2% प्रदूषण वाली कारों को 90% सज़ा; 60% प्रदूषण फैलाने वाली धूल-पराली को पूरी छूट!

By ओंकारेश्वर पांडेय | Jan 05, 2026

साल 2025 की समाप्ति और 2026 की शुरुआत के बीच दिल्ली-एनसीआर के करोड़ों मध्यमवर्गीय परिवार एक अजीब विडंबना भोग रहे हैं। एक तरफ सरकार ‘हरित भारत’ के नारे लगाती है, दूसरी तरफ उसकी नीतियां जानबूझकर आम आदमी की जेब पर डाका डालकर ऑटोमोबाइल कंपनियों की चांदी काट रही हैं। प्रदूषण नियंत्रण के नाम पर लागू की गई वाहन नीतियां — ‘No PUCC, No Fuel’, गैर-बीएस६ वाहनों पर प्रतिबंध, और अनिवार्य स्क्रैपिंग — दरअसल पर्यावरण संरक्षण का मुखौटा ओढ़े हुए एक सुनियोजित आर्थिक शोषण हैं। यह नीति वैज्ञानिक तथ्यों से कोसों दूर, राजनीतिक छल और कॉरपोरेट लॉबी के दबाव में तैयार की गई एक व्यवस्थित “वेल्थ ट्रांसफर” योजना है, जहां मध्यम वर्ग की जमापूंजी सीधे कार कंपनियों के मुनाफे में तब्दील हो रही है।


आंकड़ों का क्रूर खेल: 2% प्रदूषण, 90% दंड

सरकारी आंकड़े ही इस पूरे ढोंग की पोल खोलते हैं। सीपीसीबी (CPCB) और आईआईटी कानपुर के अध्ययन बताते हैं कि दिल्ली की वायु में PM2.5 के लिए पेट्रोल/डीजल कारों का योगदान मात्र 2% से 5% के बीच है। वहीं, सड़क की धूल (35–38%), निर्माण कार्य (10–12%), और उद्योगों का उत्सर्जन (20–25%) असली प्रदूषण के प्रमुख स्रोत हैं।

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लेकिन सरकारी कार्रवाई का फोकस कहां है? लगभग 90% प्रतिबंधात्मक उपाय सीधे निजी वाहन मालिकों पर केंद्रित हैं। यानी, 2–5% समस्या के लिए 90% दंड एक पूरे वर्ग को दिया जा रहा है। क्या यह न्याय है? या फिर यह सिर्फ “आसान निशाना” की मानसिकता है, क्योंकि धूल और उद्योगों से निपटना मुश्किल है, पर एक पुलिसवाले को चालान काटने के लिए कार रोकना आसान है?


मानवीय पीड़ा का गणित: स्क्रैप हुई जिंदगियां

इन नीतियों का मानवीय और आर्थिक नुकसान डरावना है:

- 5 लाख से अधिक कारें पहले ही स्क्रैप की जा चुकी हैं, जिनमें से अधिकतर पूरी तरह चलने लायक थीं।

- 12 लाख से ज्यादा बाहरी वाहनों (गैर-बीएस६) का दिल्ली में प्रवेश वर्जित है, जिससे हजारों परिवारों की रोजी-रोटी प्रभावित हुई है।

- लगभग 30 लाख वाहन मालिक सीधे तौर पर इस नीति से प्रभावित हैं, जिनकी गाड़ियां अगले कुछ महीनों में कबाड़ घोषित होने की कगार पर हैं।

- एक कार पर औसतन 4–6 सदस्य निर्भर होते हैं। इस हिसाब से कम से कम 1.5 करोड़ लोग इस नीति के कारण आर्थिक, सामाजिक और मानसिक पीड़ा झेल रहे हैं।


यह सिर्फ कारों का स्क्रैप नहीं, बल्कि मध्यम वर्ग के सपनों, संघर्ष और सुरक्षा की भावना का स्क्रैप है। एक परिवार ने 10–15 साल की कर्ज की किश्तें चुकाकर जो गाड़ी खरीदी, उसे सरकार एक आदेश से “अवैध” घोषित कर देती है। क्या यह अनुच्छेद 300A के तहत संपत्ति के अधिकार का सीधा उल्लंघन नहीं है?


