China और Bhutan से वापस आने के तुरंत बाद Sri Lanka पहुँचे Vikram Misri, भारत के जबरदस्त दाँव से दुनिया हुई हैरान

Vikram Misri
ANI

हम आपको बता दें कि कोलंबो में मिसरी ने राष्ट्रपति अनुरा कुमार दिसानायके, प्रधानमंत्री हरिणी अमरासूर्या, विदेश मंत्री विजिता हेराथ, विदेश सचिव अरुणी रणाराजा, विपक्ष के नेता साजिथ प्रेमदासा तथा श्रीलंकाई तमिल एवं भारतीय मूल के तमिल समुदाय के प्रतिनिधियों से अलग-अलग मुलाकात की।

हिंद महासागर क्षेत्र में बदलते भू-राजनीतिक समीकरणों के बीच भारत ने श्रीलंका के साथ अपने संबंधों को नई ऊंचाई देने की दिशा में निर्णायक कदम बढ़ाया है। देखा जाये तो विदेश सचिव विक्रम मिसरी की कोलंबो यात्रा भारत की व्यापक क्षेत्रीय रणनीति का हिस्सा है, जिसका उद्देश्य आर्थिक साझेदारी, सुरक्षा सहयोग और सामरिक प्रभाव को समानांतर रूप से मजबूत करना है। खास बात यह है कि चीन और भूटान की महत्वपूर्ण यात्राओं के तुरंत बाद मिसरी का श्रीलंका पहुंचना इस पूरे कूटनीतिक अभियान को और अधिक रणनीतिक आयाम देता है।

हम आपको बता दें कि कोलंबो में मिसरी ने राष्ट्रपति अनुरा कुमार दिसानायके, प्रधानमंत्री हरिणी अमरासूर्या, विदेश मंत्री विजिता हेराथ, विदेश सचिव अरुणी रणाराजा, विपक्ष के नेता साजिथ प्रेमदासा तथा श्रीलंकाई तमिल एवं भारतीय मूल के तमिल समुदाय के प्रतिनिधियों से अलग-अलग मुलाकात की। इन बैठकों में दोनों देशों ने दिसंबर 2024 के संयुक्त बयान और अप्रैल 2025 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की श्रीलंका यात्रा के दौरान हुए समझौतों को तेजी से लागू करने पर सहमति जताई।

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आर्थिक मोर्चे पर सबसे बड़ा संकेत भारत-श्रीलंका मुक्त व्यापार समझौते (FTA) के पुनरीक्षण की प्रक्रिया को तेज करने और द्विपक्षीय सामाजिक सुरक्षा समझौते को अंतिम रूप देने के निर्णय से मिला। यदि यह समझौता लागू होता है तो दोनों देशों के निवेश, सेवा क्षेत्र और पेशेवरों की आवाजाही को नई गति मिलेगी। यह केवल व्यापारिक विस्तार नहीं, बल्कि श्रीलंका की अर्थव्यवस्था में भारत की दीर्घकालिक उपस्थिति को संस्थागत रूप देने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।

हम आपको बता दें कि भारत ने श्रीलंका के पुनर्निर्माण और विकास के लिए अपनी वित्तीय प्रतिबद्धता भी और मजबूत की। चक्रवात डिटवाह के बाद घोषित 450 मिलियन डॉलर के पुनर्निर्माण पैकेज के तहत 350 मिलियन डॉलर की भारतीय रुपये आधारित दो नई लाइन ऑफ क्रेडिट यानि 250 मिलियन डॉलर रेलवे परियोजनाओं और 100 मिलियन डॉलर पशुपालन एवं अन्य प्राथमिक क्षेत्रों के लिए, पर समझौते हुए। इसके अतिरिक्त 100 मिलियन डॉलर के अनुदान से क्षतिग्रस्त मकानों और स्थायी पुलों के निर्माण की प्रक्रिया शीघ्र शुरू होगी। स्वास्थ्य, शिक्षा और आपदा प्रबंधन के क्षेत्र में भी भारत चिकित्सा उपकरण, मेडिकल कियोस्क, शैक्षणिक संसाधन तथा राष्ट्रीय आपदा चेतावनी प्रणाली जैसी परियोजनाओं को आगे बढ़ाएगा। उत्तरी रेलवे कॉरिडोर का पुनर्वास पूरा हो चुका है, जिससे ट्रेन सेवाएं फिर शुरू हो गई हैं।

