By प्रेस विज्ञप्ति | Jul 24, 2026
दिल्ली शिक्षक विश्वविद्यालय तथा संस्कृत-संवर्धन-प्रतिष्ठानम् (Samskrit Promotion Foundation) के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित “वैदिक साहित्य में शिक्षा” विषयक द्विदिवसीय राष्ट्रीय वेबिनार का आज शुभारम्भ हुआ। इस संगोष्ठी में देशभर के प्रतिष्ठित विद्वानों, शिक्षाविदों, कुलपतियों, शोधकर्ताओं तथा अकादमिक विशेषज्ञों ने सहभागिता कर भारतीय शिक्षा परम्परा के दार्शनिक, शैक्षिक तथा सामाजिक आयामों पर विचार-विमर्श किया।
अतिथियों एवं प्रतिभागियों का स्वागत करते हुए डॉ. संजीव राय, कुलसचिव, दिल्ली शिक्षक विश्वविद्यालय ने भारत की शैक्षिक विरासत के पुनर्स्मरण तथा उसके स्थायी सिद्धान्तों को आधुनिक शिक्षा व्यवस्था में समाहित करने की आवश्यकता पर बल दिया।
अपने प्रस्तावना वक्तव्य में प्रो. अनु सिंह लाठर, कुलपति, दिल्ली शिक्षक विश्वविद्यालय ने भारतीय शिक्षा के मूलभूत मूल्यों को समझने तथा राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP-2020) के प्रभावी क्रियान्वयन में उनकी प्रासंगिकता को रेखांकित किया।
संस्कृत संवर्धन प्रतिष्ठान के प्रो. चाँद किरण सलूजा ने अपने बीज वक्तव्य में भारतीय शिक्षा के दार्शनिक आधारों का व्यापक विवेचन प्रस्तुत करते हुए गुरुकुल परम्परा में समग्र विकास, चरित्र निर्माण तथा मूल्याधारित शिक्षा की महत्ता पर प्रकाश डाला।
उद्घाटन सत्र को प्रो. हरिकेश सिंह, पूर्व कुलपति, जयप्रकाश विश्वविद्यालय, छपरा (बिहार) के उद्बोधन ने और समृद्ध किया। उन्होंने समकालीन सामाजिक एवं शैक्षिक चुनौतियों के समाधान में प्राचीन भारतीय शैक्षिक सिद्धान्तों की उपयोगिता को रेखांकित किया। साथ ही, उन्होंने भारतीय ज्ञान परम्परा की बौद्धिक एवं सांस्कृतिक निरन्तरता को बनाए रखने में उसकी महत्त्वपूर्ण भूमिका पर प्रकाश डाला।
उद्घाटन सत्र का समापन डॉ. आयुष नन्दन, शोध सहायक, संस्कृत विभाग, दिल्ली विश्वविद्यालय द्वारा प्रस्तुत धन्यवाद ज्ञापन के साथ हुआ।
उद्घाटन सत्र के उपरान्त प्रथम दिवस में वैदिक एवं भारतीय शैक्षिक चिन्तन के विविध आयामों पर आधारित छह विद्वत् सत्र आयोजित किए गए।
प्रथम सत्र में डॉ. नीलाभ तिवारी, निदेशक, केन्द्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय, नासिक परिसर ने “भारतीय शैक्षिक मनोविज्ञान” विषय पर व्याख्यान दिया। उन्होंने भारतीय परम्परा में वर्णित चौदह करणों (अन्तःकरण एवं बाह्यकरण) की भूमिका तथा ज्ञानार्जन की प्रक्रिया में उनके योगदान का विशद विवेचन किया। उन्होंने बुद्धि, मन, चित्त तथा अहंकार की ज्ञान-प्राप्ति में भूमिका को विशेष रूप से स्पष्ट किया।
