By अभिनय आकाश | Jan 15, 2026
पूरी दुनिया डोनाल्ड ट्रंप की अनिश्चित नीतियों, टेरिफ वॉर और जिओपॉलिटिकल अराजकता से डर के माहौल में जी रही तब भारत चुपचाप लेकिन मजबूती से एक वैकल्पिक वैश्विक नेतृत्व की नींव रख रहा और इस खबर का सबसे बड़ा मंच बनने जा रहा। ब्रिक्स समिट 2026 जिसकी मेजबानी भारत कररहा है। अगर साल 2025 वो साल रहा जब भारत अमेरिका संबंधों में ठंडापन आया तो साल 2026 इससे भी ज्यादा कठिन और जटिल होने वाले हैं। क्यों? क्योंकि डोनाल्ड ट्रंप आज खुद को वैश्विक व्यवस्था से ऊपर मानने लगे हैं। वेनेजुला के संसाधनों पर दबाव, क्यूबा पर फिर से प्रतिबंधों की धमकी, मेक्सिको पर टेरिफ, ईरान से व्यापार करने वालों पर 25% टैक्स की चेतावनी। यह सब मिलकर दुनिया को एक अराजक, अस्थिर और डर से भरे दौर की तरफ ले जा रहा है और इसका सीधा असर भारत जैसी उभरती शक्तियों पर पड़ना तय है।
भारत के लिए ब्रिक्स 2026 वही टर्निंग पॉइंट है। विदेश मंत्री एस जयशंकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और पूरी भारतीय कूटनीति इस समिट के जरिए सिर्फ भारत का नहीं पूरे ग्लोबल साउथ का भविष्य तय कर सकते हैं। कुछ दिन पहले भारत ने आधिकारिक रूप से ब्रिक्स की अध्यक्षता 2026 संभाल ली है। विदेश मंत्री डॉ एस जयशंकर ने दिल्ली में एक समारोह में सम्मेलन का लोगो, थीम और वेबसाइट लॉन्च किया। इस मौके पर ब्राजील, चीन, रूस जैसे प्रमुख ब्रिक्स देशों समेत कई देशों के एंबेसेडर मौजूद थे।
जयशंकर ने अपने संबोधन में भारत की अध्यक्षता के तहत थीम और लोगो के महत्व को भी रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि भारत अपनी अध्यक्षता में ब्रिक्स को समावेशी और मानव केंद्रित बनाने की दिशा में काम करेगा। उन्होंने कहा कि समूह के 20 साल पूरे होने के वर्ष में ब्रिक्स की अध्यक्षता बहुत मायने रखती है। इस यात्रा में ब्रिक्स उभर रही अर्थव्यवस्थाओं और बाजारों के बीच सहयोग का एक अहम प्लैटफॉर्म बन कर उभरा है। दुनिया का वैश्विक माहौल कई चुनौतियों से घिरा हुआ है। इनमें जियोपॉलिटिकल अनिश्चितताएं, जटिल आर्थिक लैंडस्केप, क्लाइमेट संबंधी चुनौतियां अहम है।
आज ब्रिक्स कोई छोटा समूह नहीं है। 11 सदस्य देश लगभग 50% विश्व जनसंख्या, 40% वैश्विक जीडीपी, 26% ग्लोबल ट्रेड। हाल ही में यूरोपीय पार्लियामेंट की एक रिपोर्ट सामने आई जिसमें साफ कहा गया कि अब समय है ब्रिक्स प्लस देशों के साथ करीबी सहयोग बढ़ाने का। ब्रिक्स 2026 भारत के लिए सिर्फ एक समिट नहीं यह भारत की नेतृत्व परीक्षा है। ग्लोबल साउथ की उम्मीद है और दुनिया को एक वैश्विक रास्ता दिखाने का मौका है। अगर भारत सफल होता है तो वसुदेव कुटुंबकम सिर्फ नारा नहीं वैश्विक नीति बन सकता है।