आजादी के 78 वर्षों में कितने बदले लोकतंत्र के हालात?

By योगेश कुमार गोयल | Aug 15, 2025

प्रत्येक भारतवासी के लिए 15 अगस्त का दिन गौरव का दिन है क्योंकि इसी दिन भारत को अंग्रेजों की दासता से मुक्ति मिली थी। हालांकि स्वतंत्रता दिवस को लेकर आज भी देश के प्रत्येक नागरिक के दिलोदिमाग में वही जज्बा और उत्साह समाहित है लेकिन जब हर वर्ष स्वतंत्रता के प्रतीक तिरंगे के नीचे खड़े होकर बहुत सारे ऐसे जनप्रतिनिधियों को देश की रक्षा व प्रगति का संकल्प लेते देखते हैं, जो वर्षभर सरेआम लोकतंत्र की धज्जियां उड़ाते देखे जाते हैं तो मन में यही सवाल उठता है कि आखिर ऐसी संकल्प अदायगी से देश को हासिल क्या होता है? देश को आजाद हुए सात दशक से अधिक हो चुके हैं लेकिन आजादी के इन 78 वर्षों में लोकतंत्र के पवित्र स्थल संसद और विधानसभाओं के हालात किस कदर बदले हैं, वह किसी से छिपा नहीं है, जहां अभद्रता की सीमा पार करते जनप्रतिनिधि गाली-गलौच, उठापटक से लेकर कुर्ता-फाड़ राजनीति तक उतर आते हैं। विधानसभाओं की तो क्या बात करें, जब संसद की कार्यवाही ही कभी विपक्ष और कभी स्वयं सत्ता पक्ष द्वारा ही कई-कई दिनों तक लगातार नहीं चलने दी जाए तो राष्ट्र के लिए इससे ज्यादा चिंतनीय स्थिति और क्या हो सकती है? संसद में होने वाले ऐसे हंगामों के कारण प्रति मिनट आम आदमी के करीब ढ़ाई लाख रुपये बर्बाद होते हैं यानी हर एक घंटे में करीब डेढ़ करोड़ रुपये खर्च होते हैं। अब चूंकि संसद की कार्यवाही प्रतिदिन 6 घंटे चलनी होती है, ऐसे में संसद के दोनों सदनों में दोनों पक्षों के विरोध, हो-हल्ले और शोर के कारण जनता के खून-पसीने की कमाई के प्रतिदिन करीब 9 करोड़ रुपये से अधिक बर्बाद हो जाते हैं।

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आजादी के बाद सामाजिक और आर्थिक पहलू पर देश में कमजोर तबके का स्तर सुधारने की नीयत से लागू आरक्षण के राजनीतिक रूप ने देश को आज उस चौराहे पर लाकर खड़ा कर दिया है, जहां समूचा देश रह-रहकर जातीय संघर्ष के बीच उलझता दिखाई देता है। स्वार्थपूर्ण राजनीति ने माहौल को इस कदर विकृत कर दिया है, जहां से निकल पाना संभव ही नहीं दिखता। राजस्थान हो या उत्तर प्रदेश, हरियाणा हो या गुजरात अथवा महाराष्ट्र, आरक्षण के नाम पर उठते विध्वंसक आन्दोलनों की आग में से जब-तब बुरी तरह झुलसते रहे हैं और हर कोई इस तरह के परिवेश का राजनीतिक लाभ लेने की कवायद में जुटा नजर आता है। आजादी के बाद के इन करीब साढ़े सात दशकों में भ्रष्टाचार और अपराध इस कदर बढ़ गए हैं कि आम आदमी का जीना दूभर हो गया है। बगैर लेन-देन के प्रायः कोई कार्य सम्पन्न नहीं होता। बड़े नेता की तो कौन कहे, छुटभैया नेताओं की भी चांदी हो चली है। आजादी के बाद लोकतंत्र के इस बदलते स्वरूप ने आजादी की मूल भावना को बुरी तरह तहस-नहस कर डाला है। यह आजादी का एक शर्मनाक पहलू ही है कि गिने-चुने मामलों को छोड़कर हत्या, भ्रष्टाचार, बलात्कार जैसे संगीन अपराधों से विभूषित जनप्रतिनिधि अक्सर सम्मानित जिंदगी जीते रहते हैं। देश के ये बदले हालात आजादी के कौनसे स्वरूप को उजागर कर रहे हैं, विचारणीय है।

ऐसे बदरंग हालातों में यह सवाल रह-रहकर सिर उठाने लगता है कि आखिर कैसी है ये आजादी? आखिर आजादी का अर्थ क्या है? इस प्रश्न का उत्तर तब तक नहीं दिया जा सकता, जब तक कि यह न जान लिया जाए कि स्वतंत्र होना आखिर कहते किसे हैं? देश को? व्यक्ति को? समाज को? यह जानना भी जरूरी है कि क्या कुछ बुनियादी मानवाधिकारों से वंचित व्यक्ति, समाज या देश को स्वतंत्र कहा जा सकता है? क्या भोजन, कपड़ा और रहने की व्यवस्था, बीमारी से बचाव, भय-आतंक, शोषण व असुरक्षा से छुटकारा, साक्षर एवं शिक्षित होने के पर्याप्त अवसर मिलना और अन्य ऐसी ही कई बातें मानव के बुनियादी अधिकार नहीं हैं? क्या शोषण और उत्पीड़न से मुक्ति के संघर्ष को मानव का बुनियादी अधिकार नहीं माना जाना चाहिए? लोकतंत्र के हाशिये पर खड़ी देश की जनता को इस दिशा में फिर से मंथन करना आवश्यक हो गया है कि वह किस तरह की आजादी की पक्षधर है? आज की आजादी, जहां तन के साथ-साथ मन भी आजाद है, सब कुछ करने के लिए, चाहे वह वतन के लिए अहितकारी ही क्यों न हो, या उस तरह की आजादी, जहां वतन के लिए अहितकारी हर कदम पर बंदिश हो। आज की आजादी, जहां स्वहित राष्ट्रहित से सर्वोपरि होकर देशप्रेम की भावना को लीलता जा रहा है, या वह आजादी, जहां राष्ट्रहित की भावना सर्वोपरि स्वरूप धारण करते हुए देश को आजाद कराने में गुमनाम लाखों शहीदों के मन में उपजे देशप्रेम का जज्बा सभी में फिर से जागृत कर सके। इस तरह के परिवेश पर सभी देशवासियों को आजादी के इस पावन पर्व पर सच्चे मन से मंथन कर सही दिशा में संकल्प लेने की भावना जागृत करनी होगी, तभी आजादी के वास्तविक स्वरूप को परिलक्षित किया जा सकेगा।

- योगेश कुमार गोयल

(लेखक साढ़े तीन दशक से पत्रकारिता में सक्रिय वरिष्ठ पत्रकार हैं)

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