By नीरज कुमार दुबे | Jun 19, 2026
भारतीय राजनीति इन दिनों एक ऐसे मोड़ पर खड़ी है जहां पुराने रिश्तों, टूटी महत्वाकांक्षाओं और सत्ता की नई हकीकतों ने विपक्ष की राजनीति को गहरे सवालों के सामने ला खड़ा किया है। पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी की करारी हार, महाराष्ट्र में शरद पवार की कमजोर होती पकड़ और उद्धव ठाकरे के सामने खड़ा राजनीतिक संकट अब केवल क्षेत्रीय दलों की परेशानी नहीं रह गया है, बल्कि यह पूरे विपक्ष की दिशा तय करने वाला मुद्दा बन चुका है। इसी पृष्ठभूमि में कांग्रेस में "घर वापसी" की बहस ने अचानक जोर पकड़ लिया है।
दरअसल ममता बनर्जी की स्थिति पहली बार इतनी कमजोर नजर आ रही है। पंद्रह साल तक बंगाल की राजनीति पर एकछत्र राज करने वाली ममता की पार्टी विधानसभा चुनाव में महज अस्सी सीटों पर सिमट गई और भाजपा ने राज्य में पहली बार सरकार बना ली। चुनावी हार के बाद संकट और गहरा गया। कई विधायक और करीबी सहयोगी भाजपा के संपर्क में चले गए। पार्टी के भीतर अभिषेक बनर्जी को लेकर असंतोष खुलकर सामने आया। पुराने नेताओं ने आरोप लगाया कि जिन्होंने वर्षों तक पार्टी को खड़ा किया, उन्हें किनारे कर दिया गया। कभी कांग्रेस को तुच्छ समझने वाली ममता बनर्जी को आखिरकार उसी कांग्रेस के दरवाजे पर दस्तक देनी पड़ी।
कुछ ऐसी ही कहानी शरद पवार की भी है। राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी बनाकर कांग्रेस से अलग रास्ता चुनने वाले पवार आज अपनी ही पार्टी और चुनाव चिन्ह पर नियंत्रण खो चुके हैं। अजित पवार के विद्रोह ने उनकी राजनीतिक ताकत को बुरी तरह झटका दिया था। उद्धव ठाकरे की हालत भी अलग नहीं है। शिवसेना पर नियंत्रण गंवाने के बाद अब उनके सांसदों में भी टूट हो गयी है। इन घटनाओं ने यह साफ कर दिया है कि जिन क्षेत्रीय दलों को कभी अपने राज्यों में अजेय माना जाता था, वह अब भाजपा के आक्रामक विस्तार और अंदरूनी बिखराव के सामने कमजोर पड़ रहे हैं।
इसी माहौल में शिवसेना नेता संजय राउत ने यह विचार उछाला कि कांग्रेस से निकले दलों को फिर से मूल पार्टी में लौट आना चाहिए। राजस्थान के पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और महाराष्ट्र कांग्रेस के नेता नाना पटोले ने भी इस सोच का समर्थन किया। पहली नजर में यह तर्क मजबूत लगता है। इसमें कोई दो राय नहीं कि भाजपा आज देश की सबसे प्रभावशाली राजनीतिक ताकत बन चुकी है। कभी केवल सात राज्यों तक सीमित रहने वाली पार्टी अब 22 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में सत्ता का हिस्सा है। विपक्ष बिखरा हुआ है और कई क्षेत्रीय दल कमजोर पड़ चुके हैं।
लेकिन असली सवाल यह है कि ये नेता कांग्रेस छोड़कर गए ही क्यों थे? ममता बनर्जी ने वैचारिक मतभेदों के कारण कांग्रेस नहीं छोड़ी थी। उन्हें लगता था कि कांग्रेस बंगाल में वाम मोर्चे को हराने में नाकाम हो चुकी है। उन्होंने आक्रामक राजनीति का रास्ता चुना और तृणमूल कांग्रेस बनाई। नतीजा यह हुआ कि उन्होंने चौंतीस साल पुरानी वाम सत्ता को उखाड़ फेंका। शरद पवार ने सोनिया गांधी के विदेशी मूल का मुद्दा उठाकर अलग पार्टी बनाई और महाराष्ट्र में अपनी अलग पहचान कायम की। जगन मोहन रेड्डी ने भी कांग्रेस नेतृत्व से उपेक्षा महसूस करने के बाद नई पार्टी बनाई और कुछ ही वर्षों में आंध्र प्रदेश में कांग्रेस को लगभग समाप्त कर दिया।
