महंगाई होती तो हम कैसे जीतते (व्यंग्य)

By डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ | Dec 08, 2023

न्यूज चैनलों के प्रभाव और कुछ अपनी सृजनात्मकता जोड़ एक दिन बच्चे साक्षात्कार का खेल खेल रहे थे, देखिए मैडम आप पहले पत्रकारिता की एबीसीडी सीख आइए। आपने हमें फोन करके साक्षात्कार के लिए स्टूडियो में बुलाया। मैंने फोन पर ही बता दिया था कि आप मुझसे ऐसे वैसे सवाल नहीं करेंगी। फिर भी आप मुझसे ऐसे-वैसे सवाल करती जा रही हैं। आपको क्या लगता है कि हम डरते हैं? आपके सवाल सुनकर भाग जायेंगे? तो आप इस गलतफहमी में कतई मत रहिए। हमारी चमड़ी के बारे में आप कतई नहीं जानती। सरकार चलाना बच्चों का खेल नहीं है। दिखाने से ज्यादा छिपाना और बोलने से ज्यादा चुप रहना पड़ता है। आप जैसे विपक्षी टुकड़ों पर पलने वाले न जाने कितने पत्रकार आए और गए। मजाल कि वो हमारा कुछ उखाड़ पाए हों। हमारी सरकार छप्पन इंची सीना लिये घूमती है। - मंत्री जी भड़कते हुए बोले। 

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महंगाई? यह किस चिड़िया का नाम है? कैसी मंहगाई? कहाँ की महंगाई? कौन कहता है यहाँ महंगाई है? महंगाई देखने का इतना ही शौक है तो पड़ोसी देश चले जाइए। तब पता चलेगा कि महंगाई किसे कहते हैं? वहाँ पर लोग दाने-दाने को तरस रहे हैं। - मंत्री जी तैश में आते हुए कहा।

वाह मंत्री जी! आप तो कमाल करते हैं। जब चोट खुद को लगी है तब बगल वाले की चोट देखकर अपनी पीड़ा थोड़े न मिटायेंगे। हम रहते तो इसी देश में हैं न! फिर यहाँ की महंगाई छोड़ पड़ोसी देश की बात क्यों करें? – पत्रकारा मंत्री जी को घेरने लगी। 

देखिए अपनी डेढ़ होशियारी अपने पास रखिए। यह चपड़-चपड़ मेरे पास नहीं चलेगी। यदि जनता बिगड़ गई तो फिर आपकी खैर नहीं है। जो चीज़ है ही नहीं उसके बारे में बार-बार पूछकर अपना टीआरपी बढ़ाना चाहती हैं, तो आप हमसे दूर ही रहिए। अगर महंगाई होती तो हम इतने चुनाव कैसे जीतते? और तो और जिन राज्यों में हमारी सरकार नहीं थी, वहाँ के लोगों ने हमें सामने से बुलाकर शासन थमाया है। तो क्या लगता है आपको कि जनता मूर्ख है और आप ही दुनिया की एकमात्र समझदार हैं। जाइए-जाइए, बहुत देखे आप जैसे। इन सवालों का मुँहतोड़ जवाब देने की ताकत रखते हैं इसीलिए सत्ता में काविज हैं।- मंत्री जी ने आँखें दिखाते हुए कहा। 

तो आप यह कहना चाहते हैं कि जनता बहुत खुश है। महंगाई जैसी कोई चीज़ नहीं है। पेट्रोल, डीजल, टमाटर, दाल, तेल सभी की पहुँच में हैं। क्या मैं आपके समाधान का यही आशय लूँ?- पत्रकारा ने मंत्री जी से संदेह जताते हुए पूछा। 

देखिए पहली बात तो यह कि हमारी सरकार के शब्दकोश में महंगाई जैसा कोई शब्द नहीं है। हमारी सरकार से पहले सिर्फ महंगाई हुआ करती थी। अब सिर्फ सुख ही सुख है। महंगाई होती तो गाड़ियाँ क्यों चलती? रुक क्यों नहीं जातीं? लोग भूखे क्यों नहीं मरते? कहीं आपने पढ़ा या देखा कि पेट्रोल की कीमत से किसी की मौत हो गई या फिर टमाटर के दाम से दिल का दौरा पड़ा? आज लोग देशभक्त हो गए हैं। हमारे शासनकाल में पेट्रोल, डीजल, टमाटर, दाल, तेल क्या हर चीज की खरीदी बड़े प्यार और देशभक्ति से करते हैं। जनता की देशभक्ति इतनी उमड़ रही है कि उनका बस चले तो वह सिर्फ अगली बार के लिए नहीं, हमेशा के लिए हमें सत्ता सौंप देना चाहते हैं। मैं तो कहता हूँ अब इस देश में चुनावों की भी जरूरत नहीं है। लेकिन मुझे संदेह हो रहा कि आप देशभक्त नहीं हैं। आप जनता की चुनी सरकार का अपमान करने पर तुली हैं। यह काम केवल देशद्रोही कर सकता है। लगता है आप देश विरोधी शक्तियों के साथ हाथ मिलाकर देश को तोड़ना चाहती हैं। हम आपके इन बुरे मंसूबों पर पानी फेर देंगे। यदि आप पड़ोसी देश जाना चाहती हैं, तो जैसी आपकी इच्छा। फिर करते हैं आपका कोई न कोई बंदोबस्त....

सवालों से शिकार करने चली पत्रकारा अंत में खुद शिकार बनते देख मुस्कुराते हुए कहने लगी- अरे-अरे मंत्री जी ऐसा न कहिए। भला जल में रहकर मगरमच्छ से बैर करूँगी? नहीं-नहीं मंत्री जी आपने इतना बढ़िया जवाब दिया कि चारों ओर देशभक्ति के नारे गूँज रहे हैं। आप और आपकी सरकार का कोई जवाब नहीं है। यह महंगाई तो केवल मेरा भ्रम है। इस तरह पत्रकारा के कथन से उसकी नौकरी और चैनल की दुकान दोनों नपते-नपते बच गए।

मंत्री जी जाते-जाते पत्रकारा को सुझाव देते हुए बोले– दिखने में खूबसूरत हो। स्मार्ट हो। अपने मार्फत हमारा और हमारी सरकार का प्रचार-प्रसार करो। किसे पता बहुत जल्द चुनावों में टिकट ही मिल जाए।          

- डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’,

(हिंदी अकादमी, मुंबई से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार)

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