आर्थिक झटकों से उबारने की दिशा में बड़ा कदम है रेपो रेट का घटना

आर्थिक झटकों से उबारने की दिशा में बड़ा कदम है रेपो रेट का घटना

वित्त मंत्री एनडीए-2 सरकार का पहला पूर्ण बजट प्रस्तुत करेंगी, उससे पहले अर्थव्यवस्था को रफ्तार देने के लिए आरबीआई ने रेपो रेट में और 0.25 फीसदी कमी का ऐलान करके बेकाबू हालात को नियंत्रित करने की सकारात्मक चेष्टा तो की है।

भले ही भारतीय अर्थव्यवस्था विभिन्न प्रकार की चुनौतियों से जूझ रही है, लेकिन मोदी सरकार उसकी गति तेज करने को तत्पर नजर आ रही है। हाल ही में आरबीआई ने जिस तरह से तीसरी बार अपने रेपो रेट में कमी की है और उसे विगत 9 वर्षों के न्यूनतम स्तर 5.75% पर लाया है, उसका मकसद निवेश की रफ्तार में गति लाना तो है ही, गिरती विकास दर पर अंकुश लगाना भी इसका एक बड़ा उद्देश्य नजर आ रहा है।

कहना न होगा कि जब विकास दर गत पांच साल के न्यूनतम स्तर 5.8 फीसद तक लुढ़क गई हो और बेरोजगारी दर पिछले 45 साल के उच्चतम स्तर 6.1 फीसद पर पहुंच गई हो तो नवनियुक्त वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण का चिंतित होना स्वाभाविक है। जिस तरह से निवेश की रफ्तार सुस्त है, वैश्विक ट्रेड वार के चलते निर्यात की गति धीमी हो गई है, मैन्युफैक्चरिंग क्षेत्र की वृद्धि दर थम गई है, कृषि क्षेत्र की हालत पतली है और हाल के महीनों में ग्रामीण इलाकों में निजी उपभोग सुस्त पड़ चुका हो तो अर्थव्यवस्था को रफ्तार देने के लिए रेपो रेट घटाने के अलावा अन्य विकल्प कम नजर आ रहे थे।

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बता दें कि रेपो वह दर है जिस पर देश के बैंक आरबीआई से उधार लेते हैं। समझा जाता है कि रेपो दर के घटने से बैंक ज्यादा उधार ले सकते हैं और उसे अपने ग्राहकों को सस्ती दरों पर कर्ज दे सकते हैं। इसलिए आरबीआई ने रिवर्स रेपो दर भी 5.75 फीसद से घटाकर 5.50 फीसद कर दी है। क्योंकि बैंक जब अपनी अतिरिक्त नकदी आरबीआई के पास जमा करते हैं तो उन्हें रिवर्स रेपो की दर से ब्याज मिलता है। 

गत दिनों आरबीआई के गवर्नर शक्तिकांत दास ने बैंकों को स्पष्ट निर्देश दिया है कि ब्याज दरों में गिरावट का फायदा ग्राहकों तक पहुंचाएं। क्योंकि इससे पूर्व दोनों बार बैंकों ने घटी ब्याज दर का फायदा ग्राहकों तक पहुंचाने में कोई खास दिलचस्पी नहीं दिखाई थी। यही वजह है कि आरबीआई गवर्नर श्री दास की अध्यक्षता वाली एमपीसी यानी कि मौद्रिक नीति की छह सदस्यीय समिति ने एक सुर से मौद्रिक नीति का रुख 'तटस्थ' से बदलकर 'समायोजित' कर दिया। क्योंकि समिति का निर्णय गिरती विकास दर और बढ़ती महंगाई की चिंता से अभिप्रेरित है।

गौरतलब है कि इससे पहले आरबीआई रेपो रेट में अप्रैल में 0.25 प्रतिशत और उससे पहले फरवरी में भी 0.25 प्रतिशत की कटौती की गई थी, लेकिन बैंकों ने अपनी ब्याज दरों में महज 0.21 फीसद अंक तक का ही फायदा अपने ग्राहकों तक पहुंचाया, जिससे कहीं न कहीं अर्थव्यवस्था प्रभावित हुए बिना नहीं रही। यहां यह स्पष्ट करना जरूरी है कि आरबीआई ने अपने अनुमान में चालू वित्त वर्ष में विकास दर 7 फीसद रहने की उम्मीद जताई है, जबकि अप्रैल में उसने 7.2 फीसद विकास दर रहने का अनुमान जताया था। लेकिन बीती तिमाही में इसके लुढ़क कर 5.8 फीसद पर आ जाने से न केवल सरकार, बल्कि उसके सिपहसालार भी चिंतित हो उठे। 

स्वाभाविक है कि अब जबकि वित्त मंत्री एनडीए-2 सरकार का पहला पूर्ण बजट प्रस्तुत करेंगी, उससे पहले अर्थव्यवस्था को रफ्तार देने के लिए आरबीआई ने रेपो रेट में और 0.25 फीसदी कमी का ऐलान करके बेकाबू हालात को नियंत्रित करने की सकारात्मक चेष्टा तो की है, लेकिन इसका क्या असर होगा, यह तो आने वाले दिनों-महीनों में ही पता चल सकेगा। फिलहाल, रोजगार के अवसर बढ़ाने के उपायों के अलावा सरकार के पास कोई चारा भी नहीं बचा है, क्योंकि रेपो रेट 6 फीसदी से घटाकर 5.75 करने का दांव आरबीआई चल चुकी है, जो कि सितंबर 2010 के बाद पहली बार न्यूनतम हुआ है। इससे ऑटो, होम या पर्सनल लोन सस्ते होंगे, जिससे भारतीय अर्थव्यवस्था को एक नई गति मिलने की संभावना है।

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बहरहाल, राजनीतिक स्थिरता, शेयर बाजार में उछाल और व्यावसायिक क्षेत्र के लिए नगदी का बढ़ता प्रवाह जहां निवेश गतिविधियों के लिए अनुकूल है, वहीं वित्त वर्ष 2018-19 की चौथी तिमाही में घरेलू निवेश गतिविधियां सुस्त पड़ने, निर्यात की गति धीमी पड़ने से मांग भी कमजोर होने और वैश्विक ट्रेड वार के चलते अंतरराष्ट्रीय मांग कमजोर पड़ने से निकट भविष्य में भारत के निर्यात और निवेश पर असर पड़ना लाजिमी है। इसके अलावा, ग्रामीण क्षेत्रों में भी निजी निवेश के कमजोर पड़ने से सरकार के आर्थिक रणनीतिकार चिंतित दिखाई दे रहे हैं। 

सच कहा जाए तो भले ही विश्व बैंक को भारतीय अर्थव्यवस्था की तेज विकास दर का भरोसा हो, लेकिन उपलब्ध अद्यतन आंकड़ों पर नजर दौड़ाने के बाद आरबीआई किसी गलतफहमी में नहीं रहना चाहता। शायद इसलिए उसने विकास दर अनुमान को भी घटाया है, जो चालू वित्त वर्ष की पहली छमाही में 6.4 से 6.7 फीसद रहने की उम्मीद है। शुक्र है कि दूसरी छमाही में उसने भी विकास दर के 7.2-7.5 फीसद रहने की उम्मीद जताई है, जिससे सरकार की चिंता की लकीरें कुछ कम होंगी।

-कमलेश पांडे