दोपहर के भोजनावकाश के पश्चात् द्वितीय सत्र में प्रो. श्रीनिवास वरखेड़ी, कुलपति, केन्द्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय ने भारतीय शिक्षा परम्परा में आचार्य की केन्द्रीय भूमिका पर प्रेरणादायी व्याख्यान दिया। उन्होंने समकालीन शिक्षा विमर्श में स्वदेशी शिक्षण-पद्धतियों के पुनरुत्थान की आवश्यकता पर बल दिया तथा अपने व्यक्तिगत अनुभवों के माध्यम से बताया कि शिक्षक का भावनात्मक जुड़ाव तथा उसका आदर्श आचरण ज्ञान एवं जीवन-मूल्यों के संप्रेषण में अत्यन्त महत्त्वपूर्ण होता है।
तृतीय सत्र में प्रो. रमाकान्त पाण्डेय, कुलपति, उत्तराखण्ड संस्कृत विश्वविद्यालय ने वैदिक शिक्षा में विद्यार्थियों के लिए प्रयुक्त विभिन्न संज्ञाओं जैसे—अन्तेवासी, छात्र, शिष्य आदि का विवेचन किया। उन्होंने “वैदिक शिक्षा और सामाजिक समरसता” विषय पर भी विचार व्यक्त करते हुए सामाजिक सद्भाव एवं समावेशी विकास में वैदिक शिक्षा की भूमिका को रेखांकित किया।
चतुर्थ सत्र में प्रो. तुलसीदास परौहा, अध्यक्ष, संस्कृत साहित्य विभाग, महर्षि पाणिनि संस्कृत एवं वैदिक विश्वविद्यालय, उज्जैन ने “इक्कीसवीं शताब्दी में प्राचीन भारतीय शिक्षा” विषय पर व्याख्यान देते हुए पारम्परिक शैक्षिक आदर्शों की वर्तमान समय में प्रासंगिकता पर प्रकाश
डाला।
पंचम सत्र में प्रो. आनन्द वर्धन, स्कूल ऑफ हेरिटेज रिसर्च एंड मैनेजमेंट, डॉ. भीमराव अम्बेडकर विश्वविद्यालय, दिल्ली ने वैदिक साहित्य में निहित वैज्ञानिक अवधारणाओं का विश्लेषण प्रस्तुत किया। उन्होंने प्रतिपादित किया कि वैदिक साहित्य की विषयवस्तु एवं दृष्टिकोण वैज्ञानिक स्वरूप के हैं तथा उसमें अनेक वैज्ञानिक तत्त्व अन्तर्निहित हैं।
प्रथम दिवस के अन्तिम सत्र में प्रो. सी. बी. शर्मा कुलपति, विनोबा भावे विश्वविद्यालय, हज़ारीबाग (झारखण्ड)। ने “उपनिषद्कालीन आचार्य का स्वरूप” विषय पर व्याख्यान दिया। उन्होंने उपनिषदों में वर्णित गुरु-शिष्य सम्बन्ध के पाठीय एवं दार्शनिक आयामों का गहन विश्लेषण प्रस्तुत किया।
प्रथम दिवस के समस्त सत्रों का समापन दिल्ली शिक्षक विश्वविद्यालय की डॉ. सरोज मलिक द्वारा प्रस्तुत धन्यवाद ज्ञापन के साथ हुआ।
संगोष्ठी के प्रथम दिवस में देशभर के विभिन्न विश्वविद्यालयों एवं संस्थानों से आए विद्वानों, प्राध्यापकों, शोधार्थियों तथा विद्यार्थियों ने उत्साहपूर्वक सहभागिता की। विभिन्न सत्रों में हुई चर्चाओं ने यह पुनः स्थापित किया कि वैदिक एवं भारतीय शिक्षा परम्पराएँ समकालीन शैक्षिक चुनौतियों के समाधान तथा मूल्याधारित, समग्र एवं सांस्कृतिक रूप से समृद्ध शिक्षा व्यवस्था के निर्माण में आज भी अत्यन्त प्रासंगिक हैं।
वेबिनार का दूसरा दिन २५जुलै शनिवार को भी विभिन्न शैक्षणिक सत्रों एवं परिचर्चाओं के साथ आयोजित होगा, जिसमें भारतीय ज्ञान परम्परा एवं शिक्षा-दर्शन के विविध आयामों पर विमर्श किया जाएगा।