कितना जरूरी है सोशल मीडिया पर अंकुश? क्या है इसकी 'लक्ष्मण रेखा' जिसका जिक्र SC के जज ने किया, दूसरे देश कैसे रेगुलेट करते हैं

By अभिनय आकाश | Jul 04, 2022

अक्सर ये कहा जाता है कि लोकतंत्र के चार स्तंभ हैं। पहला विधायिका जो कि कानून बनाने का काम करती है।  दूसरा कार्यपालिका विधायिका द्वारा बनाए गए कानून को लोगों तक पहुँचाना व कानून को बरकरार रखना। तीसरा न्यायपालिका जिसका कार्य बनाए गए कानूनों की व्याख्या करना व कानून का उल्लंघन होने पर सज़ा का प्रावधान करना होता है। इससे कोई भी व्यक्ति शक्ति के आधार पर कानून का उल्लंघन करने में असमर्थ हो जाता है। चौथा पत्रकारिता पत्रकारिता जिसे मीडिया भी कहा जाता है को लोकतंत्र के चौथे स्तंभ के रूप में दर्जा मिला है। वहीं लोकतंत्र के पांचवे स्तंभ के रूप में सोशल मीडिया ने भी एक अहम स्थान लिया है। विभिन्न मौकों पर सोशल मीडिया का ही असर था चाहे वो दिल्ली के निर्भया से लेकर जेसिका लाल हत्याकांड तक में सोशल मीडिया की ताकत के सहारे ही जनसैलाब हाथों में कैंडिल और इंसाफ की मांग लिए सड़कों पर उमड़ पड़ा था। सोशल मीडिया एक बड़ी ताकत है और इसका दायरा भी बहुत बड़ा है। लेकिन ताकत अपने साथ ढेरों जिम्मेदारियां लेकर भी आता है, वो भी खासकर तब जब कि उसका रेंज वर्ल्ड वाइड हो। लेकिन क्या सोशल मीडिया अपनी जिम्मेदारी को सही से निभा रहा है। जवाब, शायद नहीं हो। क्योंकि समय-समय पर चाहे वो सरकार हो या फिर कोर्ट द्वारा उस पर अंकुश लगाने की मांग की जाती रही है। ऐसे में आइए जानते हैं कि क्या सोशल मीडिया इपने मकसद से भटक गया है? अन्य देशों में इसको लेकर क्या प्रावधना है और सबसे अहम सवाल कि आज हम इसकी चर्चा क्यों कर रहे हैं? 

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सुप्रीम कोर्ट (एससी) ने भाजपा की पूर्व प्रवक्ता नूपुर शर्मा को यह कहते हुए कड़ी फटकार लगाई कि वह पैगंबर मुहम्मद पर अपनी टिप्पणियों के साथ उदयपुर की क्रूर हत्याओं के लिए जिम्मेदार थीं और कहा कि उन्हें टीवी पर आकर "पूरे देश से माफी मांगनी चाहिए"। जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जेबी पारदीवाला की अध्यक्षता वाली बेंच ने कहा, "जिस तरह से उन्होंने देश भर में भावनाओं को प्रज्वलित किया है। देश में जो कुछ हो रहा है, उसके लिए यह महिला अकेली ही जिम्मेदार है। देश में आज भी लोग सुप्रीम कोर्ट के बारे में बात कर रहे हैं। लेकिन सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश की हालिया टिप्पणी को लेकर सोशल मीडिया पर सुप्रीम कोर्ट और इम्पिचमेंट यानी महाभियोग टॉप ट्रेंड में रहा। लोगों द्वारा जजों के इतिहास खंगाले जाने लगे और यहां तक की सरकार से महाभियोग के जरिये न्यायधीशों को हटाने की भी बात कही जाने लगी। सोशल मीडिया पर  बनते माहौले के बीच पैगंबर मुहम्मद पर टिप्पणी के लिए भाजपा की पूर्व प्रवक्ता नूपुर शर्मा को फटकार लगाने वाली सुप्रीम कोर्ट की बेंच का हिस्सा रहे जस्टिस जेबी पारदीवाला ने सोशल मीडिया के सख्त नियमों का आह्वान करते हुए दावा किया कि मीडिया ट्रायल कानून के शासन के लिए स्वस्थ नहीं हैं। न्यायमूर्ति जेबी पारदीवाला ने कहा कि सोशल मीडिया "आधे सच से ग्रसित है। साथ ही उन्होंने सोशल मीडिया पर नियंत्रण के लिए सख्त नियमों के साथ ही नियमन लागू करने की भी मांग की है। उन्होंने कहा कि मीडिया ट्रायल कानून के शासन के लिए स्वस्थ नहीं है। जस्टिस पारदीवाला ने कहा कि ये लक्ष्मण रेखा को पार कर जाता है और ये अधिक समसयाग्रस्त होता है, जब ये केवल आधे सत्य का पीछा करता है। 

