By नीरज कुमार दुबे | Aug 29, 2026
भारत और अमेरिका के बीच रक्षा सहयोग अब सिर्फ हथियार खरीदने तक सीमित नहीं रह गया है। भारतीय सेना द्वारा अमेरिकी Javelin एंटी-टैंक गाइडेड मिसाइल सिस्टम की खरीद के लिए Letter of Offer and Acceptance (LOA) पर हस्ताक्षर इस बदलते रिश्ते का एक महत्वपूर्ण संकेत है। अमेरिकी दूतावास ने इसे भारत-अमेरिका रक्षा साझेदारी को अधिक गहरा, सक्षम और रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण बनाने वाला कदम बताया है। खास बात यह है कि इस समझौते के साथ भविष्य में दोनों देशों के रक्षा उद्योगों के बीच सह-उत्पादन यानी co-production की संभावनाओं का रास्ता भी खुला है।
भारत के लिए यह जरूरत अचानक पैदा नहीं हुई है। भारतीय सेना करीब 2009 से ही आधुनिक तीसरी पीढ़ी की anti-tank guided missile प्रणाली की तलाश में रही है। जरूरत ऐसी मिसाइल की थी जो हल्की हो, सटीक हो और fire-and-forget क्षमता से लैस हो, ताकि पुरानी wire-guided प्रणालियों की सीमाओं से बाहर निकला जा सके। लेकिन तकनीक हस्तांतरण, लागत, खरीद प्रक्रिया और बाद में स्वदेशी विकास पर जोर जैसी वजहों से आधुनिक ATGM की तलाश लंबे समय तक खिंचती रही।
यही वजह है कि Javelin का मौजूदा सौदा केवल एक और विदेशी हथियार खरीद के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। यह भारतीय सेना की तत्काल operational जरूरत और दीर्घकालिक रक्षा औद्योगिक रणनीति के बीच एक पुल बन सकता है। अमेरिकी दूतावास ने साफ तौर पर कहा है कि LOA पर हस्ताक्षर के बाद भारत Javelin system का ग्राहक बन गया है और यह समझौता दोनों देशों के रक्षा उद्योगों के बीच भविष्य के सहयोग के लिए दरवाजा खोलता है। यानी असली रणनीतिक महत्व मिसाइलों की संख्या से कहीं आगे है।
देखा जाये तो इस सौदे का सामरिक महत्व भी बेहद स्पष्ट है। भारत को ऐसे युद्धक्षेत्र में अपनी infantry की anti-armour क्षमता मजबूत करनी है जहां बख्तरबंद वाहनों के खिलाफ तेजी से प्रतिक्रिया और सटीक प्रहार महत्वपूर्ण हो जाते हैं। Javelin की portability का अर्थ है कि इसे अग्रिम मोर्चे पर तैनात सैनिक अपेक्षाकृत लचीले ढंग से इस्तेमाल कर सकते हैं। Fire-and-forget क्षमता सैनिक को launch के बाद तुरंत reposition करने की सुविधा देती है। ऐसे में missile केवल दुश्मन के armour को निशाना बनाने का साधन नहीं रहती, बल्कि छोटे infantry units की tactical flexibility बढ़ाने वाला हथियार बन जाती है।
लेकिन इससे भी बड़ा सवाल भारत-अमेरिका रक्षा संबंधों की दिशा का है। अमेरिकी राजदूत Sergio Gor ने कहा है कि यह समझौता अमेरिकी समर्थन की गहराई को दिखाता है और दोनों देशों के रक्षा उद्योगों के लिए नए अवसर पैदा करता है। वॉशिंगटन की नजर में भारत केवल हथियारों का खरीदार नहीं, बल्कि भविष्य के defence industrial cooperation का साझेदार भी बन सकता है। अमेरिकी दूतावास ने दोनों देशों के defence industrial bases को मजबूत करने की संभावना पर विशेष जोर दिया है।
देखा जाये तो यहीं से इस सौदे का रणनीतिक महत्व बढ़ जाता है। भारत एक ओर अपनी सैन्य क्षमता को तेजी से आधुनिक बनाना चाहता है, वहीं दूसरी ओर रक्षा उत्पादन में आत्मनिर्भरता बढ़ाने की कोशिश कर रहा है। ऐसे में यदि Javelin के क्षेत्र में co-production की संभावना वास्तविक औद्योगिक साझेदारी में बदलती है, तो भारत को केवल तैयार हथियार हासिल करने की बजाय अमेरिकी defence technology और manufacturing ecosystem के साथ अधिक गहरा जुड़ाव मिल सकता है। यह भारत के लिए लंबी अवधि में अधिक महत्वपूर्ण उपलब्धि होगी।
हालांकि एक बात अभी साफ नहीं है कि भारत कितने Javelin systems खरीद रहा है और इस खरीद की कुल कीमत कितनी है। अमेरिकी दूतावास और रक्षा मंत्रालय ने इन विवरणों को सार्वजनिक नहीं किया है। इसलिए इस सौदे को तत्काल बड़े पैमाने की anti-tank क्षमता में बदलाव मानना जल्दबाजी होगी। फिलहाल इसकी सबसे बड़ी अहमियत यह है कि भारत ने Javelin को अपने सैन्य विकल्पों में शामिल कर लिया है और साथ ही अमेरिका के साथ रक्षा औद्योगिक सहयोग का एक और दरवाजा खोल दिया है।
बहरहाल, Javelin सौदे का संदेश दो स्तरों पर है। युद्धक्षेत्र के लिए भारत अपनी infantry को ज्यादा सटीक, मोबाइल और survivable anti-armour क्षमता देना चाहता है; और रणनीतिक स्तर पर वॉशिंगटन के साथ रक्षा संबंध को खरीददार-विक्रेता के रिश्ते से आगे ले जाना चाहता है। अगर co-production की बात जमीन पर उतरती है, तो यही सौदा आने वाले वर्षों में भारत-अमेरिका रक्षा साझेदारी के अगले चरण की शुरुआत साबित हो सकता है।
नीरज कुमार दुबे