By अभिनय आकाश | Sep 24, 2026
दोनों तरफ तनाव बराबर बना था। 8-9 मई की दरमियानी रात सीमा पार से आए पाकिस्तानी ड्रोन्स और मिसाइलों ने भारतीय हवाई क्षेत्र में घुसपैठ की कोशिश में लगे थे। तब आसमान में भारत का अभेद्य रक्षा कवच बनकर उभरा स्वदेशी मिसाइल सिस्टम ‘आकाश’। सेकंडों के भीतर दुश्मन के हर हवाई खतरे को भांपना और सटीक प्रहार से उन्हें हवा में ही नेस्तनाबूद कर देना, आकाश ने न केवल अपनी अचूक मारक क्षमता साबित की, बल्कि यह भी दिखा दिया कि आधुनिक युद्धक्षेत्र में भारत की आत्मनिर्भरता कितनी घातक और तैयार है। लेकिन किसी भी हथियार की ताकत सिर्फ उसकी धातु या बारूद में नहीं, बल्कि उसके पीछे काम करने वाले वैज्ञानिक दिमाग में होती है। देश की सुरक्षा का यह मजबूत स्तंभ यूं ही नहीं खड़ा हुआ। इसके मूल में वर्षों की अथक तपस्या और एक असाधारण वैज्ञानिक डॉ. प्रहलाद रामाराव की दूरदर्शिता शामिल है। कर्नाटक की माटी से निकले रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) के इस दिग्गज वैज्ञानिक ने भारत के मिसाइल कार्यक्रम को नई दिशा दी। डॉ. रामाराव के नेतृत्व और तकनीकी सूझबूझ का ही नतीजा है कि भारत ने जमीन से हवा में मार करने वाली ऐसी स्वदेशी प्रणाली विकसित की, जो आज हर आसमानी चुनौती का माकूल जवाब बन चुकी है। आकाश मिसाइल सिस्टम की यह सफलता केवल एक सैन्य अभियान की विजय नहीं है, बल्कि यह डॉ. प्रहलाद रामाराव जैसे खामोश कर्मयोगियों की वैज्ञानिक प्रतिभा और भारत की संप्रभुता की वह गूंज है, जिसने सीमा पार बैठे दुश्मनों को स्पष्ट संदेश दे दिया है कि भारत का आकाश अब पूरी तरह अभेद्य है।
डॉ. रामाराव के अनुसार, आकाश मिसाइल परियोजना की शुरुआत साल 1994 में हुई थी और उस समय इसके लिए करीब 300 करोड़ रुपये का शुरुआती बजट आवंटित किया गया था। किसी भी नई और अत्याधुनिक तकनीक को विकसित करने की राह कभी आसान नहीं होती। शुरुआती दौर में टीम को कई असफलताओं का भी सामना करना पड़ा, लेकिन वैज्ञानिकों ने हर नाकामी से जरूरी सबक लिया और आगे बढ़ते रहे। इस पूरे मिशन में सबसे पेचीदा और मुश्किल काम ‘राजेंद्र’ नामक मल्टी-फंक्शन इलेक्ट्रॉनिकली स्कैन्ड फेज्ड ऐरे रडार को तैयार करना था। यह जटिल रडार सिस्टम ही आकाश मिसाइल की असली आंख और दिमाग था। रक्षा वैज्ञानिकों ने इस बड़ी तकनीकी चुनौती को सफलतापूर्वक पार कर दिखाया। बाद में परियोजना के दायरे और तकनीक को और अधिक उन्नत बनाने के लिए इसके बजट को बढ़ाकर 500 करोड़ रुपये कर दिया गया था।
आकाश, भारत के मिसाइल प्रोग्राम में डॉ. रामाराव के बड़े योगदान का सिर्फ़ एक हिस्सा है। अपने करियर के दौरान, उन्होंने लगभग 10 अलग-अलग मिसाइल सिस्टम पर काम किया है, जिनमें ज़मीन से हवा में और हवा से हवा में मार करने वाली मिसाइलें शामिल हैं। उन्होंने अस्त्र और ब्रह्मोस जैसी मिसाइलों को विकसित करने में अहम भूमिका निभाई; ब्रह्मोस रूस के साथ मिलकर बनाया गया एक जॉइंट वेंचर है और यह भारत के सबसे सफल सटीक निशाना लगाने वाले हथियारों में से एक बन गया है। आज भारतीय सेना, नौसेना और वायु सेना इनमें से कई सिस्टम का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल कर रही हैं। इनकी सफलता ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी लोगों का ध्यान खींचा है। आर्मेनिया जैसे देशों ने आकाश सिस्टम और पिनाका रॉकेट लॉन्चर के लिए ऑर्डर दिए हैं, जो एक भरोसेमंद डिफेंस एक्सपोर्टर के तौर पर भारत के उभरने को दिखाता है। डॉ. रामाराव का मानना है कि भारतीय मिसाइलें ग्लोबल खरीदारों के लिए एक बेहतरीन विकल्प हैं, हमारे सिस्टम किफायती हैं, चलाने में आसान हैं और बेहतरीन परफॉर्मेंस देते हैं। यही बात उन्हें ग्लोबल मार्केट में सबसे अलग बनाती है।
भारत के प्रतिष्ठित नागरिक सम्मान ‘पद्मश्री’ से अलंकृत वैज्ञानिक डॉ. प्रहलाद रामाराव 79 वर्ष के हो चुके हैं। डीआरडीओ में दशकों तक देश की मिसाइल तकनीक को संवारने वाले इस वरिष्ठ वैज्ञानिक ने ‘आकाश’ मिसाइल की शानदार सफलता पर गर्व जताते हुए इसे अपने जीवन का सबसे यादगार और सुखद पल करार दिया। स्वदेशी ‘आकाश मिसाइल डिफेंस सिस्टम’ भारत के रक्षा इतिहास में एक मील का पत्थर है। अत्याधुनिक तकनीक से लैस यह वायु रक्षा प्रणाली न केवल देश की सामरिक सीमाओं को अभेद्य बनाती है, बल्कि हर हवाई खतरे को नेस्तनाबूद कर राष्ट्रीय सुरक्षा तंत्र को अद्वितीय मजबूती भी देती है।