प्रमुख अन्य देशों में सोशल मीडिया विनियम

भारत सोशल मीडिया को विनियमित करने का इरादा रखता है और सूचना प्रौद्योगिकी (मध्यवर्ती दिशानिर्देश और डिजिटल मीडिया आचार संहिता) नियम 2021 को पहले ही अधिसूचित किया जा चुका है। हालांकि, हम सोशल मीडिया नियमों को लागू करने वाले एकमात्र देश नहीं हैं। आइए देखें कि प्रमुख अन्य देशों में सोशल मीडिया के नियम भारत के नियमों से कैसे अलग हैं। 

संयुक्त राज्य अमेरिका

अमेरिका में कैपिटल हिल की हिंसा के बाद हजारों सोशल मीडिया हैंडल्स बैन किए गए। कई लोगों पर एक्शन हुआ। लेकिन अगर रेगुलेशन को लेकर देखा जाए तो अमेरिका सोशल मीडिया के सेल्फ रेगुलेशन का पक्षधर है> अमेरिका में टीवी-रेडियो, इंटरनेट आदि पर नियमन के लिए तो फेडरल कम्युनिकेशन कमीशन है लेकिन ऐसी कोई संस्था नहीं है जो सोशल मीडिया को लेकर तय कर सके कि क्या जाना चाहिए और क्या नहीं जाना चाहिए> हालांकि हाल में कई विवादित मुद्दों पर इन सोशल मीडिया कंपनियों के अधिकारियों को अमेरिकी संसद के सामने पेश होकर सफाई देनी पड़ी है। हालांकि, सोशल मीडिया को विनियमित करने के लिए संयुक्त राज्य अमेरिका में संचार सभ्यता अधिनियम की धारा 230 सबसे महत्वपूर्ण प्रावधान है। इसमें कहा गया है कि एक "इंटरैक्टिव कंप्यूटर सेवा" को तीसरे पक्ष की सामग्री का प्रकाशक या वक्ता नहीं माना जा सकता है। संयुक्त राज्य अमेरिका के वर्तमान राष्ट्रपति जो बाइडेन ने सार्वजनिक रूप से धारा 230 को पूरी तरह से निरस्त करने का प्रस्ताव रखा है। 

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अन्य विधेयक और सिफारिशें

यूरोपीय देशों में देखा जाए तो ब्रिटेन में लंबे समय से सोशल मीडिया कंपनियों के सेल्फ रेगुलेशन पर सरकार का जोर है। अमेरिका नें ब्रॉड लेवल पर सोशल मीडिया सेल्फ रेगुलेशन के आधार पर संचालित हो रही है। लेकिन अदालतों में शिकायतों के दौरान इन कंपनियों की जवाबदेही तय होती है इसलिए सेल्फ रेगुलेशन के नियम वहां काफी सख्ती से लागू भी होते है। ऑस्टेलिया ने 2019 में Sharing of Abhorrent Violent Material Act पारित किया। इसमें नियमों के उल्लंघन पर कंपनियों पर आपराधिक जुर्माना, 3 साल तक की जेल और कंपनी के ग्लोबल टर्नओवर के 10 फीसदी तक के जुर्माने की व्यवस्था है।  

ऑस्टेलिया 

ऑस्टेलिया ने 2019 में Sharing of Abhorrent Violent Material Act पारित किया। इसमें नियमों के उल्लंघन पर कंपनियों पर आपराधिक जुर्माना, 3 साल तक की जेल और कंपनी के ग्लोबल टर्नओवर के 10 फीसदी तक के जुर्माने की व्यवस्था है। 

