आखिर भारतीय उपमहाद्वीप में कब तक थमेंगी सांप्रदायिक व जातीय हिंसा की घटनाएं?

By कमलेश पांडे | Aug 10, 2024

कहते हैं न कि नीतियां जब नरम होती हैं, तो अराजक तत्व हावी हो जाते हैं। राजतंत्र के कब्र पर पनपा समकालीन लोकतंत्र इसका जीता-जागता उदाहरण है। हाल के दिनों में बांग्लादेश में हुई हिन्दू विरोधी हिंसा, पाकिस्तान व अफगानिस्तान में जारी हिन्दू विरोधी उत्पीड़न व हिंसा की अगली कड़ी है। यूँ तो भारत के कश्मीर, केरल और पश्चिम बंगाल आदि में भी जब तब कुछ ऐसा ही हो जाता है, जिस पर काबू पाने में भारतीय प्रशासन भी सियासी वजहों से लगभग असहाय नजर आता है। 

गोया, इन घटनाओं से साफ है कि इन देशों में पुलिस या सैन्य प्रशासन का भय अपराधी या गिरोहबाज प्रवृत्ति के लोगों में नहीं है। ऐसा इसलिए कि सांप्रदायिक व जातीय वजहों से कुछ सुरक्षाकर्मी-पुलिसकर्मी भी प्रत्यक्ष या परोक्ष तरीके से ऐसी नृशंस घटनाओं को शह देते आये हैं। वहीं, सिविल प्रशासन पर भी अमूमन सियासी वजहें हावी रहती हैं, जिसके चलते भीड़ की बेलगाम हिंसा को रोकने वाला न तो कोई माई-बाप है और न ही ऐसे तत्वों के खिलाफ कोई सामूहिक दंड विधान मौजूद है, जिसका भय इनके दिलोदिमाग में बना रहे।

इसलिए मेरे जेहन में यही सवाल उठता है कि आखिर भारतीय उपमहाद्वीप में कब तक थमेंगी सांप्रदायिक व जातीय हिंसा की ऐसी बर्बर आदिम युगीन घटनाएं? इस बदत्तर स्थिति के लिए भारतीय, पाकिस्तानी या बांग्लादेशी हुक्मरान कितने जिम्मेदार हैं? वहीं, दुनिया के थानेदार मतलब अमेरिका, चीन और रूस आदि भी आखिर क्यों नहीं चाहते इन बर्बर घटनाओं की पुनरावृत्ति पर रोक? शायद इसलिए कि लोकतांत्रिक सियासत में वोट बैंक के जुगाड़ के लिए ऐसी निर्लज्ज व जघन्य घटनाओं की ब्रेक के बाद पुनरावृत्ति जरूरी है! 

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तभी तो न तो मुगलिया सल्तनत में, न ब्रितानी हुकूमत में और न ही आजाद भारत-पाकिस्तान-बंगलादेश में ऐसी लोमहर्षक घटनाओं पर कोई मजबूत लगाम लग सकी? तो क्या इन देशों का संविधान, संसद और सर्वोच्च न्यायालय इन सबकी खुली इजाजत देता आया है! यदि नहीं तो इन वारदातों के खिलाफ कितने स्वतः संज्ञान लिए गए। यहां की संसदों-विधानमण्डलों में कितनी सकारात्मक बहसें हुईं और उसके क्या सकारात्मक परिणाम निकले। क्या कोई जनरक्षक कानून बन पाया या विधि-व्यवस्था की विफलता के लिए किसी की जिम्मेदारी (सामूहिक ही सही) तय की जा सकी। जवाब होगा, शायद अब तक तो नहीं। तो फिर सवाल यही कि आजादी के इतने सालों बाद तक भी क्यों नहीं?

क्योंकि मुगलों और अंग्रेजों पर तो फूट डालो शासन करो के आरोप लगाए गए, लेकिन भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश आदि में बैठे 'काले अंग्रेजों,' जिनमें नेता-नौकरशाह दोनों शामिल हैं, ने क्या किया? जवाब होगा- हिन्दू-मुस्लिम, सिख-ईसाई को सम्प्रदाय में बांटने के लिए अल्पसंख्यक-बहुसंख्यकवाद चलाना और हिन्दू समाज को जातियों में बांटने के लिए आरक्षण को अनैतिक हथियार के तौर पर इस्तेमाल करने और नख से सिख तक ब्राह्मणवाद-बनियावाद को कोसते रहने के शिवाय कुछ भी नहीं! 

