Gyan Ganga: रानी मंदोदरी के पास आकर कैसा महसूस कर रहा था रावण?

By सुखी भारती | Mar 14, 2023

विगत अंक में हमने जाना कि रावण को एक बात भीतर ही भीतर घुन की भाँति खाये जा रही थी, कि आखिर श्रीराम जी संपूर्ण वानर सेना को लेकर, सागर के इस पार कैसे पहुँच गए? कारण कि रावण ने ऐसी कल्पना तो स्वप्न में भी नहीं की थी। रावण अपनी खीझ मिटाने के लिए, अपने महलों में ही क्यों गया, इसमें भी रावण की एक कमी की ओर ही इशारा हो रहा था। रावण क्योंकि सभा में तो अपनी व्याकुलता प्रकट नहीं कर सकता था, तो लिहाज़ा उसने इसके लिए वह स्थान चुना, जहाँ रावण जैसी वृति का प्रत्येक व्यक्ति चुनता है। जी हाँ, उसने अपनी पत्नी के आँचल में जाना ही ठीक समझा। कारण कि रावण जैसा व्यक्ति कभी भी किसी की बात नहीं मान सकता। लेकिन जब उसे पता चले, कि उसके कृत्य तो अनुचित ही हैं, तो कोई भला उसे उचित क्यों ठहरायेगा? तो क्यों न किसी ऐसे पात्र को चुना जाये, जो किसी भी परिस्थिति में उसका साथ दे। और वह उसकी पत्नी से बढ़कर भला और कौन हो सकता था।

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रानी मंदोदरी के इस व्यवहार से पता चलता है, कि वह बड़ी सूझवान हैं। कारण कि रावण स्वयं को पूर्णतः पराजित हुआ महसूस कर रहा है। अहंकारी होने के कारण, ऐसा तो है नहीं, कि वह स्वयं की पराजय स्वीकार कर ले। तो निश्चित ही उसे समझाना अब पानी में कील ठोकने जैसा था। लेकिन क्योंकि रावण की पत्नी होने के नाते, रावण को मंझधार में तो छोड़ा नहीं जी सकता था, और रावण को समझाने के चक्कर में, अपनी जान को भी जोखिम में नहीं डाला जा सकता था। तो रानी मंदोदरी ने बड़े ही मनोवैज्ञानिक तरीके को अपनाया। सबसे पहले तो उसने रावण के समक्ष अच्छी प्रकार से झुक कर प्रणाम किया। ताकि रावण को एक मनोवैज्ञानिक आश्वासन लगे, कि नहीं, अभी भी ऐसा नहीं है, कि सारी दुनिया से मैं हार गया। ऐसा नहीं कि अब संसार में कोई भी सीस मेरे समक्ष झुकने को तैयार नहीं। ये देखो, मेरी पत्नी तो अभी भी, कैसे मेरे समक्ष दंडवत, नत्मस्तक है। कैसे अपने आँचल को मेरे सम्मान में फैलाये है।

निश्चित ही रानी मंदोदरी ने ऐसा करके रावण को इस स्तर पर लाकर तो खड़ा कर ही दिया, कि वह उसकी बात को कम से कम सुन तो सके ही। मानना नहीं मानना, बाद की बात है। गोस्वामी जी कहते हैं, कि रानी मंदोदरी ने बड़ी ही मनमोहक वाणी से रावण को संबोधित किया। मनमोहक वाणी से गोस्वामी जी का तात्पर्य यह है, कि रानी मंदोदरी ने सर्वप्रथम रावण के अहंकार को पुष्ट किया। जिसके पश्चात रावण को रानी मंदोदरी की प्रत्येक बात ही मीठी व मनमोहक लगने वाली थी। मनमोहक वाणी तो वैसे श्रीहनुमान जी व श्रीविभीषण जी ने भी बोली थी। क्योंकि उनकी वाणी में श्रीराम जी की महिमा का समावेश था। तो जिस वाणी में श्रीराम जी महिमा का वास हो, वह वाणी कठोर शब्दों के मिश्रण से भी शहद-सी मीठी ही होती है। लेकिन रावण को उनकी मीठी वाणी भी कठोर व कड़वी लगी। कारण कि उस वाणी में रावण के अहंकार का तुष्टिकरण नहीं, अपितु ह्रास हो रहा था। और रावण को भला यह कैसे स्वीकार हो सकता था। क्योंकि जिस अहंकार को उसने इतने लाड़-प्यार से पाला था, उसके पोषण के लिए इतने झंझट किये थे, उस अहंकार को वह भला ऐसे ही कैसे समाप्त होने दे सकता था। लेकिन रानी मंदोदरी ने बड़े ही सुंदर तरीके से रावण को काबू किया। रावण को लगा, कि वाह! मेरी पत्नी जब मुझे किसी भी प्रकार से हीन नहीं समझ रही, मेरा आदर कर रही है, तो इसका अर्थ मैं पूर्णतः उत्थान के मार्ग पर हूँ। मैं मुझे आँख दिखाने वाला कोई आस-पास तक नहीं है। रावण ने मंदोदरी को अपना हितकारी जान उसके किसी कृत्य का विरोध नहीं किया। तब रानी मंदोदरी ने सर्वप्रथम यही वाक्य कहा, कि हे स्वामी! सबसे पहले तो आप अपना क्रोध त्याग कर मेरी बात सुनिए। जबकि अभी तक तो रावण ने क्रोध वाली कोई बात ही नहीं कही थी। इसका अर्थ स्पष्ट था, कि रानी मंदोदरी ने भले ही रावण को बाहर से क्रोधित नहीं पाया था, लेकिन तब भी वह भली-भाँति जानती थी, कि रावण भले ही बाहर से स्थिर प्रतीत हो रहा हो, लेकिन भीतर से तो वह अग्नि की भाँति उबल रहा है। रावण को ऐसे भीतर तक जो समझ सके, उसके अहंकार को भी तुष्ट कर सके, शायद वही रावण को समझा सकता था।

रानी मंदोदरी रावण को क्या समझाती है? एवं उसकी सीख का रावण पर क्या प्रभाव पड़ता है, जानेंगे अगले अंक में---(क्रमशः)---जय श्रीराम।

-सुखी भारती

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