न्यूजीलैंड  

न्यूजीलैंड में मस्जिद शूटिंग की घटना के लाइव स्ट्रीमिंग को लेकर सख्त कार्रवाई इसी नियम के तहत शुरू की गई। इससे पहले 2015 में आए ऑनलाइन सेफ्टी एक्ट में आपत्तिजनक पोस्ट को हटाने को कहने का अधिकार ई-सेफ्टी कमिश्नर को दिया गया। जिसमें बाद में 2018 में रिवेंज पोर्न पर सख्त एक्शन के प्रावधानों को भी जोड़ा गया। ऑस्ट्रेलिया में इन नियमों की मांग 2014 की उस घटना के बाद से हो रही थी जिसमें साइबर बुलिंग से परेशान हो कर कैरलॉट डावसन नाम की टॉप मॉडल ने खुदकुशी कर ली थी।

रूस में इंटरनेट को बंद करने का है अधिकार

रूस में बना इमरजेंसी रूल एजेंसियों को ये अधिकार देता है कि वे किसी आपात स्थिति में 'वर्ल्डवाइड वेब' को स्विच ऑफ कर सकें। रूस का 2015 का डेटा लॉ सोशल मीडिया कंपनियों के लिए ये अनिवार्य करता है कि रूस के लोगों से जुड़े डेटा को रूस में ही सर्वर में स्टोर करना होगा।

चीन में तो इन कंपनियों पर पूरी तरह है पाबंदी

वहीं, अगर चीन का मामला देखा जाए तो वहां ट्विटर, गूगल और व्हाट्सऐप जैसी सोशल मीडिया साइट्स ब्लॉक हैं। इनके विकल्प के तौर पर चीन ने Weibo, Baidu and WeChat जैसे अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स डेवलप किए हैं।

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मीडिया ट्रायल

न्यायपालिका सख्त शब्दों में कहती आ रही है कि संविधान के अनुच्छेद 19 (1) (ए) में प्रदत्त बोलने और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार असीमित नहीं है। इसलिए मीडिया चाहे व प्रिंट हो या इलेक्ट्रानिक या फिर सोशल मीडिया को इस अधिकार की लक्ष्मण रेखा नहीं लांघनी चाहिए। मीडिया ट्रायल की बढ़ती प्रवृत्ति और इनके खतरों के संदर्भ में उच्चतम न्यायालय ने कई फैसलों में मीडिया को आगाह किया है। इसमें कोई दो राय नहीं है कि मीडिया, चाहें प्रिंट, इलेकट्रॉनिक, डिजिटल हो या फिर सोशल मीडिया, को किसी भी स्थिति में अभिव्यक्ति की आजादी के अधिकार का इस्तेमाल करते समय ‘अपनी भाषा, मर्यादा संयम और किसी भी जांच में हस्तक्षेप के अंजाने प्रयास में’ अदृश्य सीमा रेखा नहीं लांघनी चाहिए। अन्यथा वह समय दूर नहीं है जब न्यायपालिका संविधान में प्रदत्त अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के दायरे में आ रही मीडिया के लिये विशेष परिस्थितियों या मामलों के संबंध में ‘कोई लक्ष्मण रेखा’ नहीं खींच दे।

बहरहाल, इस बारे में बहुत चर्चा हुई है कि क्या नए इंटरमेडरी गाइडलाइन नियम पर्याप्त हैं या अतिव्यापी हैं। भारत में 44 करोड़ से ज्यादा सोशल मीडिया यूजर्स हैं और इसके साथ ही इतना बड़ा दायरा होने की वजह से इसमें लोगों को प्रभावित करने की बहुत शक्ति है ऐसी शक्ति जिसे अनियंत्रित नहीं छोड़ा जा सकता है। दुनिया भर के देशों ने अपनी बेलगाम शक्ति को सीमित करने के लिए इन प्लेटफार्मों को विनियमित करने के महत्व को अमल में लाया है। लेकिन एक संप्रभु राज्य और दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के रूप में, भारत को हर कीमत पर मौलिक अधिकारों की रक्षा के  बारे में भी सोचना होगा। 

-अभिनय आकाश 

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