Gyan Ganga: हनुमान जी ने माता सीता के सभी संदेहों को किस प्रकार दूर किया?

By सुखी भारती | Mar 08, 2022

भगवान श्रीराम जी ने पवनपुत्र श्रीहनुमान जी को अपने संदेश में यही कहा था, कि आप श्रीसीता जी को मेरे बल और विरह का स्मरण दिलाना। प्रभु के विरह का तो, श्रीहनुमान जी ने ऐसा किया, कि वैदेही जी का दुख हरता गया। और वे प्रेम मगन हो मुग्ध सी हो गई। अब समय था, कि श्री हनुमान जी प्रभु की दूसरी आज्ञा का अनुपालन करते। अर्थात माता सीता जी को प्रभु के बल का व्याख्यान सुनाते। श्रीहनुमान जी जानते थे, कि माता सीता जी रावण द्वारा इतनी प्रताडि़त हुई हैं, कि वे तो श्रीराम जी के आने की उम्मीद ही खोये बैठी थी। उन्हें तो यही लगने लगा था, कि प्रभु ने उन्हें विसार ही दिया है। यह तो श्रीहनुमान जी ने प्रभु के, श्रीसीता जी के प्रति, प्रेम का ऐसा चित्रण किया, कि माता सीता जी को प्रभु से मिलन निश्चित दिखाई देने लगा। प्रभु श्रीराम जी ने अपने संदेश में, जो बल और विरह का चित्रण करने को कहा था, उसमें ऐसा कहीं कोई वर्णन नहीं किया था, कि पहले मेरे बल की चर्चा करनी है, अथवा मेरे विरह की। यह तो श्रीहनुमान जी का ही भक्ति तप था, कि उन्होंने पल झपकते ही समझ लिया, कि माता की मनःस्थिति रावण के अत्याचारों से भी इतनी व्यथित नहीं है, जितनी कि प्रभु श्रीराम जी द्वारा, उन्हें भूल जाने की कल्पना से व्यथित थी। इसलिए मईया सीता जी को सर्वप्रथम तो इस भय को लेकर निश्चित व आश्वस्त करना था, कि प्रभु ने उन्हें विसारा नहीं, अपितु वे तो उन्हीं के प्रेम सागर में पूरे डूबे हुए हैं। श्रीहनुमान जी तो ठहरे गज़ब के ‘साइक्लोजेस्ट’। वे जानते हैं, कि श्रीसीता जी को यह तो धीरज हो गया, कि प्रभु श्रीराम उन्हें भूले नहीं हैं। तो निश्चित ही अब उन्हें, यह भ्रम उत्पन्न होगा, कि श्रीराम जी इतना विशाल सागर पार कर, भला यहाँ तक पहुँचेगे कैसे? हो सकता है, कि माता सीता जी प्रभु के बल पर भी तनिक संदेह सा उत्पन्न करें। तो श्रीहनुमान जी ने सोचा कि हे मईया! हम वानरों पर, आप अपना संदेह व्यक्त करें, तो यह उचित भी जान पड़ता है। लेकिन अगर आप, श्रीराम जी के सामर्थ व बल पर ही संदेह कर बैठी, तो निश्चित ही यह घोर अनर्थ व पाप हो जायेगा। तो श्रीहनुमान जी पहले ही प्रभु श्रीराम जी के बल व प्रभुता का बखान करने लगे-

जननी हृदयँ धीर धरु जरे निसाचर जानु।।’

श्रीहनुमान जी ने प्रभु श्रीराम जी के बल व प्रभुता का ऐसा दावा ठोका, कि एक ही उदाहरण में संपूर्ण सार कह डाला। श्रीहनुमान जी बोले, कि माता आप तो निश्चित ही प्रभु के बल से पूर्णतः अवगत होंगी। श्रीराम जी का तो बल ही ऐसा है, कि समस्त राक्षस जन तो मात्र कुछ पतंगों से अधिक नहीं हैं। पतंगा अपने आप को कितना भी गरुड के समान, भले ही क्यों न समझे। लेकिन वह अपने मतिभ्रम के चलते, अगर अग्नि से भिड़ने की गलती करता है, तो जानते हैं न, कि क्या परिणाम निकलता है? पतंगे को वहीं पर, अग्नि की लपटों में ही भस्म होना पड़ता है। इससे पहले श्रीहनुमान जी ने अत्याधिक बल देकर कहा था, कि-

‘कह कपि हृदयँ धीर धरु माता।

सुमिरु राम सेवक सुखदाता।

उर आनहु रघुपति प्रभुताई।

सुनि मम बचन तजहु कदराई।।’

