Gyan Ganga: जाम्बवान ने हनुमानजी को समुद्र पार करने के लिए कैसे हौसला दिया ?

By सुखी भारती | Sep 28, 2021

वानरों को तो लगा था कि सम्पाती हमको ऐसा रास्ता बतायेंगे कि बस चुटकी भर में हम मोर्चा जीत लेंगे। वन तो चलो हमारा घर था, और वनों में हमें क्या कोई दूरी का भान। लेकिन यहां तो हमारे समक्ष इतना विशाल समुद्र है। इसे लांघना भला किसके वश की बात है? वानरों को यूं निराश देख सम्पाती सबको धैर्य बंधाते हुए कहते हैं, कि मुझे तो आश्चर्य हो रहा है, कि आप लोग यूं निराश हो ही कैसे सकते हैं? कारण कि आप कोई अपने व्यक्तिगत कार्य हेतु यात्र पर नहीं निकले हैं। यह कार्य तो साक्षात श्रीराम जी का है। उन्होंने मार्ग दिया है, तो निश्चित ही वे इस मार्ग पर चलने का बल व बुद्धि भी देंगे। वे साक्षात नारायण हैं, भला उनसे अपने भक्त की अड़चनें व बाधायें, कैसे छुपी रह सकती हैं? उनकी लीला, जो अभी मेरे साथ घटी, वो तो आप सभी ने देख ही ली है। मेरा शरीर कैसा बेहाल था, अर्थात बिना पंख वाला था। लेकिन श्रीराम जी कृपा से मेरे पंख वापिस आ गए, और मैं भी सुंदर शरीर वाला हो गया-

इसे भी पढ़ें: Gyan Ganga: समुद्र लांघने की बात सुन कर क्यों निराश हो गये थे सभी वानर?

‘मोहि बिलोकि धरहु मन धीरा। 

राम कृपाँ कस भयउ सरीरा।।’ 


कमाल है, यह नन्हां-सा सागर देख कर ही तुम सब साहस हार कर बैठ गए। श्रीराम जी का नाम कोई कम महिमा से ओत-प्रोत है? उनके नाम सुमिरन के बल से तो, बड़े से बड़ा पापी भी, चौरासी लाख योनियों का भवसागर पार हो जाया करता है। और तुम लोग यही सोच परेशान हो कि यह छोटा-सा समुद्र कैसे पार हो। यूं नाहक चिंतित होने की आवश्यक्ता नहीं। तुम सब प्रभु के नाम सुमिरन का सहारा लेकर तो देखो, देखना समस्त बाधायें कैसे दूर होती हैं-


‘पापिउ जाकर नाम सुमिरहीं।

अति अपार भवसागर तरहीं।।

तासु दूत तुम्ह तजि कदराई।

राम हृदयँ धरि करहु उपाई।।’


तुम लोगों की यात्रा का तो अभी आरम्भ ही अब हुआ मानो। कारण कि यात्र तो तभी सार्थक समझनी चाहिए, जब लक्ष्य की दिशा व दशा निर्धारित हो। जो कि अभी ही निर्धारित हुई है। वरना इससे पहले तो खोज के रूप में केवल भटकना ही थी। और लक्ष्य दिखाई पड़ जाये, तो तन-मन में प्रसन्नता व उत्साह उमड़ पड़ना चाहिए। लेकिन तुम कैसे श्रीराम जी के दूत हो, कि यूं निराश होकर बैठ गए? काकभुशुण्डिजी कहते हैं कि सम्पाती जी जब अपने यह वचन कह कर चले गए, तो सम्पाती के इन वचनों को सुन सभी वानरों को बड़ा विस्मय हुआ। उन्हें लगा कि अरे! हम नाहक ही उम्मीद का पल्लू छोड़े बैठे थे। नहीं-नहीं! हमें श्रीराम जी के पावन नाम को कलंकित नहीं करना है। हमें प्रयास करने में अपना समस्त बल लगा देना चाहिए। तो ऐसा करते हैं कि सभी वानर अपना-अपना बल कह कर सुनायेंगे। सभी वानर अपना बल व सामर्थ्य का बखान करने लगे। कोई वानर कहे कि मैं दो यौजन ही जा सकता हूं। कोई दस यौजन, तो कोई-कोई तो दस-दस योजन पार करने की बात कह रहे थे। हर वानर को मानों पंख से लगे हुए थे। पर अपने हौंसलों के इन पंखों की उड़ान किसी की भी ऐसी नहीं थी कि कोई कहे कि हाँ! मैं उस पार जा सकता हूँ। यह देख वीर अंगद ने कहा कि मैं सागर के उस पार जाने में समर्थ हूँ- ‘अंगद कहइ जाउँ मैं पारा।।’ सागर को लांघने में तो मुझे कोई संदेह नहीं। लेकिन---! सभी वानरों को वीर अंगद की घोषणा जब सुनी तो एक बार तो सभी खुशी से उछल पड़े कि चलो अब यह तो समस्या का समाधान निकला न कि हममें से कोई तो सागर उस पार जाने का सामर्थ्य वाला तो निकला। लेकिन जैसे ही वीर अंगद ने कहा कि मैं पार तो चला जाऊँगा, लेकिन-