वैश्विक सबक: फिटनेस बनाम उम्र की लड़ाई

भारत दुनिया का शायद अकेला बड़ा देश है जहां वाहन की उम्र को उसकी फिटनेस से ऊपर रखा गया है। 


आइए दुनिया के तौर-तरीके देखें:

- अमेरिका, यूरोप (जर्मनी, ब्रिटेन, फ्रांस): यहां 20–30 साल पुरानी कारें भी सड़क पर दौड़ती हैं, बशर्ते वे सालाना स्ट्रिक्ट एमिशन टेस्ट (MOT Test) पास करें। नीति का आधार प्रदूषण उत्सर्जन का स्तर है, न कि मैन्युफैक्चरिंग डेट।

- जापान: यहां शकेन शोमे (Shaken Shomei) नाम का कठोर इंस्पेक्शन सिस्टम है, लेकिन उम्र के आधार पर जबरन स्क्रैप नहीं। अगर गाड़ी टेस्ट पास कर ले, तो वह चल सकती है।

- सिंगापुर & यूरोपीय देश: पुरानी गाड़ियों को विंटेज (Vintage) या क्लासिक कार का दर्जा देकर संरक्षित किया जाता है। भारत में उसे हाइड्रोलिक प्रेस के नीचे कुचल दिया जाता है।


विश्व बैंक की 2023 की एक रिपोर्ट कहती है कि उम्र-आधारित प्रतिबंध गरीबी बढ़ाते हैं और संसाधनों का भारी अपव्यय करते हैं। भारत सरकार ने फिटनेस टेस्ट को पारदर्शी और विश्वसनीय बनाने में नाकामी की, इसलिए उसने सबसे आसान रास्ता चुना — गाड़ियों को ही खत्म कर देना।


कॉरपोरेट लॉबी का हथियार: “प्लान्ड ऑब्सोलेसेंस”

दशकों पहले एक कार की आयु 20–25 साल होती थी। आज तकनीक बेहतर हुई है, तो आयु और बढ़नी चाहिए थी। लेकिन ऐसा हुआ उल्टा। “प्लान्ड ऑब्सोलेसेंस” (Planned Obsolescence) नाम की एक रणनीति के तहत, कंपनियां जानबूझकर उत्पादों की उपयोगी आयु कम रखती हैं, ताकि ग्राहक जल्दी-जल्दी नया खरीदें। यह रणनीति स्मार्टफोन और इलेक्ट्रॉनिक्स में तो साफ दिखती ही है, अब ऑटोमोबाइल सेक्टर ने भी इसे खुलकर अपना लिया है।


सरकार की स्क्रैपेज पॉलिसी इसी कॉरपोरेट रणनीति का सरकारी संस्करण है। हर पुरानी कार के स्क्रैप होने पर नई कार की बिक्री गारंटीड होती है। इसलिए, यह नीति पर्यावरण संरक्षण कम, ऑटो इंडस्ट्री का स्टिमुलस पैकेज ज्यादा है। और इस पैकेज का भुगतान आम जनता कर रही है।


सबसे बड़ा विरोधाभास: ग्राहक दोषी, कंपनी मालामाल

जिन BS-IV कारों को सरकार ने 2020 तक “पर्यावरण अनुकूल” बताकर बेचा, उन्हीं को आज “प्रदूषण का दुष्मन” घोषित किया जा रहा है। सवाल है:

- अगर तकनीक दोषपूर्ण थी, तो जुर्माना और कार्रवाई कार निर्माताओं पर क्यों नहीं?

