युद्ध की राख से शांति का नया संसार कैसे बने?

By ललित गर्ग | Sep 21, 2026

21 सितम्बर का अंतर्राष्ट्रीय शांति दिवस इस वर्ष ऐसे समय में आया है, जब दुनिया को शांति की सबसे अधिक जरूरत है। रूस-यूक्रेन युद्ध लंबा खिंच चुका है, पश्चिम एशिया में इजराइल-गाजा संघर्ष की मानवीय त्रासदी समाप्त नहीं हुई है और 2026 में अमेरिका-इजराइल तथा ईरान के बीच भीषण सैन्य संघर्ष ने पूरे क्षेत्र की सुरक्षा एवं वैश्विक अर्थव्यवस्था को प्रभावित किया है। ऐसे वातावरण में शांति केवल एक आदर्श या कूटनीतिक शब्द नहीं, बल्कि मानव सभ्यता के अस्तित्व की अनिवार्य शर्त बन गई है। संयुक्त राष्ट्र ने 2026 के अंतर्राष्ट्रीय शांति दिवस की थीम रखी है-“शांति में निवेश करें-सभी के लिए, हर जगह, हर दिन।” संयुक्त राष्ट्र के अनुसार शांति का अर्थ केवल युद्ध की अनुपस्थिति नहीं, बल्कि सुरक्षा, गरिमा, अवसर और सहयोग का ऐसा वातावरण है जिसमें मनुष्य भयमुक्त होकर जीवन जी सके। इस वर्ष विशेष रूप से उन ‘रोजमर्रा के शांति-निर्माताओं’ को रेखांकित किया जा रहा है, जो अपने परिवार, समुदाय, विद्यालय और समाज में संवाद तथा विश्वास की नींव मजबूत करते हैं। कृत्रिम बुद्धिमत्ता का उपयोग भी शांति की खोज एवं शांति की स्थापना में होना चाहिए। ब्रिक्स 2026 की अध्यक्षता करते हुए भारत ने शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व के महत्व को ही रेखांकित किया है।

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इन युद्धों की सबसे बड़ी कीमत सैनिकों से कहीं अधिक आम नागरिक चुका रहे हैं। घर उजड़ते हैं, बच्चे शिक्षा से वंचित होते हैं, अस्पताल और ऊर्जा व्यवस्था प्रभावित होती है, रोजगार समाप्त होते हैं और लाखों लोग विस्थापित होते हैं। युद्ध केवल वर्तमान को नहीं जलाता, वह आने वाली पीढ़ियों के भविष्य को भी कमजोर करता है। इसलिए शांति की चर्चा केवल सीमाओं और सेनाओं के संदर्भ में नहीं, बल्कि मानवाधिकार, विकास, पर्यावरण, शिक्षा, स्वास्थ्य और आर्थिक सुरक्षा के संदर्भ में भी करनी होगी। शांति स्थापित करने का पहला रास्ता संवाद है। युद्धरत देशों के बीच प्रत्यक्ष संवाद कठिन हो सकता है, लेकिन असंभव नहीं। युद्ध के बीच भी मानवीय गलियारे, युद्धविराम, कैदियों की अदला-बदली, नागरिकों की सुरक्षा और मानवीय सहायता के रास्ते खुले रखने चाहिए। स्थायी शांति के लिए बातचीत में केवल शक्तिशाली देशों की भूमिका पर्याप्त नहीं है; क्षेत्रीय देशों, अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं, नागरिक समाज और प्रभावित समुदायों की आवाज भी शामिल होनी चाहिए।

दूसरा रास्ता है हथियारों की दौड़ के बजाय शांति में निवेश। दुनिया सैन्य क्षमता पर जितना खर्च करती है, उसका एक हिस्सा यदि शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, जलवायु संरक्षण और संघर्ष-प्रभावित क्षेत्रों के पुनर्निर्माण पर लगाया जाए तो हिंसा की जड़ों को कमजोर किया जा सकता है। शांति केवल युद्ध समाप्त करने से नहीं आती; गरीबी, असमानता, बेरोजगारी, भेदभाव और अवसरों की कमी जैसे कारणों पर काम करना भी शांति-निर्माण का हिस्सा है। तीसरा महत्वपूर्ण उपाय है विश्वसनीय अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं को मजबूत करना। संयुक्त राष्ट्र की स्थापना ही अंतरराष्ट्रीय शांति और सुरक्षा को बढ़ावा देने के उद्देश्य से हुई थी। आज आवश्यकता इस बात की है कि बहुपक्षीय संस्थाएं अधिक प्रभावी, प्रतिनिधित्वपूर्ण और जवाबदेह बनें। संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंतोनियो गुतारेस ने 2026 के संदेश में कूटनीति, संवाद, बातचीत, शांति स्थापना, मानवाधिकार और सतत विकास में निवेश को स्थायी शांति के महत्वपूर्ण साधन बताया है।

