By नीरज कुमार दुबे | Jun 16, 2026
भारत अब पेट्रोल और डीजल पर निर्भर अर्थव्यवस्था से निकलकर वैकल्पिक ईंधन की दिशा में निर्णायक कदम बढ़ा रहा है। केंद्रीय सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी ने E-100 ईंधन के मानकों को मंजूरी देकर देश की ऊर्जा नीति में एक नई बहस और नई उम्मीद दोनों को जन्म दिया है। इस फैसले के बाद इथेनॉल आधारित परिवहन व्यवस्था को लेकर सरकार, वाहन कंपनियों और ऊर्जा क्षेत्र में तेजी से हलचल बढ़ गई है। माना जा रहा है कि आने वाले वर्षों में यही ईंधन भारत को कच्चे तेल के वैश्विक झटकों से बचाने का मजबूत आधार बन सकता है।
मोदी सरकार की नजर सिर्फ पर्यावरण पर नहीं बल्कि अर्थव्यवस्था और रणनीतिक सुरक्षा पर भी है। भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा विदेशों से कच्चे तेल के रूप में खरीदता है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतें बढ़ते ही देश का आयात बिल और महंगाई दोनों बढ़ जाती हैं। ऐसे में सरकार इथेनॉल आधारित ईंधन को ऊर्जा आत्मनिर्भरता का रास्ता मान रही है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार इथेनॉल मिश्रण कार्यक्रम के कारण अब तक एक लाख करोड़ रुपये से अधिक के कच्चे तेल आयात की बचत हुई है, जबकि किसानों को लगभग अस्सी हजार करोड़ रुपये की अतिरिक्त आय मिली है।
ऊर्जा विशेषज्ञ भी इसे भारत की दीर्घकालिक रणनीति का अहम हिस्सा मान रहे हैं। केपीएमजी की हालिया रिपोर्ट में कहा गया है कि इथेनॉल आधारित बदलाव भारत के परिवहन ऊर्जा ढांचे को मजबूत बना सकता है और वैश्विक तेल संकटों से देश को बचाने में मददगार साबित हो सकता है।
देखा जाये तो E-100 ईंधन की सबसे बड़ी ताकत यह है कि इससे किसानों की भूमिका सीधे ऊर्जा अर्थव्यवस्था से जुड़ जाएगी। गन्ना और मक्का जैसी फसलों की मांग बढ़ेगी तो ग्रामीण अर्थव्यवस्था को नया सहारा मिलेगा। लंबे समय से खेती में लागत और लाभ के संकट से जूझ रहे किसानों के लिए यह अतिरिक्त आय का नया रास्ता बन सकता है। सरकार इसी वजह से इसे कृषि और ऊर्जा दोनों क्षेत्रों के लिए दोहरा लाभ मान रही है।
हालांकि सवाल यह भी है कि क्या E-100 पेट्रोल की पूरी तरह जगह ले सकता है। जवाब है, हां लेकिन तुरंत नहीं। देश की करोड़ों गाड़ियां अभी पारंपरिक पेट्रोल या E-20 ईंधन के हिसाब से बनी हैं। उन्हें सीधे E-100 पर चलाना संभव नहीं है। इथेनॉल का व्यवहार पेट्रोल से अलग होता है। इससे इंजन की संरचना, फ्यूल पंप, इंजेक्टर और पाइप लाइन तक में बदलाव करना पड़ता है। यही वजह है कि अब वाहन कंपनियां विशेष फ्लेक्स फ्यूल तकनीक वाले वाहन विकसित कर रही हैं।
मारुति सुजूकी ने वैगन आर का फ्लेक्स फ्यूल मॉडल पेश कर संकेत दे दिया है कि कम कीमत वाली जनसाधारण की गाड़ियां भी इथेनॉल आधारित तकनीक पर लाई जा सकती हैं। इसके अलावा टोयोटा, एमजी, हुंडई और सुजुकी भी ऐसे उत्पादों पर काम कर रही हैं। दोपहिया क्षेत्र में हीरो मोटोकॉर्प ने स्प्लेंडर और एच एफ डीलक्स के फ्लेक्स फ्यूल संस्करण सामने रखे हैं। इससे साफ है कि उद्योग जगत अब इस बदलाव को गंभीरता से लेने लगा है।
देखा जाये तो E-100 के कई फायदे हैं। सबसे पहला लाभ विदेशी तेल पर निर्भरता कम होना है। इससे देश की ऊर्जा सुरक्षा मजबूत होगी। दूसरा बड़ा लाभ पर्यावरण को होगा क्योंकि इथेनॉल पारंपरिक जीवाश्म ईंधन की तुलना में अपेक्षाकृत स्वच्छ माना जाता है और इससे कार्बन उत्सर्जन कम हो सकता है। तीसरा लाभ ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मिलेगा जहां इथेनॉल उत्पादन से कृषि आधारित उद्योगों को नई गति मिल सकती है।
