By रेनू तिवारी | Aug 24, 2026
उत्तर प्रदेश के प्रशासनिक और न्यायिक हलकों में उस वक्त हड़कंप मच गया जब इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सीनियर IAS अधिकारी और देवीपाटन मंडल की कमिश्नर दुर्गा शक्ति नागपाल के रवैये पर कड़ा रुख अपनाया। हाईकोर्ट ने एक निचली अदालत की महिला जज को फोन कर कथित रूप से प्रभावित करने और डराने-धमकाने के मामले को आपराधिक अवमानना (Criminal Contempt) के तहत सुनवाई के लिए संबंधित पीठ को सौंपने का निर्देश दिया है। जस्टिस सैयद कमर हसन रिज़वी की पीठ ने सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि कथित टेलीफोनिक बातचीत की भाषा और लहजे से प्रथम दृष्टया यह साफ आभास होता है कि अदालत के पीठासीन अधिकारी को प्रभावित करने का प्रयास किया गया था। अदालत ने इसे 'चौंकाने वाला' करार दिया कि कोई प्रशासनिक अधिकारी किसी लंबित मुकदमे के सिलसिले में सीधे जज से फोन पर संपर्क करे।
अदालत ने कहा कि देवीपाटन मंडल की कमिश्नर और सीनियर IAS अधिकारी दुर्गा शक्ति नागपाल द्वारा सिविल जज को फोन करके उन पर डाला गया कथित दबाव, प्रथम दृष्टया न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर सीधा हमला है और न्याय प्रशासन में बाधा डालता है।
हाई कोर्ट ने कहा कि इस मामले पर आपराधिक अवमानना के तहत विचार किया जाना चाहिए। अदालत ने निर्देश दिया कि मुख्य न्यायाधीश या वरिष्ठ न्यायाधीश से ज़रूरी निर्देश प्राप्त करने के बाद मामले को उचित अदालत के समक्ष लाया जाए। यह मामला देवीपाटन मंडल के कमिश्नर के नाम दर्ज नज़ूल ज़मीन के कई टुकड़ों से संबंधित था।
हाई कोर्ट ने आदेश दिया, "उपरोक्त को देखते हुए, यह अदालत प्रथम दृष्टया पाती है कि इस मामले में आपराधिक अवमानना से जुड़े मामलों को देखने वाली अदालत के हस्तक्षेप की आवश्यकता है। माननीय मुख्य न्यायाधीश/माननीय वरिष्ठ न्यायाधीश से निर्देश लेने के बाद मामले को अवमानना मामलों को देखने वाली उचित अदालत के समक्ष रखा जाए।"
क्या है पूरा मामला?
यह विवाद गोंडा की सिविल जज (सीनियर डिवीजन) सबीना खान की अदालत में 1997 से लंबित एक सिविल मुकदमे से जुड़ा है।
ज़मीन का विवाद: यह मामला गोंडा में नजूल ज़मीन (सरकारी ज़मीन) के कुछ हिस्सों से संबंधित है, जो कमिश्नर कार्यालय के निर्माण के लिए आरक्षित बताई जाती है।
अदालत में स्थिति: लगभग तीन दशकों से लंबित इस मुकदमे में साल 2018 में मुद्दे तय (Issues Frame) किए गए थे और फिलहाल मामला साक्ष्य (Evidence) के चरण में है।
ट्रांसफर अर्जी की सुनवाई: हाईकोर्ट 1997 के इस मुकदमे को गोंडा की सिविल जज की अदालत से किसी अन्य सक्षम अदालत में ट्रांसफर करने की अर्ज़ी पर सुनवाई कर रहा था।
महिला जज का सनसनीखेज पत्र: क्या लगाए गए थे आरोप?