आज हालात बदले हैं तो उसकी वजह कांग्रेस की मजबूती नहीं, बल्कि भाजपा का विस्फोटक उभार है। पहले क्षेत्रीय दल कांग्रेस की खाली होती जमीन पर फैलते थे, लेकिन अब उन्हें भाजपा से सीधी टक्कर लेनी पड़ रही है। भाजपा न केवल चुनाव जीत रही है, बल्कि नेताओं, कार्यकर्ताओं और संगठन को भी अपने पक्ष में खींच रही है। यही वजह है कि क्षेत्रीय दलों की जमीन लगातार सिकुड़ रही है।
फिर भी सवाल बना हुआ है कि क्या कांग्रेस में वापसी वास्तव में संभव है? क्या ममता बनर्जी या शरद पवार जैसे नेता दशकों तक अपनी पार्टी चलाने के बाद राहुल गांधी या मल्लिकार्जुन खरगे के नेतृत्व में काम करना स्वीकार करेंगे? क्या उनके समर्थक इसे पचा पाएंगे। साथ ही पश्चिम बंगाल में अधीर रंजन चौधरी और ममता बनर्जी को एक मंच पर साथ काम करते देखना लगभग असंभव लगता है, क्योंकि दोनों की राजनीति ही एक दूसरे के विरोध पर खड़ी रही है।
इसके अलावा विपक्षी दल पहले से ही इंडिया गठबंधन के जरिए साथ काम कर रहे हैं। लोकसभा चुनाव में कांग्रेस, तृणमूल, समाजवादी पार्टी, द्रमुक, शिवसेना और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी ने अलग पहचान बनाए रखते हुए भाजपा को कड़ी चुनौती दी थी। इससे साबित हुआ कि भाजपा के खिलाफ एकजुटता के लिए औपचारिक विलय जरूरी नहीं है। असली समस्या क्षेत्रीय दलों में आपसी प्रतिस्पर्धा की है, जो केवल विलय से खत्म नहीं होने वाली।
सच्चाई यह है कि कांग्रेस को केवल बड़े चेहरे नहीं, बल्कि मजबूत संगठन और जमीनी कार्यकर्ताओं की जरूरत है। वहीं ममता बनर्जी, शरद पवार और जगन मोहन रेड्डी जैसे नेताओं की असली ताकत उनकी क्षेत्रीय पहचान और जनता से सीधा जुड़ाव रहा है। इसलिए उनके लिए कांग्रेस में लौटना शायद राजनीतिक आत्मसमर्पण जैसा होगा। विपक्ष की राजनीति का भविष्य किसी औपचारिक विलय में नहीं, बल्कि साझा रणनीति और मजबूत तालमेल में छिपा दिखाई देता है।
बहरहाल, फिलहाल इतना तय नजर आता है कि भाजपा के खिलाफ लड़ाई में विपक्षी दलों को साथ चलना ही होगा, लेकिन अपनी अलग पहचान खत्म कर कांग्रेस में समा जाना कई क्षेत्रीय नेताओं के लिए राजनीतिक आत्मघाती साबित हो सकता है। वजह साफ है, कांग्रेस में आखिरकार निर्णय की धुरी एक ही परिवार के इर्दगिर्द घूमती दिखाई देती है। ऐसे में वर्षों की मेहनत से अपनी जमीन तैयार करने वाले क्षेत्रीय क्षत्रप बाद में खुद को हाशिये पर पाकर पछता सकते हैं। जिस पार्टी में राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे तक को हर बड़े फैसले पर "हाईकमान से पूछना पड़ेगा" कहना पड़ता हो, वहां आंतरिक लोकतंत्र की वास्तविक स्थिति का अंदाजा आसानी से लगाया जा सकता है।
-नीरज कुमार दुबे