Pahalgam कैसे बना देश के पहले प्रधानमंत्री का लॉस्ट वेकेशन डेस्टिनेशन? जब इंदिरा-राजीव-संजय को लेकर कश्मीर की वादियों में पहुंचे नेहरू

By अभिनय आकाश | May 20, 2025

पाकिस्तान वो मुल्क है जहां प्रधानमंत्री तो बदलते रहते हैं लेकिन आतंकवाद को बदलने की नीति नहीं बदलती। नवाज शरीफ आए तो भारत ने उरी का दंश झेला। इमरान खान के आने पर पुलवामा जैसी साजिश को अंदाज दिया गया। शहबाज शरीफ ने पहलगाम दिया। हर बार पाकिस्तान की वही कहानी है। आतंकवाद शिविर अपने घरों में लगाते हैं। हिंदुस्तान पर हमला करते हैं। उसके बाद भारत रिएक्ट करता है तो दुनिया के सामने हम निर्षोष हैं का गाना गाते हैं। जम्मू-कश्मीर का पहलगाम जहां 22 अप्रैल को हुए आतंकी हमले के बाद भारत ने ऑपरेशन सिंदूर लॉन्च कर पाकिस्तान को घर में घुसकर मारा। पहलगाम, जहां पिछले महीने पाकिस्तान समर्थित आतंकवादियों ने 26 निर्दोष नागरिकों की हत्या कर दी थी। पहलगाम की कायराना आतंकी वारदात की कहानी तो पूरे देश को पता है।लेकिन क्या आपको पहलगाम से जुड़ी देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू की कहानी मालूम है? नहीं मालूम तो चलिए हम बता देते हैं। 

मई 1964 में अपने निधन से ग्यारह महीने पहले नेहरू ने जम्मू और कश्मीर के इस खूबसूरत पर्यटक स्थल पर अपनी बेटी इंदिरा गांधी के साथ 10 दिन की छुट्टियां बिताईं। यह नेहरू की आखिरी हॉलीडे थी। पहलगाम उस समय पर्यटकों के लिए पहले से ही एक पसंदीदा जगह थी। आजादी से पहले ही सड़क मार्ग से सुलभ होने के कारण यह यूरोपीय और भारतीयों दोनों को आकर्षित करता था। अपनी 1943 की किताब कश्मीर: द प्लेग्राउंड ऑफ एशिया में सच्चिदानंद सिन्हा ने पहलगाम के बारे में बहुत ही शानदार लिखा, जो अपने भव्य पर्वतीय दृश्यों, परिवहन सुविधाओं, कैंपिंग, मछली पकड़ने और मनमोहक जलवायु के लिए बेजोड़ है। सिन्हा ने बैसरन का भी उल्लेख किया, जो देवदार के जंगलों से होकर दो मील का रास्ता है, यह वही घाटी है जहां 22 अप्रैल को पाकिस्तान समर्थित आतंकवादियों ने हमला किया था। 

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राजनीतिक चुनौतियों के बीच पहलगाम में छुट्टी

साल 1962 में नेहरू की कांग्रेस ने लोकसभा की 494 सीटों में से 361 सीटें जीतकर सत्ता में तीसरा कार्यकाल शुरू किया था। उसी साल बाद में भारत चीन युद्ध उनके लिए बड़ा झटका साबित हुआ। अगस्त 1963 में उनकी सरकार को पहली बार अविश्वास प्रस्ताव का सामना करना पड़ा। तमाम घटनाक्रमों के बीच जून 1963 में नेहरू का त्यागपत्र एक उथल-पुथल भरे समय में आया, क्योंकि प्रधानमंत्री बढ़ती राजनीतिक चुनौतियों, अपने बिगड़ते स्वास्थ्य और चीन के साथ 1962 के युद्ध के बाद की स्थिति से जूझ रहे थे। नेहरू 18 जून 1963 को श्रीनगर पहुंचे। उनके साथ इंदिरा और उनके दो पोते राजीव गांधी और संजय गांधी थे, जो उस समय क्रमशः 18 और 16 वर्ष के थे।

कश्मीर से पाकिस्तान को दिया संदेश

 परिवार श्रीनगर के चश्मे शाही गेस्ट हाउस में रुका। जिस दिन वे श्रीनगर पहुंचे, उस दिन सुबह नेहरू ने गेस्ट हाउस में राज्य के मंत्रियों, राज्य विधानसभा के अध्यक्ष और उपाध्यक्ष तथा विधान परिषद के अध्यक्ष के साथ चाय पर बैठक की। श्रीनगर में नेहरू ने नेशनल कॉन्फ्रेंस के कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए कहा कि चीन-पाकिस्तान गठबंधन कश्मीर में पाकिस्तान के लिए मददगार नहीं होगा। श्रीनगर से नेहरू लगभग 90 किलोमीटर दूर पहलगाम गए। वहां प्रधानमंत्री ज्यादातर राजनीतिक गतिविधियों से दूर रहे। हालांकि, 21 जून को नेहरू ने आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री नीलम संजीव रेड्डी को पत्र लिखकर उन्हें आश्वस्त किया कि उस समय फैली कुछ अफ़वाहें कि उन्हें (रेड्डी को) उनके पद से हटा दिया जाएगा, निराधार थीं। नेहरू ने रेड्डी को लिखा कि उन्हें अफ़वाहों के लिए खेद है।

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बीजू पटनायक के साथ की बैठक

बीजू पटनायक 24 जून को वहां उनसे मिले। फिर नेहरू ने पहलगाम में उड़ीसा (ओडिशा) के मुख्यमंत्री बीजू पटनायक के साथ भी बैठक की। जाहिर तौर पर मंत्रिमंडल में फेरबदल की योजना को लेकर दोनों के बीच बातचीत हुई होगी। 26 जून को नेहरू ने पहलगाम से लगभग 12 किलोमीटर दूर अरु घाटी का दौरा किया। उन्होंने कोलाहोई ग्लेशियर का भी दौरा किया, जो लिद्दर नदी का मुख्य स्रोत है, जो पहलगाम से होकर बहने वाली झेलम की सहायक नदी है। 28 जून को नेहरू दिल्ली लौट आए। 

श्रीनगर में हुआ भव्य स्वागत

श्रीनगर में सदर-ए-रियासत डॉ. करण सिंह और जम्मू-कश्मीर के प्रधानमंत्री बख्शी गुलाम मोहम्मद ने उन्हें विदा किया। दिल्ली में प्रधानमंत्री का स्वागत हवाई अड्डे पर वित्त मंत्री मोरारजी देसाई, गृह मंत्री लाल बहादुर शास्त्री, खाद्य एवं कृषि मंत्री एस के पाटिल, वैज्ञानिक अनुसंधान एवं संस्कृति मंत्री हुमायूं कबीर और कैबिनेट सचिव एस एस खेड़ा सहित गणमान्य लोगों ने किया।

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