आखिर यह कौन नहीं जानता कि परस्पर कई युद्ध लड़ चुके इन देशों की राजनीति में जहां पाकिस्तान-बांग्लादेश की सियासत भारत और हिन्दू विरोध के ऊपर चलती आई है। वहीं भारत की सियासत मुस्लिम तुष्टीकरण और हिन्दू हितों की हिफाजत के नाम पर चमकती आई है। बावजूद इसके, कहीं आतंकी हिंसा, कहीं नक्सली हिंसा, कहीं गिरोह वार, कहीं जातीय हिंसा और कहीं साम्प्रदायिक हिंसा ही इन देशों की नियति बन चुकी है। यहां का पुलिस प्रशासन और मिलिट्री प्रशासन इन उपद्रवियों के समक्ष लाचार नजर आता है। 

आप मानें या न मानें, लेकिन इस कबीलाई लोकतंत्र, जहां सुशासन के तमाम प्रयास विफल साबित प्रतीत हो रहे हैं, को अब पूंजीवाद से खतरा है। क्योंकि अपने दीर्घकालिक लाभ के वास्ते हथियार बेचते रहने की गरज से ये कहीं भी अमन-चैन रहने देना नहीं चाहते हैं! इनकी नीतियां जनद्रोही हैं, जिसे ये न्यू वर्ल्ड आर्डर करार देकर हम पर थोपना चाहते हैं। इनकी डिजिटल सोच सुविधाजनक पर रोजगार घाती है। इनका तकनीकी प्रेम विकासपरक लेकिन मानवता के लिए विनाशक है। इनकी नई आर्थिक नीति लूट-खसोट के अलावा कुछ भी नहीं! 

यदि आप गौर करें तो रूस-यूक्रेन युद्ध, इजरायल-फिलिस्तीन संघर्ष, चीन-ताइवान विवाद, भारत-पाक क्षद्म युद्ध के बाद बांग्लादेश का हिन्दू विरोधी जिहाद कोई संयोग नहीं, बल्कि प्रयोग है और इसे समझने की जरूरत है। कभी नेपाल, कभी म्यांमार, कभी श्रीलंका, कभी मालदीव, कभी अफगानिस्तान, कभी ईरान आदि जगहों पर घटित अपेक्षित, अनपेक्षित घटनाओं का असर पूरे भारतीय उपमहाद्वीप पर पड़ता है, जो वैश्विक महाशक्तियों के लिए सुस्वादु तरबूज प्रतीत होता है। इसलिए वो अपना हिस्सा पाने के लिए तरह तरह के तिकड़म भिड़ाते-भिड़वाते रहते हैं।

इसलिए सुलगता हुआ सवाल है कि जनतांत्रिक प्रशासन में न्यायपालिका, कार्यपालिका और विधायिका के मजबूत रहते हुए और खबरपालिका के सजग रहते हुए भी आखिर ऐसी नृसंश वारदातें क्यों नहीं थम पा रही हैं? आखिर इससे किनका हित सध रहा है और उसे कबतक सधने दिया जाएगा? ये बातें सभ्य समाज के लोगों की नींद में खलल डाल रही हैं। इसलिए अब सबके जेहन में यह बात सुलग रही है कि यदि तमाम वैज्ञानिक व तकनीकी विकास के बावजूद समकालीन शासन यदि मानव समुदाय को सुरक्षा और सुव्यवस्था देने में विफल रहता है तो फिर उसके होने या न होने का मतलब क्या रह जाता है? लिहाजा, शांति व सुव्यवस्था के सवाल पर अब सार्वजनिक बहस होनी चाहिए और करो या मरो का फैसला लेना चाहिए।

भारतीय उपमहाद्वीप, जिसमें भारत, पाकिस्तान, अफगानिस्तान, बांग्लादेश, नेपाल, भूटान, म्यांमार, श्रीलंका और मालदीव आते हैं, की सबसे बड़ी त्रासदी यह है कि भारत अपने बड़े भाई के तौर पर सख्त नहीं, बल्कि लचीला रुख अपनाने का आदी/अभ्यस्त रहा है। इसलिए तो हिन्दू-मुस्लिम के नाम पर क्रमशः हिंदुस्तान और पाकिस्तान नामक दो देश तो बन गए, लेकिन कुछ मुस्लिम यहां रह गए और कुछ हिन्दू वहां रह गए। यही अब कोढ़ में खाज मानिंद लग रहे हैं। 