इसके अलावा, ऊर्जा और डिजिटल कनेक्टिविटी भी इस यात्रा के प्रमुख स्तंभ रहे। दोनों देशों ने बिजली ग्रिड इंटरकनेक्शन, सम्पूर सौर ऊर्जा परियोजना और त्रिंकोमाली को क्षेत्रीय ऊर्जा हब के रूप में विकसित करने की दिशा में प्रगति की समीक्षा की। साथ ही श्रीलंका यूनिक डिजिटल आइडेंटिटी परियोजना को तेज करने तथा भारत के 61.5 मिलियन डॉलर के अनुदान से कंकेसनतुरई बंदरगाह के आधुनिकीकरण पर भी सहमति बनी। यह बंदरगाह जाफना क्षेत्र में स्थित है और हिंद महासागर में भारत की समुद्री रणनीति के लिए विशेष महत्व रखता है।

हालांकि इस यात्रा का सबसे संवेदनशील पहलू तमिल समुदाय और प्रांतीय परिषद चुनाव का मुद्दा रहा। विदेश सचिव मिसरी ने श्रीलंका से लंबे समय से लंबित प्रांतीय परिषद चुनाव शीघ्र कराने तथा संविधान के तहत तमिल समुदाय की राजनीतिक आकांक्षाओं को पूरा करने का आग्रह किया। खास बात यह है कि नई दिल्ली ने अपने आधिकारिक बयान में इस मुद्दे को प्रमुखता दी, जबकि कोलंबो ने अपनी प्रेस विज्ञप्ति में इसका उल्लेख तक नहीं किया। इससे स्पष्ट है कि दोनों देशों की प्राथमिकताओं में कुछ अंतर अभी भी मौजूद है। भारत ने भारतीय मछुआरों की गिरफ्तारी के मामले को भी मानवीय दृष्टिकोण से हल करने और शीघ्र रिहाई की मांग दोहराई।

देखा जाये तो सामरिक दृष्टि से यह पूरी कूटनीतिक कवायद अत्यंत महत्वपूर्ण है। चीन, भूटान और श्रीलंका की लगातार यात्राएं दर्शाती हैं कि भारत अपने पड़ोस में संतुलन स्थापित करने की बहुस्तरीय रणनीति पर काम कर रहा है। चीन के साथ वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) पर स्थिरता, भूटान में 10,000 करोड़ रुपये के विकास पैकेज और डोकलाम क्षेत्र पर करीबी नजर रखने के बाद श्रीलंका में भारत की सक्रियता इस बात का संकेत है कि नई दिल्ली हिंद महासागर क्षेत्र में चीन के बढ़ते प्रभाव को केवल सैन्य नहीं, बल्कि आर्थिक, अवसंरचनात्मक और विकासात्मक साझेदारी के माध्यम से संतुलित करना चाहती है।

विशेष रूप से त्रिंकोमाली ऊर्जा हब, कंकेसनतुरई बंदरगाह, डिजिटल पहचान परियोजना और रेलवे नेटवर्क जैसी पहलें भविष्य में भारत की समुद्री सुरक्षा, ऊर्जा आपूर्ति श्रृंखला और क्षेत्रीय कनेक्टिविटी को मजबूत करेंगी। वहीं श्रीलंका की ओर से यह आश्वासन कि उसकी भूमि का उपयोग भारत की सुरक्षा के प्रतिकूल नहीं होने दिया जाएगा, दोनों देशों के रणनीतिक विश्वास को नई मजबूती देता है।

बहरहाल, विक्रम मिसरी की श्रीलंका यात्रा मात्र द्विपक्षीय संबंधों की समीक्षा नहीं, बल्कि भारत की 'Neighbourhood First' और 'Vision MAHASAGAR' नीति को जमीन पर उतारने की एक निर्णायक कड़ी साबित हुई है। यह यात्रा स्पष्ट करती है कि नई दिल्ली अब अपने पड़ोस में केवल मित्रता नहीं, बल्कि आर्थिक एकीकरण, सामरिक साझेदारी और सुरक्षा हितों को एक साथ साधने वाली दीर्घकालिक भू-राजनीतिक रणनीति पर आगे बढ़ रही है।

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