कब तक सरकार सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों में पूँजी डालती रहेगी?

By दीपक गिरकर | Jun 18, 2019

पिछले वित्तीय वर्ष में सरकारी बैंकों को 4284.45 करोड़ रूपये का घाटा हुआ था। सरकार ने पिछले वित्तीय वर्ष में सार्वजनिक क्षेत्र की बैंकों में 106000 करोड़ रूपये की पूँजी डाली थी। जून, 2019 में ही भारतीय रिजर्व बैंक बांड के जरिए 12500 करोड़ रूपये की पूँजी सार्वजनिक क्षेत्र की बैंकों में डाल रहा है। इस वित्तीय वर्ष में सरकार सार्वजनिक क्षेत्र की बैंकों को 30 हजार करोड़ रूपये उपलब्ध करवा रही है। सरकार प्रत्येक वर्ष सार्वजनिक क्षेत्र की बैंकों में पूँजी डालती है। सरकार सार्वजनिक क्षेत्र की बैंकों में पूंजी डालकर थक चुकी है। कब तक सरकार लोगों की प्यास बुझाने के लिए कुओं में ऊपर से एक-एक लोटा पानी डालती रहेगी? क्या सरकार हमेशा सार्वजिक बैंकों में पूँजी डालती रहेगी? क्या सरकार कभी इस समस्या की जड़ तक पहुँचने का प्रयास नहीं करेगी? भारतीय वित्तीय प्रणाली में असुरक्षा बढ़ी है। कमजोर जोखिम प्रबंधन और आंतरिक नियमन में कमी की वजह से गैर-निष्पादित आस्तियां बढ़ गई हैं। एक अर्थशास्त्रीय आकलन के मुताबिक भारत में दो लाख करोड़ रूपये से अधिक के बैंक घोटाले हो चुके हैं। बैंकों की समस्या प्रशासन और नियामक ढाँचे में व्याप्त विसंगतियों के कारण है। अब सरकार ने बैंकों के प्रशासन को बेहतर बनाने की पहल करनी चाहिए। बैंकिंग व्यवस्था में सुधार के लिए बैंक बोर्ड ब्यूरो की स्थापना की गई परंतु यह ब्यूरो संकट की घड़ी में नाकामयाब सिद्ध हुआ। बैंकों के प्रशासन को लेकर बनी बैंकिंग बोर्ड ब्यूरो (बीबीबी) के कार्यकलाप नायक समिति की अनुशंसाओं के अनुसार नहीं रहे। नायक समिति के अनुसार सरकारी बैंकों के प्रमुख, प्रबंध निदेशक और स्वतंत्र निदेशक का चयन बैंकिंग बोर्ड ब्यूरो (बीबीबी) को करना था लेकिन बैंकिंग बोर्ड ब्यूरो को पूरी स्वायत्तता नहीं दी गई। नायक समिति चाहती थी कि बैंक बोर्ड ब्यूरो को बैंकिंग प्रणाली की तमाम खामियों को दूर करने के अधिकार मिलने चाहिए लेकिन वास्तव में ऐसा कुछ हो नहीं सका। बैंक अधिकारियों और बैंक कर्मचारियों के प्रतिनिधियों को बैंक के बोर्ड में निदेशक के रूप में शीघ्र नियुक्ति दी जानी चाहिए। स्वतंत्र निदेशक और नामांकित निदेशक बोर्ड की बैठकों में सिर्फ़ सिर हिलाने का काम करते हैं। इन्हें मूक़दर्शक वाली भूमिका से बाहर निकलना होगा। नरसिम्हन समिति की सिफारिश थी कि सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के प्रमुख और कार्यकारी निदेशकों का कार्यकाल कम से कम पांच वर्ष का होना चाहिए। व्यावहारिक रूप से बैंकों में शीर्ष प्रबंधन स्तर पर कोई जवाबदेही प्रणाली मौजूद नहीं है, जिसकी वजह से गैर निष्पादित आस्तियों की समस्या और अधिक बढती जा रही है। वर्तमान समय में सार्वजनिक क्षेत्र की बैंकों में प्रभावी सतर्कता तंत्र मौजूद नहीं है। सतर्कता विभाग को सुदृढ़ करने की जरूरत है। बैंकिंग सतर्कता आयोग के गठन पर देश के नीति निर्माताओं ने विचार करना चाहिए।

