15 जून को लिखी गई थी बंटवारे की कहानी, गांधी ने इसे रोकने का किया था प्रयास... ऐसे हुआ भारत-पाकिस्तान का बंटवारा

By अनुराग गुप्ता | Aug 12, 2022

भारत अपना 75वां स्वतंत्रता दिवस मना रहा है। 15 अगस्त, 1947 को भारत पूर्णतय: अंग्रेजों की गुलामी से आजाद हो गया लेकिन भारतीय भूमि को एक जख्म भी सहना पड़ा। इस जख्म को हम भारत-पाकिस्तान विभाजन के नाम से जानते हैं। क्या है विभाजन ? क्या भूमि का बंटवारा कर देना, सीमाओं को खींच देना ही विभाजन है। नहीं, ऐसा बिल्कुल नहीं है। विभाजन वो पीड़ा है, जिसे सीमाओं के दोनों तरफ रहने वाले लोग सहते हैं। विभाजन वो पीड़ा है, जिसे अपने एक पल में पराये हो जाते हैं। विभाजन वो पीड़ा है, जिसमें बहुतों के बचपने की यादें एक पल में धुंधली होने लगती हैं और भारत-पाकिस्तान के विभाजन में तो अपनों को भी खोना पड़ा था।

बंटवारे को दी गई थी मंजूरी

14-15 अगस्त, 1947 को भारत-पाकिस्तान का बंटवारा हुआ लेकिन इस पर 2 महीने पहले 15 जून, 1947 को ही मुहर लग गई थी। जब नयी दिल्ली में कांग्रेस के अधिवेशन में बंटवारे के प्रस्ताव को मंजूरी मिली थी। इसके बाद 15 अगस्त तक भारत और पाकिस्तान दो अलग-अलग देशों को बांटने की प्रक्रिया शुरू हो गई और इसी के साथ शुरू हुआ कत्लेआम। उन दो समुदायों के बीच जिन्होंने अपना बचपन एक-साथ मिल-जुलकर जिया था और देखते ही देखते हिंदू-मुसलमान एक-दूसरे के खून के प्यासे हो गए।

गांधी और जिन्ना के बीच हुई थी बात

1857 में हुए सशक्त विद्रोह ही पहला स्वतंत्रता आंदोलन थी, उस वक्त मेरठ के छावनी से शुरू हुए विद्रोह को भारी जनसमर्थन मिल रहा था, आजादी की चाहत रखने वाले लगातार इस आंदोलन से जुड़ते जा रहे थे और आंदोलन को क्रांति में तब्दील कर दिया गया। उसी का परिणाम है कि 200 साल की गुलामी के बाद अंतत: आजादी का सपना साकार हुआ। देखते ही देखते वक्त गुजरने लगा। साल 1905 में हुए बंगाल विभाजन के बाद आजादी की लड़ाई तेज हो गई और देखते ही देखते 1906 में मुस्लिम लीग की स्थापना भी हुई।

मुसलमानों के अधिकारों की रक्षा करने के उद्देश्य से मुस्लिम लीग की स्थापना हुई थी। लेकिन फिर देखते ही देखते हिंदू और मुसलमानों के बीच तनाव बढ़ने लगा। ऐसे में 1938 में महात्मा गांधी और मोहम्मद अली जिन्ना के बीच मुसलमानों को लेकर बातचीत हुई थी और आजादी का आंदोलन भी साथ-साथ चल रहा था लेकिन 1940 में मुसलमानों के बढ़ते मुद्दों के बीच मोहम्मद अली जिन्ना ने 1940 में पहली बार मुसलमानों के लिए अलग से मुस्लिम देश बनाने की मांग उठाई थी।

भीषण कत्लेआम हुआ इसके बाद सिंध और बंगाल में हिंदुओं का कत्लेआम हुआ और फिर 1946 में कलकत्ता में भीषण दंगे हुए, जिसमें 5,000 से अधिक लोग मारे गए। इन्ही तमाम घटनाओं के बाद आजादी का सपना देखने वाले तमाम नेताओं पर विभाजन को स्वीकार करने का दबाव बनने लगा और फिर 1947 में विभाजन को मंजूरी दी गई। हालांकि महात्मा गांधी इस विभाजन को रोकना चाहते थे।

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1 अप्रैल, 1947 में महात्मा गांधी ने लुईस माउंटबेटन से मुलाकात की और विभाजन को रोकने के लिए उन्होंने मोहम्मद अली जिन्ना को प्रधानमंत्री पद की पेशकश की। ऐसे में लुईस माउंटबेटन ने जवाहरलाल नेहरू से मुलाकात की। इस दौरान जवाहरलाल नेहरू ने कहा था कि मुझे इससे कोई भी आपत्ति नहीं है लेकिन मोहम्मद अली जिन्ना को प्रधानमंत्री पद की पेशकश पहले भी की जा चुकी है। हालांकि मोहम्मद अली जिन्ना ने महात्मा गांधी के विचारों को अलग बताते हुए प्रधानमंत्री पद को एक बार फिर से ठुकरा दिया था।

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