PM E-DRIVE Scheme पर मंत्रालयों में फंसा पेंच, Electric Scooter पर Subsidy का क्या होगा?

By दिव्यांशी भदौरिया | Mar 25, 2026

केंद्र सरकार देश में इलेक्ट्रिक वाहनों की रफ्तार बढ़ाने के लिए एक बड़ा कदम उठा सकती है। भारी उद्योग मंत्रालय ने इलेक्ट्रिक दोपहिया (e2w) और तिपहिया (e3w)वाहनों के लिए सब्सिडी जारी रखने की मांग की है।  PM E-DRIVE योजना के तहत मार्च 2028 तक वित्तीय सहायता को बढ़ा दिया गया है। हालांकि, इलेक्ट्रिक वाहनों के लिए रियायती दरें अभी भी 31 मार्च 2026 तक ही सीमित हैं। दरअसल, ये फैसला पूरी तरह से वित्त मंत्रालय पर ही निर्भर करता है।

जानें पूरा मामला?

सरकारी आंकड़ों के मुताबिक इलेक्ट्रिक दोपहिया वाहनों के लिए निर्धारित 1,772 करोड़ रुपये के बजट में से 1,259.91 करोड़ रुपये पहले ही खर्च किए जा चुके हैं। वहीं, इलेक्ट्रिक तिपहिया श्रेणी में 907 करोड़ रुपये के कुल आवंटन में से 737.35 करोड़ रुपये का इस्तेमाल हो चुका है।

योजना की समयसीमा का पेच

पीएम ई-ड्राइव योजना की शुरुआत 29 दिसंबर 2024 को 10,900 करोड़ रुपये के कुल प्रावधान के साथ शुरु हुई थी। हालिए इसे मार्च 2028 तक विस्तार तो दिया गया, लेकिन इसका मुख्य फोकस ई-ट्रक और ई-बस जैसी भारी वाहनों पर है। इसलिए इस्तेमाल होने वाले स्कूटर और ऑटो के लिए सब्सिडी की समयसीमा बढ़ाने के लिए नई मंजूरी दी गई है।

क्या सब्सिडी चालू रहेगी?

पहले सब्सिडी को लेकर स्थिति अनिश्चित बनी हुई है, क्योंकि इसकी अंतिम तारीख 31 मार्च 2026 तय है और इसे आगे बढ़ाने के लिए मिनिस्ट्री ऑफ फाइनेंस की मंजूरी जरुरी है। अगर मंजूरी नहीं मिली तो इलेक्ट्रिक वाहन खरीदना महंगा हो सकता है। इससे आम उपभोक्ता पर सीधा असर पड़ता है।

योजना में कोई बदलाव भी होगा

- इन आंकड़ों के आधार पर यह माना जा रहा है कि योजना की संरचना में आगे चलकर बड़े बदलाव किए जा सकते हैं। पीएम ई-ड्राइव स्कीम की शुरुआत 29 सितंबर 2024 को हुई थी, जिसके लिए 10,900 करोड़ रुपये का बजट निर्धारित किया गया था। बाद में इस योजना की अवधि मार्च 2028 तक बढ़ा दी गई, हालांकि इलेक्ट्रिक दोपहिया (e2W) और तिपहिया (e3W) वाहनों पर मिलने वाली सब्सिडी फिलहाल 2026 तक ही लागू है। इसे आगे जारी रखने के लिए अलग से मंजूरी लेना आवश्यक होगा।

- इसके अलावा सरकार अब अपना ध्यान इलेक्ट्रिक बसों, इलेक्ट्रिक ट्रकों और टेस्टिंग इंफ्रास्ट्रक्चर के विकास पर केंद्रित कर रही है। इसका कारण यह है कि इन क्षेत्रों में तकनीकी और संचालन से जुड़ी चुनौतियां ज्यादा हैं, जिन्हें दूर करना जरूरी समझा जा रहा है, ताकि इनका बेहतर विकास सुनिश्चित किया जा सके।

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