भारत में संपूर्ण बैंकिंग व्यवस्था रिजर्व बैंक के नियमन, नियंत्रण एवं दिशा निर्देश के अनुसार संचालित होती है। बैंकों की व्यवस्था, कार्यप्रणाली पर निगाह रखना रिजर्व बैंक का दायित्व है। केंद्रीय बैंक का स्वतंत्र होना ज़रूरी है। उसकी स्वायत्तता सुनिश्चित की जानी चाहिए तब ही इस एनपीए नामक घातक बीमारी से निजात मिल सकेगी। रिजर्व बैंक को और अधिक स्वायत्तता देने की जरूरत है। रेटिंग एजेंसियों में स्वच्छता के लिए सेबी द्वारा आवश्यक कदम उठाए जाने की ज़रूरत है। अभी रेटिंग एजेंसियों पर सेबी का नियंत्रण है लेकिन सेबी के पास कार्य की अधिकता की वजह से सेबी रेटिंग एजेंसियों की कार्यप्रणाली पर उचित ध्यान नहीं दे पाती है। अत: रेटिंग एजेंसियों पर नियमन और नियंत्रण के लिए एक स्वतंत्र नियामक की ज़रूरत है। इस पर भी नीति निर्माताओं ने विचार-विमर्श करना चाहिए। जोखिम प्रबंधन में आमूलचूल परिवर्तन की ज़रूरत है। देश में एक स्वतंत्र ऋण प्रबंधन एजेंसी की आवश्यकता है। नियामक संस्थाओं में पारदर्शिता होना अत्यंत आवश्यक है। विभिन्न नियामक संस्थाओं के मध्य समन्वय रखना ज़रूरी है। समन्वय के अभाव में सामूहिक प्रयासों को सही दिशा नहीं दी जा सकती है। यह ज़रूरी है कि केंद्रीय बैंक की स्वतंत्रता बनाए रखी जाए। 

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एनपीए की समस्या से पूर्ण रूप से निजात मिल सकती है। एनपीए खातों वाले बड़े कॉर्पोरेट चूककर्ताओं पर बहुत पहले ही “सर्जिकल स्ट्राइक” होनी चाहिए थी जिससे यह समस्या इतनी अधिक विकराल रूप धारण नहीं करती। जिन ऋणी के खाते एनपीए है, बैंकों ने विलफुल डिफॉल्टर्स को उनके कुछ विशेष फ़ायदे जैसे सरकारी अनुदान प्राप्त करने से रोकना चाहिए। जानबूझकर ऋण न चुकाने के कितने भयंकर दुष्परिणाम होते है, यह डर विलफुल डिफॉल्टर्स के दिमाग़ में बैठाना होगा। विलफुल डिफॉल्टर्स के खिलाफ कठोर कार्रवाई की ज़रूरत है। बैंकों द्वारा इरादतन चूककर्ताओं के विरूद्ध एफआईआर दर्ज करवाने में देरी नहीं करनी चाहिए। बैंकों में जहां कदम-कदम पर जांच पड़ताल की व्यवस्था है वहां इतने अधिक घोटाले होना व्यवस्था पर प्रश्न चिन्ह लगाते है। बैंकों में बड़े बड़े घोटाले होना ऑडिटर्स और मैनेजमेंट की असफलता की निशानी है। बैंकिंग उद्योग में बार-बार घोटाले होने से सुधार के सारे प्रयास बेकार हो जाते हैं। आर्थिक अपराधों की वृद्धि को देखते हुए विशेष गुप्तचर व्यवस्था की ज़रूरत है। एन्फोर्समेंट एजेंसियां घोटाले होने के बाद घोटालेबाजों के विरूद्ध कार्रवाई प्रारम्भ करने में कई दिन लगा देती हैं। नीरव मोदी प्रकरण में भी कार्रवाई शुरू करने में 15 दिन लगा दिए। बैंक प्रबंधन और निगरानी एजेंसियों द्वारा धोखाधड़ी के छुटपुट मामले में उचित कार्रवाई सुनिश्चित की जानी चाहिए। यदि नीरव मोदी प्रकरण में वर्ष 2017 में ही उसके द्वारा की गई धोखाधड़ी के विरूद्ध उचित कार्रवाई की गई होती तो फ्रॉड की रकम में इतनी अधिक बढ़ोतरी नहीं हो पाती। जानबूझकर दीवालिया होने वाले कॉर्पोरेट घरानों के खिलाफ आपराधिक मामले दर्ज करने में तत्परता बरतनी चाहिए। दूसरे देश से किसी अपराधी को लाने के लिए हमारे देश और उस देश के बीच प्रत्यपर्ण संधि होनी चाहिए। अभी कुल 37 देशों के साथ ही यह संधि है। अत: सरकार द्वारा अधिक देशों के साथ यह संधि करनी होगी।