अर्थात हे माते! सर्वप्रथम तो आप अपने हृदय में धैर्य धारण करें। और अपने सेवको को सुख देने वाले श्री रघुपति जी का स्मरण करो। उनकी प्रभु को हृदय में लाओ। और मेरे वचन सुन कर कायरता छोड़ दो। श्रीहनुमान जी जानते हैं, कि एक भक्त का विश्वास, अगर पल प्रतिपल डगमग डोलता रहेगा। तो प्रभु को अपनी कृपा के चरण स्थापित करने के लिए, स्थान ही कहाँ मिलेगा। ठीक है, परिस्थितिवश माता सीता जी के हृदय को बहुत आघात पहुँचा होगा। लेकिन ऐसे में हथिआर फेंक कर, हाथ पे हाथ रख कर भी तो नहीं बैठ सकते न। तो ऐसे में साधक को अपने प्रभू के दिव्य चरित्रें का स्मरण करना चाहिए-‘उर आनहु रघुपति प्रभुताई।’ जब साधक अपने प्रभु की किन्हीं दिव्य घटनायों का चिंतन करता है। तो उसके हृदय को भक्ति का पौषण प्राप्त होता है। और उस साधक का भय दूर होता है। श्रीहनुमान जी बातों ही बातों में, अब एक ऐसी बात भी कह देते हैं, कि यह पंक्ति पड़कर मन में प्रश्न उत्पन्न होना स्वाभाविक है। श्रीहनुमान जी कहते हैं-

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‘जौं रघुबीर होति सुधि पाई।

करते नहिं बिलबु रघुराई।।

राम बान रबि उएँ जानकी।

तम बरुथ कहँ जातुधान की।।’

श्रीहनुमान जी के यह वचन, कि हे माते! प्रभू तो यहाँ कब के आपके पास पहुँच जाते। लेकिन उन्हें खबर ही नहीं हो पाई, कि आप यहाँ लंका में रावण की कैद में हैं। सज्जनों श्रीहनुमान जी जैसा उच्च कोटि का साधक क्या सच में ऐसे वाक्य कहेगा, कि प्रभु को आपकी खबर ही नहीं मिल पाई। कोई जिज्ञासु अगर श्रीहनुमान जी से यह प्रश्न पूछ लेता, कि श्रीराम जी को ही अगर, श्रीसीता जी का पता मालूम नहीं था, तो क्या यहाँ यह सिद्ध नहीं होता, कि श्रीराम जी तो एक साधारण जनमानस हैं। वे कहीं के भी कोई प्रभु अथवा अवतार नहीं हैं। निश्चित ही यह प्रश्न उचित व न्याय संगत है। सज्जनों इन पंक्तियों का वास्तव में सीधे-सीधे यह अर्थ नहीं है, कि प्रभु को माता सीता के लंका में होने की सुधि ही नहीं थी। वास्तव में श्रीराम जी कहना चाह रहे हैं, कि जब हमने श्रीसीता जी को उनकी सेवा निर्धारित कर, उन्हें उनके अमुक स्थान पर पहुँचा ही दिया था। तो हमें उनकी सेवा निर्धारित करते समय, यह तनिक भी भय अथवा भ्रम नहीं था, कि उस सेवा कार्य काल में माता सीता जी अपना धैर्य भी खोयेंगी। वे ऐसा सोच बैठेंगी, कि मैंने उनका विस्मरण ही कर दिया है। निश्चित ही अगर हमने ऐसी सुधि पाई होती, कि हमारी परम प्रिय भक्त व अर्धांगिनी, अपना संपूर्ण धैर्य खोकर, शोक की गहन खाई में समाती जा रही हैं, तो निश्चित ही हम कोई वानरों की सेना को आपकी खोज में नहीं लगाते। हम स्वयं ही या तो आपके समीप पहुँच जाते, नहीं तो आपको ही अपने पास बुला लेते। लेकिन चाह कर भी आपके मन में ऐसा संदेह उत्पन्न नहीं होने देते, कि हम आपको भूल गए। अथवा हमारे बाणों में कोई प्रभाव व बल नहीं है। कारण कि हमारे बाण सूर्य के समान हैं, और राक्षस गण तम के समान। भला सूर्य उदय होते ही, क्या अँधकार का अस्तित्व रह सकता है? नहीं न।

श्रीहनुमान जी और माता सीता जी के मध्य और क्या वार्ता होती है। जानेंगे अगले अंक में---(क्रमशः)---जय श्रीराम।

- सुखी भारती

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