'सदन कोई मेला नहीं', Speaker पर सवाल उठाने वाले विपक्ष को Amit Shah की Lok Sabha में दो टूक

By अंकित सिंह | Mar 11, 2026

गृह मंत्री अमित शाह लोकसभा में अध्यक्ष ओम बिरला के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव पर बहस में हिस्सा लिया। शाह ने कहा कि अध्यक्ष पूरे सदन के हैं और किसी भी दल से संबद्ध नहीं हैं। अमित शाह ने कहा कि यह कोई साधारण बात नहीं है। लगभग चार दशकों के बाद लोकसभा अध्यक्ष के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाया गया है। यह संसदीय राजनीति और इस सदन के लिए दुर्भाग्यपूर्ण है। उन्होंने कहा कि इस सदन के स्थापित इतिहास के अनुसार, इसकी कार्यवाही आपसी विश्वास के आधार पर संचालित होती है। 

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शाह ने कहा कि अध्यक्ष एक निष्पक्ष संरक्षक के रूप में कार्य करते हैं, जो सत्ताधारी दल और विपक्ष दोनों का प्रतिनिधित्व करते हैं। अध्यक्ष द्वारा सत्रों के संचालन के लिए विशिष्ट नियम इसी लोकसभा द्वारा बनाए गए हैं। यह सदन कोई बाज़ार नहीं है; सदस्यों से अपेक्षा की जाती है कि वे इसके नियमों और प्रक्रियाओं के अनुसार बोलें और भाग लें। उन्होंने कहा कि मैं पूरे सदन को बताना चाहता हूं कि विद्यमान स्पीकर की नियुक्ति जब हुई, तब दोनों दलों के नेता ने एक साथ उन्हें आसन पर बैठाने का काम किया। 

गृह मंत्री ने कहा कि इसका मतलब है कि स्पीकर को अपने दायित्वों के निर्वहन के लिए पक्ष और प्रतिपक्ष दोनों ने एक प्रकार से मुक्त माहौल भी देना है और दायित्वों के निर्वहन के लिए उनका समर्थन भी करना है। मगर आज स्पीकर के निर्णय पर कोई असहमति तो व्यक्त हो सकती है, लेकिन लोकसभा के नियमों में स्पीकर के निर्णयों को अंतिम माना गया है। इसके विपरित विपक्ष ने स्पीकर की निष्ठा पर सवालिया निशान खड़ा किया।  

उन्होंने कहा कि ये लोकसभा भारत के लोकतंत्र की सबसे बड़ी पंचायत है, और न केवल भारत, बल्कि दुनियाभर में हमारी लोकतंत्र की साख बनी है, गरिमा बनी है... और पूरी दुनिया लोकतंत्र की इस प्रतिष्ठा को स्वीकार करती है। लेकिन जब इस पंचायत के मुखिया पर, उसकी निष्ठा पर सवालिया निशान लगता है तो केवल देश में नहीं, पूरी दुनिया में हमारी लोकतांत्रिक प्रक्रिया पर सवाल खड़ा होता है। लेकिन यहां उनपर शंका के सवाल उठा दिए।

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अमित शाह ने कहा कि मैं बताना चाहता हूं कि 75 साल से इन दोनों सदनों ने हमारे लोकतंत्र की नींव को पाताल से भी गहरा किया है, लेकिन आज विपक्ष ने इस साख पर एक प्रकार से सवालिया निशान खड़ा कर दिया है। सदन आपसी विश्वास से चलता है। पक्ष और विपक्ष—दोनों के लिए सदन के जो स्पीकर होते हैं, वे कस्टोडियन होते हैं। इसलिए नियम बनाए गए हैं। यह सदन कोई मेला नहीं है; यहां नियमों के अनुसार चलना पड़ता है। जो बातें सदन के नियम परमिट नहीं करते, उस तरह से बोलने का किसी को अधिकार नहीं है, चाहे वह कोई भी हो। विपक्ष जब निर्णय की निष्ठा पर सवाल खड़ा करता है तो मान्यवर ये बहुत दुर्भाग्यपूर्ण है और निंदनीय भी है। ये हमारी परंपरा, उच्च परंपराओं का निर्वहन करने के लिए बहुत अफसोसजनक घटना है।

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