इसे भी पढ़ें: Gyan Ganga: जटायु की वीरता व सेवा भाव देख कर उनके भाई सम्पाती ने क्या कहा ?

‘जियँ संसय कछु फिरती बारा।।’ 

 

अर्थात लंका नगरी पहुँचने में कोई बाधा नहीं है। लेकिन हाँ वापिस आने में मुझे संदेह हो रहा है। यह सुन सभी वानर उदास हो गए। वे हैरान हो रहे थे, कि हर बार बड़ी मुश्किल से कोई समाधान निकलता दिखाई प्रतीत होता है। और उसी समय वह मार्ग भी बंद होता सिद्ध होता है। आखिर हमारा भाग्य इतना खोटा क्यों है? जाम्बवान ने वीर अंगद को भी जब फिर से यूं अवसाद में घिरते से देखा, तो वीर अंगद को हौसला व उत्साह देते हुए कहते हैं कि हे वीर अंगद! ऐसा कुछ भी नहीं कि तुम किसी भी प्रकार से अयोग्य हो। इसके स्थान पर अगर तुम यह कहते कि आप समुद्र लांघ उस पार जा भी सकते हैं और वापिस भी आ सकते हैं। तो भी मैं आपका लंका नगरी जाने का कभी भी समर्थन न करता। कारण कि आप सबक नेता हो, और आपको भला कैसे भेजा जा सकता है-


‘जामवंत कह तुम्ह सब लायक। 

पठइअ किमि सबही कर नायक।।’ 


जाम्बवान ने देखा कि समस्त वानर अपने-अपने सामर्थ्य का बखान किए जा रहे हैं। वानरों की मानों छोटी से छोटी इकाई ने भी अपने-अपने बल का बखान कर दिया था। लकिन बल के धाम, समस्त कलाओं के धनी श्रीहनुमान जी अभी तक इस पूरे दृश्य से मानो गायब थे। जाम्बवान जी की दृष्टि में श्री हनुमान जी अभी तक आये ही नहीं थे। जाम्बावान जी स्वयं पर भी हैरान थे, कि अभी तक उन्होंने श्रीहनुमान जी को इस पूरे प्रकरण में एक बार भी पूछा तक क्यों नहीं। वे भी तो लंका पुरी जा ही सकते हैं। फिर उन जैसा साहस व बल तो तीनों में किसी में नहीं। लेकिन यह क्या श्रीहनुमान जी कहीं दिखाई क्यों नहीं दे रहे। कहां हैं पवनसुत श्रीहनुमान जी। अरे! वो तो वे रहे। सबसे अलग-थलग। और पता नहीं कौन-सी चिंतन में मग्न हैं।


जाम्बवान जी श्रीहनुमान जी को क्या वाक्य कहते हैं। और क्या श्रीहनुमान जी समुद्र पार जाने को तत्पर होते हैं, अथवा नहीं। जानेंगे अगले अंक में...(क्रमशः)...जय श्रीराम...!


- सुखी भारती

All the updates here:

प्रमुख खबरें

Israel की धरती पर उतरते ही PM Modi ने रचा इतिहास, Netanyahu के साथ द्विपक्षीय वार्ता में सुदर्शन चक्र को सशक्त बनाने पर रहेगा जोर

Army, Navy और BSF का संयुक्त अभियान बना प्रेरणा का प्रतीक, National War Memorial पर ‘भारत रणभूमि दर्शन’ अभियान का भव्य समापन

Travel Tips: पहाड़ों पर बिछी बर्फ की चादर! ये Winter Destination बने जन्नत, बना लें घूमने का शानदार Plan

PM Modi की Israel यात्रा पर Congress का बड़ा हमला, पवन खेड़ा ने पूछा- किसके कहने पर जाते हैं विदेश?