- क्या दोषपूर्ण उत्पाद बेचने के लिए किसी कंपनी पर भारतीय दंड संहिता की धारा 420 लगी? नहीं।

- क्या नेशनल कंज्यूमर डिस्प्यूट्स रिड्रेसल कमीशन (NCDRC) में इस आधार पर कोई बड़ा केस दर्ज हुआ? नहीं।


जवाब साफ है: गलती ग्राहक की मानी जा रही है, और सजा भी ग्राहक को ही मिल रही है। कंपनियां नए मॉडल लॉन्च करके मुनाफा कूट रही हैं।


वैज्ञानिक शोध की अनदेखी और पुराने डेटा पर नीतियां

भारत की वाहन नीति का सबसे दुखद पहलू यह है कि यह पुराने और अधूरे वैज्ञानिक डेटा पर टिकी है। 2015 का आईआईटी कानपुर का अध्ययन आज भी पॉलिसी का आधार बना हुआ है, जबकि प्रदूषण के स्रोत बदल चुके हैं। अमेरिका (EPA) और यूरोप (EEA) हर 2–3 साल में रियल-टाइम सोर्स अपोर्शनमेंट स्टडी करते हैं। भारत में MoEFCC और CPCB की ओर से ऐसा कोई नियमित, पारदर्शी अध्ययन नहीं होता। नतीजा, NGT (नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल) को भी अधूरी जानकारी के आधार पर फैसले लेने पड़ते हैं।


हालिया उदाहरण: जुलाई 2025 में सरकार ने 78% कोयला बिजलीघरों को Flue Gas Desulphurization (FGD) लगाने की डेडलाइन बढ़ा दी। यानी सल्फर डाइऑक्साइड (SO2) के सबसे बड़े स्रोत को छूट मिल गई। लेकिन एक 10 साल पुरानी डीजल कार को दिल्ली की सीमा में घुसने तक से रोक दिया गया। क्या यह नीतिगत पक्षपात नहीं है?


बजट का दोगलापन: “मिशन LiFE” या “मिशन लूट”?

सरकार “मिशन LiFE” के तहत करोड़ों रुपये का प्रचार करती है। लेकिन प्रदूषण नियंत्रण के लिए वैज्ञानिक शोध, जनजागरूकता और पब्लिक ट्रांसपोर्ट के बजट में भारी कटौती हुई है। सारा जोर चालान, प्रतिबंध और जब्ती पर है।


बजट और शोध का विरोधाभास

पर्यावरण मंत्रालय (MoEFCC) का वार्षिक बजट 2004-05 में लगभग ₹800 करोड़ से बढ़कर 2024-25 में लगभग ₹3,200 करोड़ हो गया, यानी चार गुना वृद्धि। लेकिन CAG रिपोर्ट (2019–2023) बताती है कि हर साल पर्यावरण मंत्रालय का 30-35% (लगभग ₹1,000 करोड़) खर्च ही नहीं हो पाता और यह राशि लैप्स हो जाती है। खर्च होने वाली राशि का बड़ा हिस्सा प्रशासनिक खर्च, पुरानी योजनाओं के रखरखाव और प्रचार अभियानों में चला जाता है। 


सबसे गंभीर चूक यह है कि वास्तविक वैज्ञानिक शोध—जैसे रीयल-टाइम प्रदूषण स्रोत पता लगाना (सोर्स अपोर्शनमेंट) या नई तकनीक पर अध्ययन—के लिए बजट का 1% से भी कम हिस्सा दिया जाता है। नतीजतन, 2025 की नीतियाँ भी 2015 के पुराने आंकड़ों पर आधारित हैं। बिना मौलिक, ज़मीनी और व्यापक शोध अध्ययन के नीतियां जनविरोधी बन जाती हैं। 


कालखंड के हिसाब से उपायों की सतहीपन

2004-2014 में बड़े उपाय थे राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण (NGT) का गठन (2010) और राष्ट्रीय जलवायु परिवर्तन कार्ययोजना (2008), लेकिन ये ज्यादातर संस्थागत ढाँचे बनाने तक सीमित रहे। 2014-2025 के दौरान प्रतीकात्मक अभियान (मिशन लाइफ, लायलॉग) और NCAP (2019) जैसी योजनाएँ आईं, पर इनका फंड भी पूरा खर्च नहीं हो पाया। सबसे बड़ी कमी मौलिक शोध और डेटा अध्ययन में निवेश न करना रही। प्रदूषण के असली स्रोतों (धूल-उद्योग) की बजाय आसान निशाने (निजी वाहन) पर फोकस इसी अध्ययन-विहीन नीति का नतीजा है। बजट बढ़ा, पर सोच और शोध नहीं बदली, इसलिए समस्या और प्रतिबंध दोनों बढ़ते गए।


