सरकार के काम करने का तरीका (व्यंग्य)

By संतोष उत्सुक | Dec 06, 2023

चुनाव जीतने पर नई सरकार चीते की तरह गुर्राने लगती है। समझदार सरकार अपना कार्यकाल दो साल निकाल देने के बाद पुन सत्ता में आने के लिए मेहनत शुरू कर देती है। सबसे ज़्यादा दबाव सरकार के मुखिया पर आता है। हो भी क्यूं न, सरकार बनाना कोई खेल नहीं और मुख्यमंत्री बनना किसी तहसील स्तरीय फुटबाल टीम का कप्तान बनना नहीं है। सैंकड़ों बैठकें करनी पड़ती हैं कि किस तरह, रंग, आकार व प्रकार की योजनाएं बनाई जाएं कि सरकार को पुन सत्ता में आना ही पड़े।

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बदली हुई सामाजिक, धार्मिक, आर्थिक परिस्थितियों के अनुसार अपने कामकाज में अविलम्ब बदलाव लाने चाहिएं। जो ख़बरें पढ़ने, सुनने व देखने में पसंद न आ रही हों उन्हें आधारहीन व तथ्य विहीन मानकर और कहकर उनका खंडन अविलम्ब छपवा देना चाहिए। किसी भी स्तर पर बैठे कर्मचारियों व अधिकारियों को किसी भी प्रकार और आकार की नकारात्मक ख़बरों को ऊपर वालों के संज्ञान में तुरंत लाना चाहिए। यह पता लगाकर छोड़ना चाहिए कि यह खबर क्यूं पकी और छपी क्यूं। यह भी अच्छी तरह समझाया जाता है कि अपने उचित अधिकारियों की सलाह लेकर विकासात्मक व प्रशंसायुक्त लेख लिखने के लिए प्रसिद्द, श्रेष्ठ पेशेवरों की सेवाएं लें और खर्च की परवाह न करें। ऐसे लेख और फीचर्ज़ को नियमित रूप से जितना ज़्यादा हो सके प्रकाशित करवाना सुनिश्चित करें।

इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के लिए विकासात्मक कहानियों वाली प्रभावोत्पादक फ़िल्में तैयार करवाएं। मीडिया को हर हालत में पटाकर रखें। फिर भी कुछ लोग सवाल करते हैं तो उनके लिए बढ़िया जवाब देऊ तंत्र पकाकर रखा जाए और तपाक से उन्हें खिला दिया जाए। ऊपर से नीचे तक, दाएं से बाएं तक तालमेल जमाकर रखें और निगरानी करते रहें। सकारात्मक प्रचार के लिए कुछ दिन बाद प्रेस नोट जारी कर देना चाहिए कि शासकीय प्रतिनिधि विकास की बारिश कर रहे हैं। आम जनता रेन डांस का मज़ा ले रही है और विपक्ष वाले, बिना छतरी, किनारे खड़े बिना तला पकौड़ा हो रहे हैं। यह काम ऐसे करना है कि निरंतर सफलता सुनिश्चित हो। सभी मंचों पर, ‘सब अच्छा है, सब बढ़िया है’ जैसा गाना बजते रहना चाहिए। लगातार मेहनत करने का कुछ फायदा ज़रूर होगा।

- संतोष उत्सुक

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