Yes Milord: अब कितने दिनों तक बिल रोक पाएंगे राज्यपाल? राज्यों की राजनीति बदल देने वाला 'सुप्रीम' फैसला

By अभिनय आकाश | Nov 21, 2025

लोकतंत्र की सब अपने-अपने तरीके से व्याख्या करते हैं और गजब बात ये है कि उन्हें अपनी व्याख्या सबसे सटीक भी जान पड़ती है। कोई सामने वाले को लोकतंत्र के लिए खतरा बताता है तो कोई अपने विपक्षी के लिए कहता है कि इतना अहंकार भी ठीक नहीं। लेकिन लोकतंत्र और इससे भी बढ़कर संविधान की व्याख्या का काम हर किसी का नहीं है। संविधान निर्माताओं ने यह काम देश की सबसे बड़ी अदालत यानी कि सुप्रीम कोर्ट को सौंप रखा है। सुप्रीम कोर्ट ने वही किया। राज्य सरकार और राज्यपाल के बीच अधिकारों की लड़ाई पर एक निर्णायक फैसला सुना दिया।

पूरे मामले की शुरुआत तमिलनाडु की स्टालिन सरकार और वहां के राज्यपाल एन रवि के बीच अधिकारों की खींचतान के झगड़े से शुरू हुई थी और इसी सिलसिले में 20 नवंबर को कोर्ट का फैसला आया। कहा गया कि राज्यपाल विधानसभा से पास विधेयकों को अनिश्चितकाल तक नहीं रोक सकते। स्पष्ट है कि यह फैसला सिर्फ तमिलनाडु नहीं बल्कि कई अन्य राज्यों में भी सरकार और राज्यपाल वाली खींचतान में निर्णायक साबित होगा। राज्यपालों की संवैधानिक शक्तियों पर यह फैसला सीजीआई बीआर गवई समेत पांच सदस्य संविधान पीठ ने सुनाया। गवई के अलावा इस पीठ में जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस विक्रमनाथ, जस्टिस पी एस नरसिम्हा और जस्टिस चंद्रचोड़कर शामिल थे। संविधान पीठ यानी सुप्रीम कोर्ट की वो पीठ, वो बैंक जिसमें कम से कम पांच न्यायाधीश होते हैं और यह पीठ संविधान की व्याख्या मांगते कानूनी सवालों पर अपना मत देती है।

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तमिलनाडु सरकार और गवर्नर के विवाद पर राष्ट्रपति ने पूछे थे सवाल

तमिलनाडु गवर्नर ने राज्य सरकार के बिल रोककर रखे थे, जिसपर सुप्रीम कोर्ट ने अप्रैल में आदेश दिया कि राज्यपाल के पास कोई वीटो पावर नहीं है। इसी फैसले में कहा था कि राज्यपाल की ओर से भेजे गए बिल पर राष्ट्रपति को 3 महीने के भीतर फैसला लेना होगा। इसके बाद राष्ट्रपति ने राय मांगी थी। जिनके जवाब देते हुए कोर्ट ने कहा, अगर किसी स्थिति में राज्यपाल की ओर से अत्यधिक, अकारण और अनिश्चितकालीन देरी हो, तो अदालत सीमित स्तर पर यह निर्देश दे सकती है कि राज्यपाल संविधान के तहत अपने कर्तव्यों का उचित समय में निर्वहन करें।

राज्यपाल के पास 3 विकल्प, इनमें से एक चुनें

चीफ जस्टिस ने कहा कि अनुच्छेद 200 के तहत राज्यपाल के पास 3 विकल्प हैं। विधेयक को मंजूरी दें, राष्ट्रपति को भेजें या सुझावों सहित लौटा दें। कोई चौथा विकल्प नहीं है। राज्यपाल इनमें से कोई एक चुन सकते हैं। अनुच्छेद 200 के तहत वे मंत्रिपरिषद की सलाह मानने को बाध्य नहीं।

कार्यवाही से छूट, पर न्यायिक समीक्षा संभव

अनुच्छेद 200 के तहत राज्यपाल के फैसले के गुण-दोष की कोर्ट जांच नहीं कर सकता। राज्यपाल को न्यायिक कार्यवाही से छूट है। पर, इससे अनुच्छेद 200 के तहत लंबी निष्क्रियता के मामलों में सीमित न्यायिक समीक्षा रद्द नहीं होती। राज्यपाल की भूमिका की कोई अन्य संवैधानिक निकाय जगह नहीं ले सकता।

संदेह-भ्रम बढ़ाए, जवाब देना बाध्यता

पीठ ने कहा कि तमिलनाडु केस में राज्यपाल और राष्ट्रपति के लिए समयसीमा तय करने वाले फैसले ने संदेह और भ्रम पैदा किए थे। कुछ निष्कर्ष पिछले फैसलों के उलट थे। तमिलनाडु, केरल, प. बंगाल और पंजाब जैसे राज्यों ने राष्ट्रपति संदर्भ स्वीकारने पर आपत्ति की थी। उनकी दलील थी कि फैसला पलटने के लिए अनुच्छेद 143 इस्तेमाल नहीं कर सकते। कोर्ट ने कहा, राष्ट्रपति के प्रश्न संवैधानिक ढांचे की जड़ों और प्रक्रियाओं से जुड़े हैं। इनका संवैधानिक महत्त्व अत्यधिक है। अनुच्छेद 143 के तहत कोर्ट ऐसे प्रश्नों का उत्तर देने के लिए अधिकृत और बाध्य है।

तमिलनाडु में करीब 10 बिल अटके थे

तमिलनाडु सरकार का दावा था कि राज्यपाल ने 10 बिल रोक रखे हैं। 2023 में ये राष्ट्रपति को भेजे गए। वहां 1 मंजूर, 7 खारिज हुए। 2 पर निर्णय नहीं हुआ। केरल में करीब 8 बिल रुके हैं। इनमें यूनिवर्सिटी लॉ अमेंडमेंट, कोऑपरेटिव सोसाइटी, लोकायुक्त अमेंडमेंट आदि बिल शामिल थे। कुछ तो 23-36 महीने तक पेंडिंग रहे। कर्नाटक विधानसभा से पारित 10 बिल राष्ट्रपति की मंजूरी के लिए लंबित हैं। इनमें मुस्लिमों को 4% ठेका आरक्षण व मंदिरों पर लेवी से जुड़े संशोधन शामिल हैं। पंजाब में फिस्कल मैनेजमेंट और गुरुद्वारा प्रशासन इत्यादि से जुड़े करीब 4 बिल दो साल तक रोके गए थे। इस मुद्दे पर पंजाब सरकार की अपील पर सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिए थे।

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