सोशल मीडिया के साये में (व्यंग्य)

By डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ | Feb 24, 2025

सोशल मीडिया के भव्य महल में हर दिन नई महफिल सजती है। यहाँ का हर कोना कनेक्टेड है, और वहाँ का हर मेहमान अपनी रेटिंग और लाइक की गिनती करता है। वहाँ बैठे लोग, जिनका चेहरा स्क्रीन पर चमकता है, मानो वे डिजिटल देवता हों। हर सुबह जब सूरज उगता है, तो लोग नहीं, बल्कि उनके स्मार्टफोन होते हैं जो आँखें खोलते हैं। किसी ने सही कहा है, “आधुनिकता में समर्पण का नाम ही है।”

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महोत्सव में आए मेहमान इस तरह से बैठे थे जैसे वे किसी गंभीर कॉन्फ्रेंस में हों। लेकिन असल में वे केवल अपने मोबाइल फोन में छिपे हुए थे। एक ने तो अपने फोन के सामने मुंह बंद कर रखा था, जैसे कोई पवित्र ग्रंथ पढ़ रहा हो। अब चर्चा में वही था— “मैंने इस हफ्ते कितने पिक्स सेल्फी ली हैं?” दूसरे ने जवाब दिया, “बस पाँच, लेकिन मैंने उनकी ब्राइटनेस बढ़ा दी थी। इससे लाइक्स की बारिश हुई!”

इसके बीच में, एक प्रौद्योगिकी विद्वान ने कहा, “लाइक्स का असली मतलब क्या होता है? ये केवल एक आंकड़ा हैं जो हमें ध्यान भंग करने के लिए बनाए गए हैं। लेकिन हमें तो बस दिखाना है कि हम कितने व्यस्त हैं!”

तभी एक और मेहमान ने बोला, “अरे, अपने पालतू जानवरों की तस्वीरें डालना मत भूलना! वे हमारी सोशल लाइफ के सबसे महत्वपूर्ण सदस्य हैं। उनके बिना हम अधूरे हैं।” हाँ, वास्तव में, यहाँ पालतू जानवरों की तुलना में कोई दूसरा विषय नहीं था। किसी ने एक कुत्ते की तस्वीर पोस्ट की, और तुरंत उसके नीचे सैकड़ों कमेंट्स आने लगे, “वाह, कितना क्यूट है!” और “क्या खूबसूरत मुस्कान है!”

समय बीतता गया, और महोत्सव का मुख्य आकर्षण आ गया। “सबसे बड़े लाइक पाने वाले को पुरस्कार मिलेगा!” जैसे ही यह घोषणा हुई, हर कोई उत्सुकता से अपने फोन की स्क्रीन पर नजरें गड़ाए हुए था।

कुछ ही पलों में, पुरस्कार का विजेता घोषित हुआ—“मोदी भाऊ,” जो हमेशा अपनी तस्वीरों में एक खास प्रकार का चश्मा पहने रहता था। जब उसका नाम पुकारा गया, तो वह खड़ा हुआ और अपने पालतू कुत्ते को गोद में उठाकर कहने लगा, “यह पुरस्कार मेरे कुत्ते के बिना संभव नहीं था। उसने मुझे हमेशा अपनी खूबसूरत तस्वीरों के लिए प्रेरित किया। मैं इसे अपने मम्मी-पापा को समर्पित करता हूँ, जिन्होंने मुझे इस ‘सोशल मीडियाई’ दुनिया में आने के लिए प्रोत्साहित किया।”

सभी ने तालियाँ बजाईं, लेकिन केवल कुछ ही लोगों ने इस बात पर गौर किया कि वह चश्मा उसके चेहरे से हटा नहीं रहा था। शायद वह उसके जीवन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बन गया था, जिसे वह कभी भी नहीं छोड़ना चाहता था।

महोत्सव खत्म हुआ और लोग अपने-अपने घरों की ओर बढ़ने लगे। मोबाइल फोन की चमक में खोए हुए लोग, अपने-अपने घरों में गए। क्या किसी ने सोचा कि वे वास्तव में एक-दूसरे से कितनी दूर हो गए हैं? यहाँ तक कि उन्होंने अपने परिवार के साथ बैठने का भी समय नहीं निकाला। “अरे, मम्मी, मैं बाद में बात करूंगा, अभी तो इंस्टाग्राम पर लाइक आ रहे हैं!”

महानगर में जिंदगी ऐसे ही चलती रही। लोग अपने फोन के आगे झुकते रहे, और विचारों की गहराई को भूलते रहे। ज्ञान का कोई मोल नहीं रह गया था, सबकुछ एक साधारण स्टेटस अपडेट में सिमट गया था। वहाँ के बच्चे खेलना भूल गए, युवा सिर्फ डाटा खर्च कर रहे थे, और बुजुर्ग केवल शिकायतें कर रहे थे।

वास्तव में, आज की यह स्थिति है—सोशल मीडिया का साया, जो केवल एक छाया बनकर रह गया है। शायद हमें एक दिन इस सच का सामना करना पड़ेगा कि इस डिजिटल दुनिया में हम कितनी अकेले हो गए हैं, लेकिन तब तक, हम अपनी-अपनी सेल्फी लेते रहेंगे।

अंत में, यह कहना ही उचित होगा कि: “हम कनेक्टेड हैं, लेकिन वास्तव में हम एक-दूसरे से कितने दूर हैं, यह तो कोई नहीं जानता।”

- डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’,

(हिंदी अकादमी, मुंबई से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार)

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