होलिका दहन के दो तीन दिन पूर्व खुले मैदानों और अन्य निर्धारित स्थानों पर होली के लकड़ी कण्डे आदि रखना प्रारम्भ कर दिया जाता है। उनमें ही रख दी जाती हैं मालाएं। अनेक क्षेत्रों में इन सामूहिक होलिकाओं के साथ−साथ एक मकान में रहने वाले सभी परिवार मिलकर अतिरिक्त रूप से भी होलियां जलाते हैं। होली की अग्नि में पौधों के रूप में उखाड़े गए चने, जौ और गेहूं के दाने भूनकर परस्पर बांटने की भी परम्परा है। होलिका दहन तो रात्रि में होता है, परन्तु महिलाओं द्वारा इस सामूहिक होली की पूजा दिन में दोपहर से लेकर शाम तक की जाती है। महिलाएं एक पात्र में जल और थाली में रोली, चावल, कलावा, गुलाल और नारियल आदि लेकर होलिका माई की पूजा करती हैं। इन सामग्रियों से होली का पूजन किया जाता है और जल चढ़ाया जाता है। होलिका के चारों ओर परिक्रमा देते हुए सूत लपेटा जाता है। शास्त्रों के अनुसार भद्रा नक्षत्र में होलिका दहन पूर्णतया वर्जित है। इस दिन पुरुषों को भी हनुमानजी और भगवान भैरवदेव की विशिष्ट पूजा अवश्य करनी चाहिए। प्रत्येक स्त्री पुरुष को होलिका दहन के समय आग की लपटों के दर्शन करने के बाद ही भोजन करना चाहिए।

होली के दिन घरों में गुजिया, खीर, पूरी और गुलगुले आदि विभिन्न व्यंजन पकाए जाते हैं। बेसन के सेव और दही बड़े भी उत्तर प्रदेश में इस दिन खूब बनाये जाते हैं। इस पर्व पर कांजी, भांग और ठंडाई विशेष पेय होते हैं। 

कथा− कहा जाता है कि प्राचीन काल में हिरण्यकशिपु नाम का एक अत्यंत बलशाली असुर था। वह स्वयं को ही ईश्वर मानने लगा था। उसने अपने राज्य में ईश्वर का नाम लेने पर ही पाबंदी लगा दी थी। हिरण्यकशिपु का पुत्र प्रह्लाद ईश्वर भक्त था। प्रह्लाद की ईश्वर भक्ति से क्रुद्ध होकर हिरण्यकशिपु ने उसे अनेक कठोर दंड दिए, परंतु उसने ईश्वर की भक्ति का मार्ग न छोड़ा। हिरण्यकशिपु की बहन होलिका को वरदान प्राप्त था कि वह आग में भस्म नहीं हो सकती। हिरण्यकशिपु ने आदेश दिया कि होलिका प्रह्लाद को गोद में लेकर आग में बैठे। आग में बैठने पर होलिका तो जल गई, पर प्रह्लाद बच गया। ईश्वर भक्त प्रह्लाद की याद में इस दिन होली जलाई जाती है। माना जाता है कि प्रह्लाद का अर्थ आनन्द होता है। वैर और उत्पीड़न की प्रतीक होलिका (जलाने की लकड़ी) जलती है और प्रेम तथा उल्लास का प्रतीक प्रह्लाद (आनंद) अक्षुण्ण रहता है।

शुभा दुबे

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