मामले की सुनवाई के दौरान कोर्ट को अवगत कराया गया कि सिविल जज (सीनियर डिवीजन) सबीना खान ने 4 अगस्त, 2026 को गोंडा के जिला जज को एक आधिकारिक पत्र भेजा था। पत्र में आरोप लगाया गया कि:
15 जुलाई, 2026 की कॉल: जब महिला जज लंबी छुट्टी पर थीं, तब कमिश्नर दुर्गा शक्ति नागपाल ने उन्हें फोन किया और पूछा कि वह छुट्टी से कब वापस आ रही हैं।
बदतमीजी और धमकी का आरोप: पत्र के मुताबिक, कमिश्नर ने कथित तौर पर कहा, "मैं सीनियर IAS ऑफिसर हूँ और आपने मेरा फोन न उठाकर बदतमीजी की है... अच्छा हुआ कि आपने मुझसे बात कर ली, नहीं तो मैं आपकी शिकायत हाईकोर्ट में करने वाली थी।"
पद का दुरुपयोग: जज ने आरोप लगाया कि कमिश्नर ने उनके न्यायिक आचरण पर सवाल उठाते हुए कहा, "आपके व्यवहार से मुझे ऐसा लगा कि आप ज्यूडिशियल ऑफिसर हैं भी या नहीं।"
दबाव बनाने का प्रयास: महिला जज ने जिला जज के सामने शिकायत दर्ज कराई कि आईएएस अधिकारी ने पद का इस्तेमाल कर उन्हें डराने, हाईकोर्ट में शिकायत की धमकी देने और अनुचित दबाव (Undue Pressure) डालने की कोशिश की।
कमिश्नर दुर्गा शक्ति नागपाल का पक्ष
राज्य सरकार और कमिश्नर नागपाल की ओर से फोन कॉल किए जाने से इनकार नहीं किया गया, लेकिन उसकी वजह अलग बताई गई:
चार्ज और जांच: कमिश्नर ने बताया कि उन्होंने अप्रैल 2026 में ही देवीपाटन मंडल का प्रभार संभाला था। जांच के दौरान उन्हें पता चला कि कमिश्नर कार्यालय की आरक्षित नजूल ज़मीन से जुड़ा मामला लगभग 30 वर्षों से अदालत में अटका हुआ है।
सामान्य पूछताछ का दावा: उन्होंने सरकारी वकीलों को प्रभावी पैरवी का निर्देश दिया था। जब पता चला कि पीठासीन अधिकारी लंबी छुट्टी पर हैं, तो 15 जुलाई को उन्होंने केवल यह जानने के लिए फोन किया था कि जज कब लौटेंगी।
मामले पर चर्चा से इनकार: कमिश्नर का कहना था कि फोन कॉल पर लंबित मुकदमे के गुण-दोष (Merits) पर कोई चर्चा नहीं हुई थी और बाद में उन्होंने केवल जिला जज से जल्द सुनवाई का अनुरोध किया था।
हाईकोर्ट की कड़ी टिप्पणियां और आपराधिक अवमानना का आदेश
जस्टिस रिज़वी की पीठ ने दोनों पक्षों को सुनने के बाद साफ किया कि अदालत किसी न्यायिक अधिकारी द्वारा लगाए गए इन गंभीर आरोपों से अपनी आंखें नहीं मूंद सकती।
कोर्ट के फैसले के प्रमुख बिंदु:
न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर हमला: हाईकोर्ट ने माना कि किसी आईएएस अधिकारी द्वारा न्यायिक अधिकारी पर फोन के जरिए दबाव डालना प्रथम दृष्टया न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर सीधा हमला है और यह न्याय प्रशासन में बाधा पहुंचाता है।
जजों को संरक्षण देना हाईकोर्ट का फर्ज: कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले (इन री: अजय कुमार पांडे 1996) का हवाला देते हुए कहा कि जजों को बिना किसी डर के काम करने की आजादी होनी चाहिए। जज को शिकायत की धमकी देना न्याय प्रशासन में हस्तक्षेप के समान है।
ट्रांसफर अर्जी निष्प्रभावी: चूंकि जिला जज गोंडा ने पहले ही इस केस को सिविल जज सबीना खान की अदालत से हटाकर 'सिविल जज (सीनियर डिवीजन)/FTC/ACJM गोंडा' की अदालत में ट्रांसफर कर दिया था, इसलिए हाईकोर्ट ने ट्रांसफर अर्जी को तो बेअसर मानते हुए निस्तारित कर दिया।
अवमानना पीठ को भेजा मामला: हालांकि, कमिश्नर के आचरण को प्रथम दृष्टया आपराधिक अवमानना मानते हुए हाईकोर्ट ने चीफ जस्टिस के निर्देशानुसार मामले को क्रिमिनल कंटेंप्ट (Criminal Contempt) की सुनवाई करने वाली उचित पीठ के समक्ष सूचीबद्ध करने का आदेश दिया।