IDBI Bank की 60.72 प्रतिशत हिस्सेदारी Fairfax को बेचने की मिली मंजूरी

By Ankit Jaiswal | Oct 14, 2026

आईडीबीआई बैंक के मालिकाना हक में बड़ा बदलाव होने जा रहा है। केंद्र सरकार ने बैंक में अपनी और एलआईसी की कुल 60.72% हिस्सेदारी बेचने के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी है। यह हिस्सेदारी कनाडा की फेयरफैक्स फाइनेंशियल होल्डिंग्स की सहायक कंपनी M/S 10955230 कनाडा इंक को ₹52,878.08 करोड़ में बेची जाएगी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में आर्थिक मामलों की मंत्रिमंडलीय समिति ने बुधवार को इस सौदे को मंजूरी दी है। इससे बैंक के निजीकरण की प्रक्रिया आगे बढ़ने का रास्ता साफ हो गया है।

गौरतलब है कि इस बिक्री के लिए खरीदार का चयन प्रतिस्पर्धी बोली प्रक्रिया के जरिए किया गया है। इसमें कई स्तरों पर जांच और मंजूरी की व्यवस्था अपनाई गई। सरकार ने 7 अक्टूबर 2022 को शुरुआती सूचना जारी कर इच्छुक कंपनियों से प्रस्ताव मांगे थे। बोली लगाने वाली कंपनियों के लिए भारतीय रिजर्व बैंक की उपयुक्तता संबंधी मंजूरी और गृह मंत्रालय से सुरक्षा मंजूरी लेना जरूरी था।

वित्त वर्ष 2025-26 में मिली शुरुआती बोलियां सरकार द्वारा तय ₹94.42 प्रति शेयर के न्यूनतम मूल्य से कम थीं। इसलिए उन्हें स्वीकार नहीं किया गया। इसके बाद वित्त वर्ष 2026-27 में योग्य बोलीदाताओं से नए और अंतिम प्रस्ताव मांगे गए। 2 स्वतंत्र मूल्यांकन एजेंसियों ने अलग-अलग तरीकों से बैंक का मूल्य तय किया। दोनों के औसत आकलन के मुताबिक, बैंक का उचित मूल्य ₹75.99 प्रति शेयर था। फेयरफैक्स की ओर से ₹81 प्रति शेयर की बोली लगाई गई, जो इस औसत मूल्य से अधिक थी। इसी आधार पर आर्थिक मामलों की मंत्रिमंडलीय समिति ने प्रस्ताव को मंजूरी दी।

हालांकि, सौदा पूरा होने से पहले खरीदार को भारतीय रिजर्व बैंक के सामने अपनी वित्तीय और कारोबारी क्षमता से जुड़े दस्तावेज पेश करने होंगे। साथ ही, उसे केंद्रीय बैंक की नियामकीय शर्तों का पालन करने की योजना भी देनी होगी। सरकार ने अपनी बची हुई 15% हिस्सेदारी में से कुछ हिस्सा भविष्य में बाजार के जरिए बेचने के लिए संबंधित समिति को अधिकार दिए हैं। वहीं, एलआईसी अपनी बची हुई हिस्सेदारी का प्रबंधन अपने नियमों और नियामकीय शर्तों के अनुसार करेगी।

बता दें कि आईडीबीआई बैंक की स्थापना 1964 में एक विकास वित्तीय संस्था के रूप में हुई थी। साल 2004 में इसे वाणिज्यिक बैंक में बदला गया। भारतीय रिजर्व बैंक ने 21 जनवरी 2019 से इसे निजी क्षेत्र के बैंक की श्रेणी में रखा है, हालांकि सरकार और एलआईसी की बड़ी हिस्सेदारी बनी रही।

एक समय बैंक की वित्तीय हालत काफी कमजोर हो गई थी। गैर-निष्पादित कर्ज और घाटे के कारण सरकार तथा एलआईसी को इसमें बार-बार पूंजी डालनी पड़ी। साल 2010 से 2020 के बीच सरकार ने बैंक में करीब ₹25,000 करोड़ की पूंजी लगाई थी। 5 मई 2017 को रिजर्व बैंक ने बैंक को सुधारात्मक कार्रवाई की व्यवस्था के तहत रखा था। बाद में 10 मार्च 2021 को कुछ शर्तों और निगरानी के साथ ये पाबंदियां हटा दी गईं।

मौजूद जानकारी के अनुसार, बैंक की स्थिति में पिछले कुछ वर्षों में काफी सुधार हुआ है। सितंबर 2018 में इसका सकल एनपीए 31.78% था, जो मार्च 2026 में घटकर 2.32% रह गया। इसी दौरान शुद्ध एनपीए 17.30% से घटकर 0.15% पर आ गया। बैंक का पूंजी पर्याप्तता अनुपात भी 2018 के 6.22% से बढ़कर मार्च 2026 में 26.65% हो गया। वित्त वर्ष 2025-26 में बैंक ने ₹9,513 करोड़ का शुद्ध लाभ दर्ज किया। 30 सितंबर 2026 तक उसका कुल कारोबार ₹6,27,149 करोड़ था, जो एक साल पहले की तुलना में 18% अधिक है। अब इस सौदे के पूरा होने के बाद बैंक के स्वामित्व और आगे की कारोबारी रणनीति में अहम बदलाव देखने को मिल सकते हैं।

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