वैसे इथेनॉल को लेकर आम उपभोक्ताओं के मन में अभी भी कई तरह की आशंकाएं हैं। सबसे बड़ी चिंता गाड़ी के इंजन और उसकी उम्र को लेकर है। बहुत से वाहन मालिक मानते हैं कि अधिक इथेनॉल मिश्रण से इंजन पर अतिरिक्त दबाव पड़ सकता है, माइलेज घट सकता है और लंबे समय में फ्यूल पाइप, रबर पार्ट्स तथा इंजेक्टर जैसे हिस्सों को नुकसान हो सकता है। विशेषज्ञों का कहना है कि पुराने पेट्रोल वाहन पूरी तरह इथेनॉल आधारित ईंधन के लिए तैयार नहीं हैं, इसलिए उनमें दिक्कतें आ सकती हैं। यही वजह है कि लोग अपने मौजूदा वाहन में अधिक इथेनॉल वाला ईंधन डलवाने से हिचक रहे हैं। हालांकि नई फ्लेक्स फ्यूल तकनीक वाली गाड़ियां विशेष रूप से इथेनाल के हिसाब से तैयार की जा रही हैं, इसलिए उनमें ऐसी आशंकाएं कम होंगी। सरकार और कंपनियां यह दावा कर रही हैं कि सही तकनीक वाले इंजनों में इथेनॉल से गाड़ी की आयु पर कोई गंभीर असर नहीं पड़ेगा, लेकिन उपभोक्ताओं का भरोसा जीतना अभी बाकी है।
कीमत को लेकर भी बहस तेज है। माना जा रहा है कि देश में बड़े पैमाने पर उत्पादन होने पर इथेनॉल आधारित ईंधन पेट्रोल की तुलना में सस्ता पड़ सकता है, क्योंकि इसका स्रोत घरेलू कृषि क्षेत्र है और इसमें आयातित कच्चे तेल पर निर्भरता कम रहती है। फिर भी आम लोगों के बीच यह सवाल लगातार उठ रहा है कि जब मौजूदा E-20 ईंधन में बीस प्रतिशत इथेनॉल मिला हुआ है, तब उपभोक्ताओं से पूरी तरह पेट्रोल जैसी कीमत क्यों वसूली जा रही है। आलोचकों का तर्क है कि यदि पेट्रोल की मात्रा कम है तो कीमत में भी उसका असर दिखना चाहिए। दूसरी ओर सरकार का कहना है कि ईंधन मूल्य निर्धारण केवल कच्चे तेल की मात्रा से तय नहीं होता, बल्कि उत्पादन, प्रसंस्करण, परिवहन और कर व्यवस्था जैसे कई पहलू उसमें शामिल रहते हैं। साथ ही डीजल में इथेनॉल मिलाने को लेकर अभी व्यापक स्तर पर कोई स्पष्ट योजना सामने नहीं आई है, क्योंकि डीजल इंजन की तकनीक पेट्रोल इंजनों से अलग होती है और उसमें इथेनॉल मिश्रण को लेकर ज्यादा तकनीकी चुनौतियां हैं। फिलहाल सरकार का मुख्य जोर पेट्रोल आधारित वाहनों और फ्लेक्स फ्यूल तकनीक को आगे बढ़ाने पर है।
लेकिन तस्वीर का दूसरा पक्ष भी कम चुनौतीपूर्ण नहीं है। इथेनॉल की ऊर्जा क्षमता पेट्रोल से कम होती है। यानी समान दूरी तय करने के लिए वाहन को ज्यादा ईंधन की जरूरत पड़ सकती है। इसके अलावा मौजूदा वाहनों को सीधे E-100 पर चलाना संभव नहीं है। उपभोक्ताओं को नए फ्लेक्स फ्यूल वाहन खरीदने होंगे, जो शुरुआती दौर में महंगे भी हो सकते हैं।
सबसे बड़ी चुनौती बुनियादी ढांचे की है। देशभर के पेट्रोल पंपों को E-100 के भंडारण और वितरण के लिए नई व्यवस्था विकसित करनी होगी। जब तक व्यापक स्तर पर ईंधन स्टेशन तैयार नहीं होंगे, तब तक उपभोक्ताओं का भरोसा भी नहीं बन पाएगा। दूसरी चुनौती इथेनॉल उत्पादन की निरंतर आपूर्ति सुनिश्चित करना है। यदि ईंधन उत्पादन के लिए अत्यधिक कृषि संसाधन लगाए गए तो खाद्य सुरक्षा और जल संकट जैसे सवाल भी उठ सकते हैं।
बहरहाल, इसके बावजूद सरकार और उद्योग दोनों मानते हैं कि भारत अब ऊर्जा परिवर्तन के ऐसे मोड़ पर पहुंच चुका है जहां वैकल्पिक ईंधन को टाला नहीं जा सकता। E-100 कोई रातोंरात होने वाली क्रांति नहीं है, बल्कि यह लंबी यात्रा की शुरुआत है। आने वाले वर्षों में पेट्रोल और इथेनॉल दोनों साथ-साथ चलेंगे, लेकिन दिशा साफ दिखाई दे रही है। भारत अब तेल आयात पर टिके भविष्य से हटकर खेतों से निकलने वाली ऊर्जा की ओर बढ़ रहा है।
-नीरज कुमार दुबे