कल्पना बड़े काम की चीज़ है (व्यंग्य)

By संतोष उत्सुक | May 20, 2020

किसी मुसीबत को हल करने का सबसे सुरक्षित और सफल हथियार कल्पना है। कल्पना कोई भी काम कहीं भी बैठे निबटा सकती है। संक्रमण काल में तालाबंदी के कारण घर बैठे बैठे कल्पना का झरना फूटा हुआ है जिसके प्रमाण फेसबुक, व्ह्त्सेप पर मिल रहे हैं। जिस तरह से हवन, भजन, कीर्तन से बड़े बड़े कार्य संपन्न हो जाते हैं उसी तरह कल्पना काम करती है। कल्पना कुछ भी करवा सकती है, जैसे हम यह मान सकते हैं कि आम आदमी को सड़क, खेत, झोपडी, आश्रम, शिविर या खोली में कभी कभी खाने को भी मिलता रहे तो वह हमेशा जीवित रह सकता है। गर्मी के मौसम में छोटे से कमरे में दस बंदे, पंखा विहीन छत, पानी रहित शौचालय, साबुन रहित हाथ धोना आम आदमी को ज्यादा दुखी नहीं करता। 

यह आर्थिक कल्पना की वास्तविक उड़ान है कि पांच सौ रूपए उनके लिए काफी होते हैं क्यूंकि उनके सादा, सरल जीवन को सामान्य रूप से जीने के लिए ज्यादा चीज़ों की ज़रूरत नहीं होती। स्थिति ठीक होते ही उसे कुछ न कुछ रोज़गार मिल ही जाएगा। विकट समय में पूरे किए वायदे पूरे किए जाएंगे। ‘कल्पना कीजिए और सुखी रहिए’ बेहद सफल सामाजिक योजना है। भूख से सहमी हुई ख़बरें देखकर हम यह कल्पना कर सकते हैं कि हमारी अर्थ व्यवस्था विश्व में नंबर एक हो सकती है। 

क्या हर्ज़ है अगर हम यह सोचने लगें कि हमारे चैनल निष्पक्ष होकर बेजुबान, वंचितों, गरीबों, मजदूरों और किसानों की आवाज़ बन गए हैं। महामारी की स्थिति में भी कर्मठ राजनेता बिल्कुल राजनीति नहीं कर रहे। धार्मिक नेता मानवता, सदभाव, समानता व सहृदयता की ज़बान बोल रहे हैं। नैतिकता झूम झूम कर सभ्य, सांस्कृतिक नृत्य कर रही है। कलाकार केवल धन अर्जन के लिए नहीं बेहतर सामाजिक बदलावों के लिए जुट गए हैं। यह वास्तविकता नहीं बलिक कल्पना की ही शक्ति है जिसके आधार पर हम देशभक्त, राष्ट्रवादी, नैतिकतावादी, समाजवादी, लोकतांत्रिक, कर्मठ और ईमानदार हो सकते हैं। यह भी जाना बुझा तथ्य है कि कल्पना दर्द की कहानी को आसानी से आंकड़ों में तब्दील कर सकती है। 

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यह कार्य हमारी सरकारें बेहतर तरीके से करती हैं। यह कल्पना का ठोस धरातल ही है जिस पर प्रेमी अपनी प्रेमिका, भावी पति अपनी भावी पत्नी के लिए सदियों से बार बार कितने तरह के चांद उतार लाया है। असली फूल भी तो उन्हें कल्पना लोक में ही ले जाते हैं। क्या पत्थर में ईश्वर की मान्यता की रचना इंसान की कल्पना का नायाब उदाहरण नहीं। वास्तविकता तो हर एक कठिनाई को मुसीबत में बदल देती है, दुःख के कचरे में गिरे हुए भी हम सुवासित सुख की कल्पना करते हैं। बातों बातों में साबित हो गया न कि कल्पना बड़े काम की चीज़ है, ये बेदाग़ बे दाम की चीज़ है।

- संतोष उत्सुक

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