Middle East संकट का भारत पर असर, Crude Oil Import बिल 82% बढ़ा, बिगड़ा बजट का गणित

By Ankit Jaiswal | Jun 18, 2026

दुनिया में ऊर्जा आपूर्ति को लेकर बने तनाव का असर अब भारत के आयात खर्च पर भी साफ दिखाई देने लगा है। कच्चे तेल और गैस की बढ़ती कीमतों के कारण देश का ऊर्जा आयात बिल तेजी से बढ़ा है। इसके चलते व्यापार घाटे और वित्तीय संतुलन पर भी दबाव बढ़ने की आशंका जताई जा रही है।

मौजूद जानकारी के अनुसार, भारत ने मई महीने में तेल और गैस आयात पर लगभग 18.7 अरब डॉलर खर्च किए। यह राशि मई 2025 के 10.3 अरब डॉलर के आयात बिल की तुलना में 81.6 प्रतिशत अधिक है। ऊर्जा आयात पर इतना बड़ा खर्च मुख्य रूप से अंतरराष्ट्रीय बाजार में बढ़ी कीमतों और आपूर्ति संकट का परिणाम माना जा रहा है।

गौरतलब है कि मध्य पूर्व में पैदा हुए तनाव और संघर्ष ने वैश्विक ऊर्जा बाजार को प्रभावित किया है। इस स्थिति के कारण भारत सहित कई बड़े ऊर्जा आयातक देशों को वैकल्पिक स्रोतों से तेल खरीदना पड़ा। इन स्रोतों से मिलने वाला तेल अपेक्षाकृत महंगा रहा, जिससे आयात लागत में तेजी आई है।

बता दें कि भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात के माध्यम से पूरा करता है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय कीमतों में थोड़ी भी बढ़ोतरी सीधे तौर पर देश के आयात बिल को प्रभावित करती है। हाल के संकट के दौरान मध्य पूर्व से आने वाली आपूर्ति में व्यवधान ने स्थिति को और चुनौतीपूर्ण बना दिया है।

मौजूद जानकारी के अनुसार, होर्मुज स्ट्रेट से होकर गुजरने वाली भारत की कच्चे तेल की आपूर्ति का बड़ा हिस्सा प्रभावित हुआ था। यह मार्ग दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण ऊर्जा परिवहन मार्गों में से एक माना जाता है। इस क्षेत्र में पैदा हुए संकट के कारण भारत को अन्य देशों और क्षेत्रों से अधिक कीमत पर तेल खरीदना पड़ा है।

इसका असर देश के व्यापार घाटे पर भी दिखाई दिया है। अप्रैल और मई के दौरान आयात लागत बढ़ने से व्यापार घाटा विशेषज्ञों के अनुमान से अधिक रहा। आर्थिक जानकारों का कहना है कि बढ़ते ऊर्जा आयात बिल का प्रभाव चालू खाते के संतुलन और सरकारी वित्तीय स्थिति पर भी पड़ सकता है।

गौरतलब है कि हाल के सप्ताहों में विदेशी निवेशकों की गतिविधियों पर भी इसका असर देखने को मिला। ऊर्जा कीमतों में तेजी और बढ़ते व्यापार घाटे की वजह से पूंजी बाजार में दबाव बना रहा। साथ ही भारतीय मुद्रा पर भी असर पड़ा और विनिमय दर में कमजोरी दर्ज की गई है।

हालांकि अब स्थिति में कुछ सुधार की उम्मीद दिखाई दे रही है। मौजूद जानकारी के अनुसार, अमेरिका और ईरान के बीच संभावित समझौते तथा मध्य पूर्व से ऊर्जा आपूर्ति सामान्य होने की संभावना जताई जा रही है। यदि ऐसा होता है तो अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतों में नरमी आ सकती है।

विशेषज्ञों का मानना है कि होर्मुज स्ट्रेट में सामान्य गतिविधियां बहाल होने और ऊर्जा आपूर्ति सुचारु होने से भारत को बड़ा लाभ मिल सकता है। इससे कच्चे तेल के आयात पर होने वाला खर्च कम होगा और व्यापार घाटे में भी कमी आ सकती है।

आर्थिक दृष्टि से देखें तो ऊर्जा कीमतों में नरमी भारत जैसे बड़े आयातक देश के लिए राहत लेकर आ सकती है। आने वाले महीनों में वैश्विक परिस्थितियां किस दिशा में जाती हैं, इस पर भारत के आयात खर्च और व्यापार संतुलन की स्थिति काफी हद तक निर्भर रहने वाली हैं।

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