आंकड़े चुगली करते हैं कि हिंदुस्तान में मुस्लिम आबादी तो बढ़ती रही, लेकिन पाकिस्तान और बांग्लादेश में हिन्दू आबादी घटती चली गई। आखिर ऐसा क्यों, यह पूछने का साहस भारतीय नेतृत्व के पास नहीं है और न ही जवाबी कार्रवाई करने की हिम्मत। अन्यथा हिंदुओं का उत्पीड़न पाकिस्तान और बांग्लादेश में कभी नहीं होता! भारत को अपने पड़ोसी देशों को साफ साफ बता देना चाहिए कि यदि हिन्दू हितों की हिफाजत नहीं कर सकते तो अपने अपने दूतावास भारत से समेट लो। फिर भी यदि उत्पात नहीं थमता तो सर्जिकल स्ट्राइक या सैन्य कार्रवाई का विकल्प खुला रखना चाहिए। 

इतना ही नहीं, भारतीय धर्मनिरपेक्षता को तबतक के लिए समाप्त कर देना चाहिए, जबतक कि पाकिस्तान-बांग्लादेश का भारत में विलय नहीं हो जाए। यह सब कोई मजबूत इरादे वाला राजनेता ही करेगा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए एक अवसर है कि महात्मा गांधी की दुविधाओं से ग्रसित धर्मनिरपेक्षता को समाप्त करके भारत को हिन्दू राष्ट्र घोषित करें, क्योंकि यह हिंदुओं के हिस्से वाला भारत है। इसके साथ ही मुगलिया व ब्रितानी अत्याचारों के तमाम प्रतीकों को ध्वस्त करें। यह सब पंडित नेहरू के समय में ही हो जाना चाहिए, लेकिन अब यदि नरेंद्र मोदी भी इसे करने में चूक गए तो इतिहास उन्हें भी कतई माफ नहीं करेगा।

आप मानें या न मानें, पर आतताइयों को उनकी मांद में ठोक देना ही राजधर्म है, लेकिन 'रक्तरंजित' न्यायपालिकाएं इसे अनुचित ठहराएँगी। यहां पर मैं 'रक्तरंजित' न्यायपालिकाएं की उपमा इसलिए दे रहा हूँ, क्योंकि संविधान की संरक्षक संस्थाओं के तौर पर ये अपनी ऐतिहासिक भूमिकाओं के निर्वहन में सर्वथा विफल प्रतीत होती आई हैं। प्रशासनिक भ्रष्टाचार और सामाजिक असुरक्षा के लिए इनकी नीतियां व निर्णय भी जिम्मेदार हैं। ये कानून तोड़ने के नाम पर ये किसी को फांसी या आजीवन कारावास की सजा तो दे देती हैं, लेकिन जब प्रशासनिक विफलताओं के चलते जनसंहार या अत्याचार-अनाचार होता है तो इसमें शामिल भीड़ व हाथ पर हाथ धरे बैठे प्रशासनिक हुक्मरानों के खिलाफ स्वतः संज्ञान लेकर उन्हें दंडित करने का माकूल प्रयास इन्होंने कभी किया ही नहीं, अन्यथा ऐसा असुरक्षित माहौल कदापि नहीं दिखता।

यहां पर मैं भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश आदि में घटित सांप्रदायिक दंगों, जातीय उन्मादों, अंतहीन आतंकी वारदातों, अंडरवर्ल्ड गिरोहों की कारिस्तानियों की संख्या गिनाने की कोशिश नहीं कर रहा हूँ, बल्कि यह सिर्फ बताने या आगाह करने की कोशिश कर रहा हूँ कि अपनी सुरक्षा के लिए सरकार और प्रशासन के भरोसे बैठना सबसे बड़ी मूर्खता है। इसलिए खुद ही ऐसे उपाय ढूंढने होंगे जिससे जातीय व धार्मिक अल्पसंख्यकों के साथ साथ बहुसंख्यक भी सुरक्षित रह सकें। 

वहीं, भारत सरकार का यह कर्तव्य बनता है कि पाकिस्तान और बंगलादेश से सभी हिंदुओं को वापस बुलाए और बंगाल-केरल-कश्मीर में सक्रिय 'आतताइयों' को पाकिस्तान भेजने की व्यवस्था करे, ताकि इस उपमहाद्वीप में हिन्दू-मुस्लिम फसाद को सदा-सर्वदा के लिए रोका जा सके। या फिर हिन्दू-मुस्लिम उत्पीड़न की सिलसिलेवार बारदातों को रोकने की मुकम्मल व्यवस्था करे। भारत में भी अल्पसंख्यकों को उतने ही अधिकार मिले, जितने कि पाकिस्तान या बांग्लादेश के अल्पसंख्यक उपभोग कर रहे हैं। न्याय का तकाजा और जैसे को तैसा का सिद्धांत तो यही कहता है, बाद बाकी आपकी मर्जी, जो खुदगर्जी ज्यादा प्रतीत होती आई है।

- कमलेश पांडेय

वरिष्ठ पत्रकार व स्तम्भकार

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