ईवी (इलेक्ट्रिक वाहन) पर सब्सिडी घटा दी गई है। पुरानी कार का एक्सचेंज वैल्यू नगण्य है और नई ईवी की कीमत आसमान पर। सरकार “पुरानी कार लो, नई ईवी दो” जैसी कोई न्यायसंगत एक्सचेंज पॉलिसी लाने को तैयार नहीं। मकसद साफ है — जनता को नई खरीदने के लिए मजबूर करना।


रास्ता आगे: फिटनेस-आधारित नीति और वैज्ञानिक समाधान

दिल्ली की हवा साफ करनी है, तो दिखावे की नीतियों को छोड़कर वैज्ञानिक और न्यायसंगत समाधान पर ध्यान देना होगा:

1. फिटनेस-आधारित मानदंड लागू करो: उम्र नहीं, वास्तविक प्रदूषण उत्सर्जन टेस्ट का आधार हो। पारदर्शी और कम खर्चीली फिटनेस प्रमाणपत्र व्यवस्था बने।

2. वास्तविक प्रदूषकों पर कार्रवाई: सड़क की धूल (35%+ प्रदूषण) को रोकने के लिए मैकेनिकल स्वीपर और वाटर स्प्रिंकलर का इस्तेमाल बढ़ाया जाए। निर्माण स्थलों और उद्योगों पर सख्त निगरानी और दंड।

3. सार्वजनिक परिवहन को प्राथमिकता: दिल्ली में मेट्रो और बसों का नेटवर्क इतना घना और किफायती हो कि लोग स्वेच्छा से निजी वाहन छोड़ें।

4. कॉरपोरेट जवाबदेही: जिन कंपनियों ने दोषपूर्ण तकनीक वाली गाड़ियां बेचीं, उन्हें मुआवजा कोष (Compensation Fund) बनाने के लिए बाध्य किया जाए, जिससे प्रभावित मालिकों को सब्सिडी या एक्सचेंज वैल्यू मिल सके।

5. न्यायिक हस्तक्षेप: NGT और सुप्रीम कोर्ट को इस मामले में वैज्ञानिक डेटा की मांग करनी चाहिए और उम्र-आधारित प्रतिबंध की संवैधानिकता पर सुनवाई करनी चाहिए।

6. शोध अध्ययन : बड़े पैमाने पर स्वदेशी तथ्यात्मक शोध हो, भ्रामक विदेशी रिसर्च नहीं।


जनता सजा नहीं, समाधान चाहती है

दिल्ली-एनसीआर का मध्यम वर्ग देश की आर्थिक रीढ़ है, न कि सिर्फ एक वोट बैंक। उसकी जमापूंजी को कॉरपोरेट मुनाफे के लिए निचोड़ना राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था के लिए लंबे समय में घातक है। प्रदूषण नियंत्रण एक वैज्ञानिक चुनौती है, इसे नैतिक उपदेश या आर्थिक दंड बनाकर हल नहीं किया जा सकता।


सरकार का कर्तव्य है कि वह जनता को सजा देने के बजाय सच्चे प्रदूषकों को चिन्हित करे, वैज्ञानिक शोध को प्रोत्साहित करे, और एक संवेदनशील, फिटनेस-आधारित नीति लाए। वर्ना, 2026 का सूरज न सिर्फ दिल्ली की हवा के लिए, बल्कि सरकार की विश्वसनीयता के लिए भी अंधकारमय हो सकता है। समय आ गया है कि इस कॉरपोरेट-समर्थित नीतिगत क्रूरता का अंत हो, और वास्तविक पर्यावरण न्याय का मार्ग प्रशस्त हो।


- ओंकारेश्वर पांडेय

(वरिष्ठ पत्रकार एवं विश्लेषक)

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