बैंकों ने चूककर्ताओं की सूची और जानबूझकर कर्ज नहीं चुकाने वालों की सूची सभी बैंकों, वित्तीय संस्थाओं, नियामक संस्थाओं, एन्फोर्समेंट एजेंसियों और जनता के साथ साझा करनी चाहिए। बैंकों ने डिफॉल्टर्स के नाम सार्वजनिक करने चाहिए। गंभीर धोखाधड़ी जांच कार्यालय (एसएफआईओ) में ही अन्य जांच एजेंसियों के समान मानव संसाधन की कमी है। कुछ कॉर्पोरेट्स द्वारा कई डिफॉल्ट किये गए लेकिन क्रेडिट ब्यूरो द्वारा ये डिफॉल्ट उनके क्रेडिट इतिहास में पंजीकृत नहीं किये गए है। संबंधित एजेंसियों की निष्क्रियताओं की जवाबदेही सुनिश्चित की जानी चाहिए। सभी नियामक संस्थाएं. एन्फोर्समेंट एजेंसियां सिर्फ स्वायत्तता की बात करती है लेकिन उन्हें मालूम होना चाहिए कि स्वायत्तता के साथ जवाबदेही भी साथ आती है। घोटालेबाजों से निपटने हेतु कानूनों में आमूलचूल परिवर्तन की आवश्यकता हैं। जब तक देश में कॉर्पोरेट प्रवर्तकों के बचाव की संस्कृति ख़त्म नहीं होती तब तक इस एनपीए नामक बीमारी का कोई इलाज नहीं है। बड़े अंतर्राष्टीय बैंकों में प्रत्येक उद्योग के लिए एक विशेष सेट अप होता है जहां कर्मचारियों को परियोजना की व्यवहार्यता का आकलन करने के लिए प्रशिक्षित किया जाता है। इसी प्रकार के प्रशिक्षण की व्यवस्था हमारे देश में भी होनी चाहिए। बड़े स्तर पर एनपीए के ऐसे मामले देखने में आए है जहां जानबूझकर चूक की गई है, ऐसे मामलों को केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) को शीघ्र सौंप देना चाहिए ताकि निष्पक्ष एवं समयबद्ध जांच की जा सके। बैंकों ने प्रतिवर्ष बैंक के पेनल एडव्होकेट्स, मूल्यांकनकर्ताओं, अंकेक्षकों, सनदी लेखाकारों के कामकाज की समीक्षा की जानी चाहिए। बैंकों ने अपनी सूची में से उन सभी पेशेवरों (अंकेक्षकों, सनदी लेखाकारों, अभियंताओं, मूल्यांकनकर्ताओं, एडव्होकेट्स) को हटा देना चाहिए जिन्होंने असली तथ्यों को छिपाते हुए फर्जी रिपोर्ट बनाकर अपने क्लाइंट्स को फ़ायदा पहुंचाकर बैंकों के एनपीए बढ़ोतरी करवाई हैं।

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वित्त मंत्रालय और सम्बंधित मंत्रालयों में अधिकारियों की नियुक्तियां और उन्हें बैंकिंग एवं वित्तीय सेवाओं में प्रशिक्षण प्रदान करने की एक व्यवस्थित प्रणाली होनी चाहिए। सरकार के पास अर्थशास्त्रियों और आर्थिक पेशेवरों की संख्या लगभग नहीं के बराबर है। सरकार को देश में अर्थशास्त्रियों और आर्थिक, बैंकिंग पेशेवरों की फौज तैयार करनी होगी। नियामक के रूप में भारतीय रिजर्व बैंक को महत्वपूर्ण भूमिका निभानी होगी। बैंकों में फंसे कर्ज की समस्या को दूर करने के लिए वित्त मंत्रालय और भारतीय रिजर्व बैंक के बीच निरंतर संवाद ज़रूरी है। सिर्फ कुछ घोषणाएं करने या समिति का गठन करने से रिजर्व बैंक अपनी नियामक जिम्मेदारी से मुक्त नहीं हो सकता है। एनपीए की समस्या से निपटने के लिए रिजर्व बैंक हमेशा नई-नई योजनाएं ले आता है लेकिन उन योजनाओं के नतीजों का कभी भी विश्लेषण नहीं किया जाता है। अग्रिमों की निगरानी के लिए केंद्रीय स्तर पर एक विशेष मजबूत निगरानी तंत्र विकसित करने की जरूरत है। सरकार अब बैंकिंग समस्या के समाधान के लिए छोटी-छोटी कमजोर बैंकों का मर्जर कर रही है। बैंकों के निजीकरण के बजाए दीर्घकालीन ढांचागत सुधार किये जाने की जरूरत है।

दीपक गिरकर

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