By नीरज कुमार दुबे | Aug 07, 2026
भारत और चीन के बीच लंबे समय से चले आ रहे सीमा विवाद के बावजूद रिश्तों में धीरे-धीरे सकारात्मक बदलाव दिखाई देने लगे हैं। नई दिल्ली में आयोजित भारत-चीन सीमा मामलों पर परामर्श एवं समन्वय तंत्र (WMCC) की 36वीं बैठक ने साफ संकेत दिया है कि दोनों देश बातचीत के जरिए सीमा पर शांति बनाए रखने और लंबित मुद्दों के समाधान की दिशा में आगे बढ़ना चाहते हैं। हालांकि भारत ने एक बार फिर स्पष्ट कर दिया कि द्विपक्षीय संबंधों में वास्तविक प्रगति तभी संभव है, जब वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) पर पूरी तरह शांति और स्थिरता बनी रहे। यही वजह है कि सीमा प्रबंधन, सैन्य समन्वय, सीमा निर्धारण, ट्रांस-बॉर्डर नदियों और पारंपरिक व्यापार जैसे सभी अहम मुद्दों पर भारत ने अपने राष्ट्रीय हितों को सर्वोच्च प्राथमिकता के साथ मजबूती से रखा।
बैठक में 24वें विशेष प्रतिनिधि (SR) वार्ता के निर्णयों को आगे बढ़ाते हुए सीमा निर्धारण, सीमा प्रबंधन, संस्थागत तंत्र को मजबूत करने और सीमा पार सहयोग पर विस्तृत चर्चा हुई। भारत ने विशेष रूप से ट्रांस-बॉर्डर नदियों पर विशेषज्ञ स्तरीय तंत्र की अगली बैठक जल्द बुलाने तथा चीन द्वारा अपनी अपस्ट्रीम परियोजनाओं की तकनीकी जानकारी साझा करने की आवश्यकता को दोहराया। हिमालयी नदियों पर चीन की गतिविधियां भारत की जल सुरक्षा, आपदा प्रबंधन और पर्यावरणीय हितों से सीधे जुड़ी हैं, इसलिए यह मुद्दा केवल तकनीकी नहीं बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा का भी महत्वपूर्ण विषय है।
हम आपको बता दें कि यह बैठक ऐसे समय हुई है जब दोनों देशों के बीच सीमा पर व्यावहारिक सहयोग भी धीरे-धीरे बहाल हो रहा है। लगभग छह वर्षों के अंतराल के बाद उत्तराखंड के लिपुलेख और हिमाचल प्रदेश के शिपकी ला दर्रे से पारंपरिक सीमा व्यापार दोबारा शुरू होना इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। कोविड महामारी और सीमा तनाव के कारण 2020 से बंद पड़े इन व्यापार मार्गों के खुलने से सीमावर्ती क्षेत्रों की अर्थव्यवस्था को नई गति मिलेगी और स्थानीय समुदायों का विश्वास भी मजबूत होगा। चीन ने शुरुआती चरण में सीमित संख्या में व्यापारियों को अनुमति दी है, लेकिन यह पहल दोनों देशों के बीच विश्वास बहाली की प्रक्रिया का प्रतीक मानी जा रही है। इससे पहले दोनों देश नाथू ला सहित तीन अधिकृत व्यापारिक मार्गों को चरणबद्ध तरीके से खोलने पर भी सहमत हो चुके हैं।
इसके साथ ही विदेश सचिव विक्रम मिसरी की हालिया चीन यात्रा ने भी इस कूटनीतिक प्रक्रिया को नई गति दी। बीजिंग में उन्होंने चीन के वरिष्ठ नेताओं के साथ व्यापक वार्ता कर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राष्ट्रपति शी चिनफिंग की उस साझा सोच को आगे बढ़ाने पर चर्चा की, जिसके अनुसार भारत और चीन प्रतिस्पर्धी होने के साथ-साथ विकास के अवसरों में साझेदार भी बन सकते हैं। दोनों देशों ने व्यापार, आर्थिक सहयोग, सांस्कृतिक आदान-प्रदान और जन-से-जन संपर्क बढ़ाने पर सहमति जताई, लेकिन साथ ही यह भी स्वीकार किया कि सीमा पर स्थायी शांति के बिना किसी भी व्यापक साझेदारी की मजबूत नींव तैयार नहीं हो सकती।
हालांकि इन सकारात्मक संकेतों के बावजूद यह भी सच है कि भारत-चीन संबंध अभी पूरी तरह सामान्य नहीं हुए हैं और दोनों देशों के बीच गहरा रणनीतिक अविश्वास अब भी बना हुआ है। गलवान जैसी घटनाओं ने द्विपक्षीय रिश्तों की दिशा बदल दी थी, जिसके बाद भारत ने साफ कर दिया कि सामान्य संबंधों की बुनियाद केवल वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) पर स्थायी शांति, यथास्थिति के सम्मान और सभी द्विपक्षीय समझौतों के ईमानदार पालन पर ही टिक सकती है। इसके बावजूद हाल के महीनों में बढ़े कूटनीतिक संवाद और सीमा व्यापार की बहाली ने रिश्तों में सुधार की उम्मीद जगाई है। इसी कड़ी में भारत में जल्द होने वाले ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग की संभावित भागीदारी को भी बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है, क्योंकि यह दोनों देशों के बीच शीर्ष स्तर पर विश्वास बहाली का नया अवसर बन सकता है। उल्लेखनीय है कि पिछले वर्ष प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी एससीओ शिखर सम्मेलन में भाग लेने के लिए चीन गए थे, जहां दोनों देशों के बीच उच्चस्तरीय संवाद को आगे बढ़ाने की दिशा में महत्वपूर्ण चर्चा हुई थी।
सामरिक दृष्टि से देखें तो भारत की नीति अब पहले से कहीं अधिक संतुलित और परिपक्व दिखाई देती है। एक ओर भारत सीमा पर सैन्य तैयारियों, आधारभूत ढांचे और निगरानी क्षमता को लगातार मजबूत कर रहा है, वहीं दूसरी ओर वह संवाद के सभी वैध माध्यम खुले रखकर यह संदेश भी दे रहा है कि शांति उसकी प्राथमिकता है, लेकिन राष्ट्रीय सुरक्षा से कोई समझौता स्वीकार नहीं होगा। यही संतुलित रणनीति भारत को वैश्विक मंच पर एक जिम्मेदार और आत्मविश्वासी शक्ति के रूप में स्थापित करती है।
बहरहाल, यह स्पष्ट है कि भारत-चीन संबंध अब टकराव और सहयोग के बीच एक नए संतुलन की ओर बढ़ रहे हैं। संवाद जारी रहेगा, व्यापार धीरे-धीरे सामान्य होगा और कूटनीतिक संपर्क भी बढ़ेंगे, लेकिन भारत का रुख पूरी तरह स्पष्ट है कि सीमा पर शांति, संप्रभुता का सम्मान और राष्ट्रीय हित सर्वोपरि हैं। आने वाले समय में यही सिद्धांत दोनों देशों के रिश्तों की दिशा तय करेंगे और एशिया की सामरिक राजनीति पर भी उनका गहरा प्रभाव पड़ेगा।