BRICS की शानदार सफलता के बाद भारत ने पड़ोस में छेड़ा 'महा-अभियान', हिमालय से लेकर हिंद महासागर तक तेजी से एक्टिव हुआ India

By नीरज कुमार दुबे | Sep 17, 2026

नई दिल्ली ने ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के तुरंत बाद जिस गति से पड़ोसी देशों के साथ उच्चस्तरीय संपर्क बढ़ाया है, उसने भारतीय विदेश नीति के अगले चरण की तस्वीर काफी हद तक साफ कर दी है। 12-13 सितंबर को नई दिल्ली में ब्रिक्स शिखर सम्मेलन की मेजबानी के बाद भारत ने हिमालयी पड़ोस और हिंद महासागर क्षेत्र में अपनी सक्रियता तेज कर दी है।

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साथ ही गासा में 500 किलोवाट की लुनाना जलविद्युत परियोजना की आधारशिला रखी गई। इसका उद्देश्य भूटान की उन बस्तियों तक बिजली पहुंचाना है, जो अब तक विद्युतीकरण से बाहर हैं। मोंगार में 65 बिस्तरों वाले ग्यालत्सुएन जेत्सुन पेमा मातृ एवं शिशु अस्पताल का उद्घाटन हुआ, जबकि समद्रुप जोंगखार में 80 मीटर लंबे जगनाथन पुल का लोकार्पण किया गया। ऊर्जा, स्वास्थ्य और सड़क संपर्क, तीनों क्षेत्रों में एक साथ आगे बढ़ाए गए ये काम भारत-भूटान साझेदारी की व्यापकता दिखाते हैं।

इसके अलावा, भूटान के बूमथांग में जयशंकर की गतिविधियों का एक मानवीय पक्ष भी सामने आया। उन्होंने स्थानीय किसानों के लिए शुद्ध नस्ल की 43 जर्सी गायें सौंपीं। उनका कहना था कि इससे भूटान के डेयरी कार्यक्रम को मजबूती मिलेगी, दूध उत्पादन बढ़ेगा और किसानों की आय को लाभ होगा। उन्होंने वांगदुएछोलिंग महल और संग्रहालय का दौरा किया तथा कुर्जे ल्हाखांग में प्रार्थना भी की। इससे यह संकेत मिलता है कि भारत का भूटान संपर्क केवल सरकारी समझौतों तक सीमित नहीं, बल्कि कृषि, संस्कृति और जनसंपर्क तक फैला हुआ है।

साथ ही जयशंकर की यात्रा को विदेश सचिव विक्रम मिसरी की हाल की भूटान यात्रा से अलग करके नहीं देखा जा सकता। 30-31 जुलाई को मिसरी ने भूटान के विदेश सचिव पेमा लेक्तुप दोर्जी के साथ 13वीं पंचवर्षीय योजना के लिए पांचवीं भारत-भूटान विकास सहयोग वार्ता की सह-अध्यक्षता की थी। दोनों देशों ने विकास साझेदारी, ऊर्जा, व्यापार, निवेश, संपर्क और क्षेत्रीय मुद्दों पर चर्चा की थी। भूटान की 2024-29 की पंचवर्षीय योजना के लिए भारत के 10,000 करोड़ रुपये के समर्थन की प्रगति की भी समीक्षा हुई थी।

अर्थात जुलाई में विदेश सचिव स्तर पर बनी रूपरेखा के बाद सितंबर में विदेश मंत्री स्तर पर उसके राजनीतिक और व्यावहारिक आयामों को आगे बढ़ाया जा रहा है। इसे भारत की भूटान नीति में निरंतरता और संस्थागत गहराई के संकेत के रूप में देखा जा सकता है।

इस बीच नेपाल के वित्त मंत्री स्वर्णिम वाग्ले आज 17 सितंबर को नई दिल्ली पहुंचे हैं। उनकी यात्रा का मुख्य केंद्र हाल की विनाशकारी बाढ़ के बाद नेपाल के पुनर्निर्माण, आर्थिक सहयोग और ऊर्जा संबंधी जरूरतें हैं। वह भारतीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण और विदेश मंत्री जयशंकर सहित अन्य अधिकारियों से मुलाकात करेंगे।

