By प्रभासाक्षी न्यूज़ डेस्क | Sep 01, 2026
नयी दिल्ली, एक सितंबर देश में स्थापित बिजली उत्पादन क्षमता 2047 तक बढ़कर 2,000 गीगावाट से अधिक होने का अनुमान है। यह मौजूदा स्तर से करीब चार गुना है। इस वृद्धि में स्वच्छ ऊर्जा, विशेष रूप से सौर ऊर्जा की महत्वपूर्ण भूमिका होगी।
यह ‘विकसित भारत’ के लक्ष्य के लिए बड़े पैमाने पर आवश्यक बुनियादी ढांचे, नवोन्मेष और नीतिगत समर्थन के महत्व को बताता है। केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण (सीईए) के चेयरपर्सन घनश्याम प्रसाद ने इस मौके पर कहा कि भारत के बिजली क्षेत्र में अभूतपूर्व वृद्धि हो रही है और रिकॉर्ड वार्षिक क्षमता वृद्धि के साथ स्वच्छ ऊर्जा की ओर तेजी से बदलाव हो रहा है। उन्होंने कहा, ‘‘लेकिन यह केवल मेगावाट जोड़ने की बात नहीं है।
हमारी वास्तविक चुनौती अब ऐसा ग्रिड और बाजार ढांचा तैयार करना है, जो बड़े पैमाने पर नवीकरणीय ऊर्जा, भंडारण और नई प्रौद्योगिकियों को समाहित कर सके तथा भविष्य की अर्थव्यवस्था के लिए भरोसा, मजबूती और किफायत सुनिश्चित करे।’’ रिपोर्ट के मुताबिक, भारत की 540 गीगावाट की स्थापित क्षमता में गैर-जीवाश्म यानी हरित ईंधन स्रोतों की हिस्सेदारी पहले ही 53 प्रतिशत पहुंच गई है। यह निर्धारित लक्ष्य से पांच साल पहले हासिल हुई है। इसमें कहा गया है कि वर्ष 2000 के बाद से बिजली की अधिकतम मांग करीब तीन गुना हो चुकी है और 2032 तक इसके 366 गीगावाट पहुंचने का अनुमान है।
यह मौजूदा स्तर से करीब 34 प्रतिशत की वृद्धि होगी। डेटा सेंटर, इलेक्ट्रिक वाहन और हरित हाइड्रोजन जैसे नए क्षेत्रों से बिजली की मांग बढ़ने की संभावना है। रिपोर्ट के अनुसार, भारत को 2030 तक नवीकरणीय ऊर्जा का उपयोग लगभग तीन गुना करना होगा और 500 गीगावाट गैर-जीवाश्म क्षमता का लक्ष्य हासिल करना होगा।
इसके साथ ही बिजली व्यवस्था की विश्वसनीयता बनाए रखना भी जरूरी होगा। ग्रिड-स्तरीय ऊर्जा भंडारण क्षमता को 2030 तक करीब 40 गुना बढ़ाकर 200 गीगावाट-घंटा करना होगा। रिपोर्ट में इसे बिजली क्षेत्र के इतिहास में बुनियादी ढांचे के स्तर पर सबसे बड़ी छलांग बताया है।
रिपोर्ट में कहा गया कि देश में स्मार्ट मीटर लगाने का काम वित्त वर्ष 2027-28 तक 25 करोड़ इकाई तक पहुंचने के रास्ते पर है। इससे करीब 90 प्रतिशत उपभोक्ता मांग का वास्तविक समय में प्रबंधन संभव होगा। साथ ही देश में औसत एटीएंडसी (तकनीकी एवं वाणिज्यिक) बिजली नुकसान पहली बार राष्ट्रीय स्तर पर 10 प्रतिशत से नीचे आने की उम्मीद है।
हालांकि, डिजिटल सुधारों से एटीएंडसी नुकसान घटकर 15 प्रतिशत हो गया है, लेकिन वितरण क्षेत्र अब भी एक बड़ी अड़चन बना हुआ है। रिपोर्ट के अनुसार, 44 गीगावाट नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता अनुबंध या वित्तपोषण से जुड़ी अड़चनों के कारण अटकी हुई है। ‘भारत इलेक्ट्रिसिटी, पावरजेन इंडिया और इंडियन यूटिलिटी वीक’ 2026 की संचालन परिषद के चेयरपर्सन भूपिंदर सिंह भल्ला ने कहा कि भारत का ऊर्जा बदलाव अब केवल विस्तार का नहीं, बल्कि बेहतर समन्वय का विषय है।
उन्होंने कहा कि अगले चरण का आकलन केवल जोड़ी गई गीगावाट क्षमता से नहीं, बल्कि इस बात से होगा कि व्यवस्था हर घंटे भरोसेमंद, हर उपभोक्ता के लिए किफायती, दबाव की स्थिति में मजबूत और बाधाओं के खिलाफ सुरक्षित है या नहीं। दिल्ली के गृह, बिजली, शहरी विकास और शिक्षा मंत्री आशीष सूद ने कहा कि दिल्ली का अनुभव बताता है कि बेहतर प्रबंधन, प्रौद्योगिकी और निवेश से शहरी बिजली व्यवस्था के प्रदर्शन में बुनियादी बदलाव लाया जा सकता है। बिहार के ऊर्जा मंत्री शैलेश कुमार ने कहा कि राज्य भारत के बदलते ऊर्जा परिदृश्य में उद्योग और अंतरराष्ट्रीय निवेशकों के साथ साझेदारी के लिए तैयार है।
रिपोर्ट में कहा गया है कि ग्रिड स्थिरता सुनिश्चित करने में कोयला आधारित बिजली संयंत्रों की भूमिका बनी रहेगी। कुल मिलाकर, रिपोर्ट ने 2030 तक भारत के बिजली क्षेत्र में 5,000 अरब डॉलर के निवेश की आवश्यकता का अनुमान लगाया है। साथ ही, डिजिटल और स्वच्छ ऊर्जा बदलाव को आगे बढ़ाने के लिए 10 लाख से अधिक नए कुशल कर्मचारियों की जरूरत होगी।
ईएनसीआईएस द्वारा आयोजित तीन दिवसीय कार्यक्रम में 40 देशों के 15,000 से अधिक पेशेवर, 250 से ज्यादा प्रदर्शक और 150 विशेषज्ञ भाग ले रहे हैं।