Sam Manekshaw Death Anniversary: Sam Manekshaw को कैसे मिला 'सैम बहादुर' नाम, जानें गोरखा कनेक्शन

By अनन्या मिश्रा | Jun 27, 2026

फील्ड मार्शल सैम मानेकशॉ का 27 जून को निधन हो गया था। वह गोरखा रेजीमेंट के अफसर थे। मानेकशॉ आजादी से पहले सेना में शामिल हुए थे। वह ब्रिटिश रॉयस इंडियन आर्मी में फ्रंटियर रेजीमेंट में शामिल हुए थे। लेकिन देश के बंटवारे के बाद यह रेजीमेंट पाकिस्तान चला गया था और मानेकशॉ गोरखा रेजीमेंट में आ गए। यहीं पर गोरखा सैनिक उनको सैम बहादुर के नाम से पुकारने लगे थे। तो आइए जानते हैं उनकी डेथ एनिवर्सरी के मौके पर सैम मानेकशॉ के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...

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साल 1971 की जीत

जब भारत ने साल 1971 के युद्ध में सैन्य ताकत के बल पर पाकिस्तान को घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया था। तो आर्मी चीफ सैम मानेकशॉ इसके हीरो के रूप में उभरे थे। उन्होंने रणनीति बनाने के साथ सेना की अगुवाई की थी। सिर्फ 14 दिनों में पाकिस्तान की हार तय कर दी थी। साल 1973 में रिटायर होने के एक दिन पहले सैम मानेकशॉ को फील्ड मार्शल की उपाधि दी गई थी।

बेबाक थे मानेकशॉ

सैम मानेकशॉ ने साल 1971 में देश की तत्कालीन पीएम इंदिरा गांधी से कहा था कि अभी सेना युद्ध के लिए तैयार नहीं है। उन्होंने इंदिरा गांधी से आग्रह किया कि उनको कुछ महीनों का समय दिया जाए। जिसके बाद इंदिरा गांधी ने उनकी बात मान ली और दिसंबर 1971 में भारत-पाकिस्तान युद्ध शुरू हुआ और भारत को जीत मिली।

लगी थीं 7 गोलियां

दूसरे विश्व युद्ध के दौरान बर्मा मौर्चे पर मानेकशॉ को जापानी सैनिकों के खिलाफ मशीन गन की 7 गोलियां लगी थी। यह गोलियां मानेकशॉ के जिगर, आंतों और गुर्दे पर लगी थी। लेकिन इसके बाद भी मौत उनको छू भी नहीं सकी और खुद डॉक्टर भी उनकी हालत देखकर उनके बचने की उम्मीद छोड़ चुके थे। लेकिन सैम मानेकशॉ ने मौत को भी हरा दिया था।

मृत्यु

शानदार मिलिट्री करियर के बाद 27 जून 2008 को सैम मानेकशॉ का निधन हो गया था।

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