भारत ने संकट की घड़ी में नेपाल को बिजली उपलब्ध कराने की दिशा में भी कदम उठाया है। भारत ने दिसंबर के अंत तक नेपाल को प्रतिदिन 18 घंटे के लिए 654 मेगावाट तक बिजली निर्यात की अनुमति दी है। उल्लेखनीय है कि बाढ़ से नेपाल की जलविद्युत परियोजनाओं और बुनियादी ढांचे को भारी नुकसान हुआ है।

इसके अलावा, दक्षिण दिशा में भी भारत ने समानांतर संदेश दिया है। 8 से 10 सितंबर के बीच रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने श्रीलंका की यात्रा की, जो लगभग 38 वर्षों बाद किसी भारतीय रक्षा मंत्री की श्रीलंका यात्रा थी। दोनों देशों ने रक्षा, समुद्री सुरक्षा और क्षेत्रीय स्थिरता पर सहयोग बढ़ाने की दिशा में कदम उठाए। श्रीलंका के राष्ट्रपति ने स्पष्ट किया कि श्रीलंकाई भूभाग का इस्तेमाल भारत की सुरक्षा के प्रतिकूल गतिविधियों के लिए नहीं होने दिया जाएगा।

इन घटनाओं को एक साथ रखकर देखें तो भारत की रणनीति के तीन स्पष्ट आयाम सामने आते हैं। हिमालय में विकास और संपर्क, आपदा के समय आर्थिक तथा मानवीय सहयोग और हिंद महासागर में सुरक्षा साझेदारी। देखा जाये तो भूटान में जलविद्युत और पुल, नेपाल में पुनर्निर्माण और बिजली तथा श्रीलंका में रक्षा और समुद्री सुरक्षा, ये सब भले अलग-अलग पहल दिखती हैं, लेकिन इनके पीछे क्षेत्रीय स्थिरता और भारत-केंद्रित संपर्क तंत्र को मजबूत करने की साझा दिशा दिखाई देती है।

सामरिक दृष्टि से भूटान का महत्व विशेष है। भारत-भूटान सीमा और हिमालयी क्षेत्र चीन के साथ भारत की व्यापक सुरक्षा गणना का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। ऐसे में भूटान के साथ विश्वास, संपर्क, ऊर्जा और विकास सहयोग को मजबूत करना केवल आर्थिक साझेदारी नहीं, बल्कि दीर्घकालिक सामरिक स्थिरता से भी जुड़ा है।

वहीं नेपाल भारत की उत्तरी सुरक्षा और संपर्क संरचना में महत्वपूर्ण है, जबकि श्रीलंका हिंद महासागर में समुद्री मार्गों और क्षेत्रीय सुरक्षा की दृष्टि से अहम है। इसलिए काठमांडू, थिम्पू और कोलंबो में एक साथ सक्रियता को भारत के पड़ोस को अलग-अलग द्विपक्षीय रिश्तों की बजाय एक जुड़े हुए क्षेत्रीय परिप्रेक्ष्य में देखने की कोशिश के रूप में समझा जा सकता है।

बहरहाल, ब्रिक्स में ग्लोबल साउथ की आवाज को मजबूत करने की बात करने के तुरंत बाद पड़ोस में विकास, पुनर्निर्माण, ऊर्जा, संपर्क और सुरक्षा पर जोर देकर भारत यह दिखा रहा है कि उसकी वैश्विक भूमिका का आधार केवल बड़े अंतरराष्ट्रीय मंच नहीं, बल्कि उसके आसपास का स्थिर, जुड़ा और सहयोगी क्षेत्र भी है। यही इस पूरी कूटनीतिक सक्रियता का सबसे बड़ा रणनीतिक संकेत है।

-नीरज कुमार दुबे

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