By प्रभासाक्षी न्यूज़ डेस्क | Sep 25, 2026
भारत की दिवाला एवं ऋण शोधन अक्षमता (आईबीसी) व्यवस्था ने अटकी हुई रियल एस्टेट परियोजनाओं में फंसे 1.4 लाख से अधिक घर खरीदारों को राहत दी है। विश्लेषकों और उद्योग जगत के अधिकारियों के अनुसार आईबीसी के जरिए आर्थिक रूप से मजबूत डेवलपर आगे आकर संकटग्रस्त परियोजनाओं को फिर से विकसित कर रहे हैं। अदाणी रियल्टी और लोढ़ा सहित कई बड़ी कंपनियों ने दिवाला समाधान प्रक्रियाओं के जरिये संकटग्रस्त परियोजनाओं का अधिग्रहण किया है या उनका जिम्मा अपने हाथ में लिया है।
विभिन्न न्यायिक मंचों पर कार्यवाही जारी रहने के कारण 221 मामलों में अभी भी 1.1 लाख घर खरीदार समाधान की प्रतीक्षा कर रहे हैं। उद्योग जगत के अनुमान के अनुसार दिवाला ढांचे के तहत सुलझाई गई परियोजनाएं लगभग 84,000 करोड़ रुपये की हैं, जबकि अन्य 65,000 करोड़ रुपये का निवेश अनसुलझी परियोजनाओं में फंसा हुआ है। वर्ष 2018 में आईबीसी के तहत घर खरीदारों को वित्तीय लेनदार के रूप में मान्यता दी गई थी, जिससे रुकी हुई आवास परियोजनाओं को पूरा कराने के लिए दिवाला रूपरेखा एक बेहद महत्वपूर्ण जरिया बन गयी।
विश्लेषकों का कहना है कि इसके बावजूद काम की रफ्तार एक बड़ी चुनौती बनी हुई है, जहां लंबी कानूनी मुकदमेबाजी और बार-बार अपीलों के कारण अक्सर परियोजनाओं के पूरा होने में देरी होती है। सीबीआरई इंडिया में भूमि एवं पूंजी बाजार के प्रबंध निदेशक निखिल भाटिया ने कहा, आईबीसी के तहत रियल एस्टेट मामलों का समाधान अधिकांश अन्य क्षेत्रों की तुलना में धीमा है और ऐसा ढांचागत कारणों से है। ये परियोजनाएं लंबी अवधि की होती हैं जिनमें घर खरीदारों, ऋणदाताओं और भूमि साझेदारों के कई स्तरों पर दावे होते हैं।
नाइट फ्रैंक के इंटरनेशनल पार्टनर और वरिष्ठ कार्यकारी निदेशक गुलाम जिया ने कहा, आईबीसी के तहत संकटग्रस्त संपत्तियों का बढ़ता दायरा आर्थिक रूप से मजबूत डेवलपरों को अधिग्रहण के जरिए विस्तार का अवसर दे रहा है। कुल कॉरपोरेट दिवाला समाधान प्रक्रिया (सीआईआरपी) मामलों में 22 प्रतिशत हिस्सेदारी रियल एस्टेट की है, जो इसे दूसरा सबसे बड़ा क्षेत्र बनाती है। उन्होंने कहा कि अदाणी, रिलायंस, जेएसडब्ल्यू और प्रेस्टीज जैसे बड़े डेवलपर संकटग्रस्त परियोजनाओं के अधिग्रहण के लिए आगे आ रहे हैं। इसका सबसे बड़ा फायदा फंसे हुए घर खरीदारों को मिल रहा है।