भारत की शांति-दृष्टि भी इस संदर्भ में महत्वपूर्ण है। पंचशील के सिद्धांत-एक-दूसरे की संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता का सम्मान, आक्रामकता से परहेज, आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप न करना, समानता एवं पारस्परिक लाभ तथा शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व-अंतरराष्ट्रीय संबंधों में संवाद और सह-अस्तित्व की अवधारणा को मजबूत करते हैं। महावीर का अहिंसा संदेश, बुद्ध की करुणा, गांधी का सत्य-अहिंसा दर्शन और आधुनिक भारत की शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व की परंपरा दुनिया को यह स्मरण कराती है कि शक्ति का सर्वाेच्च रूप विनाश नहीं, संयम और मानवीयता है। शांति केवल सरकारों की जिम्मेदारी भी नहीं है। घर में संवाद, विद्यालय में सहिष्णुता, समाज में भाईचारा और डिजिटल माध्यमों पर जिम्मेदार भाषा-ये सब विश्वशांति की ही छोटी इकाइयां हैं। आज सोशल मीडिया पर नफरत, झूठी सूचनाएं और उकसाने वाली भाषा सामाजिक तनाव को बढ़ाती हैं। इसलिए डिजिटल शांति भी 21वीं सदी की एक बड़ी आवश्यकता है। बच्चों और युवाओं को विवाद का उत्तर हिंसा से नहीं, तर्क, संवाद और सहानुभूति से देना सिखाना होगा।

सफेद कबूतर शांति का प्रतीक जरूर है, लेकिन अब प्रतीकों से आगे बढ़कर शांति की ठोस संरचना बनाने का समय है। युद्ध रोकने के लिए कूटनीति, नागरिकों की रक्षा के लिए अंतरराष्ट्रीय कानून, पीड़ितों के लिए मानवीय सहायता, विवादों के समाधान के लिए मध्यस्थता और युद्ध के बाद पुनर्निर्माण के लिए वैश्विक सहयोग-इन सभी को समान महत्व देना होगा। आज दुनिया को यह स्वीकार करना होगा कि किसी देश की सुरक्षा दूसरे देश की असुरक्षा पर स्थायी रूप से आधारित नहीं हो सकती। किसी एक क्षेत्र का युद्ध धीरे-धीरे ऊर्जा, व्यापार, पर्यावरण और वैश्विक अर्थव्यवस्था को प्रभावित करता है। इसलिए शांति अब किसी एक राष्ट्र का विषय नहीं, पूरी मानवता का साझा हित है। अंतर्राष्ट्रीय शांति दिवस हमें यह संकल्प लेने का अवसर देता है कि हम केवल युद्ध समाप्त होने की प्रतीक्षा न करें, बल्कि अपने-अपने स्तर पर शांति की संस्कृति विकसित करें। संयुक्त राष्ट्र का 2026 का संदेश भी इसी दिशा में है-शांति सम्मेलन कक्षों में ही नहीं, बल्कि विद्यालयों, मोहल्लों, परिवारों और समाजों में भी निर्मित होती है।

मनुष्य ने विज्ञान से आकाश जीत लिया, समुद्र की गहराइयां नाप लीं और अंतरिक्ष तक पहुंच बना ली; अब उसे अपने भीतर की हिंसा पर विजय प्राप्त करनी है। युद्ध की राख से यदि शांति का संसार बनाना है तो हथियारों से अधिक विश्वास, शक्ति से अधिक संवाद और प्रतिस्पर्धा से अधिक सहयोग में निवेश करना होगा। यही अंतर्राष्ट्रीय शांति दिवस का वास्तविक संदेश है-दुनिया को युद्ध से विराम ही नहीं, शांति को स्थायी जीवन-पद्धति बनाना होगा।

- ललित गर्ग
लेखक, पत्रकार, स्तंभकार

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