लोकतंत्र का गला घोंटे जाने के आरोपों में आखिर कितनी सत्यता है?

By डॉ. वेदप्रताप वैदिक | Feb 06, 2021

भारत में लोकतंत्र की हालत क्या है, इस मुद्दे पर हमारे देश में और दुनिया में आजकल बहस तेज हो गई है। इस बहस को धार दे दी है, किसान आंदोलन ने। इसके पहले नागरिकता कानून, धारा 370, मनमानी हत्याएँ और अल्पसंख्यकों में भय-व्याप्ति आदि मामलों को लेकर भारत के बारे में यह कहा जाने लगा था कि यहाँ लोकतंत्र का दम घोंटा जा रहा है। इन मामलों के अलावा सत्तारुढ़ दल में भाई-भाई राज के उदय पर भी उंगली उठाई जा रही थी। किसान आंदोलन के बारे में कनाडा के प्रधानमंत्री जस्टिन त्रूदो, प्रसिद्ध पॉप आइकन रिहाना, पर्यावरण प्रवक्ता ग्रेटा टुनबर्ग और अमेरिकी उपराष्ट्रपति कमला हैरिस की भतीजी मीना हैरिस के बयानों पर हमारे विदेश मंत्रालय ने आपत्ति की है।

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भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र तो अपने आप बन गया है, अपने जनसंख्या-विस्फोट की वजह से लेकिन उसे दुनिया का सबसे बढ़िया लोकतंत्र बनाने के लिए हम क्या कर रहे हैं ? सबसे पहली बात तो यह कि भारत को अपना मनोबल हर हाल में ऊँचा रखना चाहिए। जिस देश ने इंदिरा गांधी- जैसी महाप्रतापी प्रधानमंत्री को कुर्सी से उतार कर चटाई पर बिठा दिया, उसकी तुलना आइसलैंड, नार्वे और न्यूजीलैंड जैसे ‘आदर्श लोकतंत्रों’ से करना उचित नहीं हैं। इनमें से ज्यादातर भारत के एक प्रांत के बराबर भी नहीं हैं और भारत-जैसी विविधता तो उनके लिए अकल्पनीय है। वे भारत- जैसे विदेशी आक्रमणों और सुदीर्घ गुलामी के शिकार भी नहीं रहे हैं। भारतीय लोकतंत्र कुछ अर्थों में लंगड़ा जरूर है लेकिन आज भी वह काफी तेजी से दौड़ रहा है। हमारे राजनीतिक दलों में आंतरिक लोकतंत्र शून्य है लेकिन न्यायपालिका, संसद और खबरपालिका पर कोई अंकुश नहीं है। यदि इनमें से कोई डरपोक, निस्तेज, स्वार्थी और मंदबुद्धि है तो यह उसका अपना दोष है। व्यवस्था अभी तक तो पूरी तरह से लंगड़ी नहीं हुई है।

-डॉ. वेदप्रताप वैदिक

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