समानता रिपोर्ट में बेहतरी की ओर भारत

By उमेश चतुर्वेदी | Jul 16, 2025

इसे संयोग कहें या कुछ और, जिस समय भारतीय संविधान की प्रस्तावना में आपातकाल के दिनों जोड़े गए शब्दों ‘धर्मनिरपेक्ष’ और ‘समाजवादी’ को लेकर बहस हो रही है, ठीक उसी वक्त आई विश्व बैंक की रिपोर्ट ने भारतीय समाज को ज्यादा समतामूलक बताया है। विश्व बैंक की इस रिपोर्ट के अनुसार, भारत इस रैंकिंग में चोटी के चार देशों में शामिल हो गया है, जबकि दुनिया की नंबर एक और नंबर दो अर्थव्यवस्थाएं यानी अमेरिका और चीन उससे पीछे हो गए हैं। भारत से आगे स्लोवाक गणराज्य, स्लोवेनिया और बेलारूस हैं। दिलचस्प यह है कि जिस समय यह रिपोर्ट आई, ठीक उन्हीं दिनों ऑक्सफैम जैसी दूसरी एजेंसियों की ओर से आई रिपोर्टों के हवाले से भारत में बढ़ती आर्थिक आर्थिक असमानता को लेकर सवाल उठ रहे थे। ऐसे में विश्व बैंक की इस रिपोर्ट का आना और उसके समानता सूचकांक में भारत का बेहतर प्रदर्शन करना सुखद आश्चर्य का कारण तो बनता ही है।  

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गिनी सूचकांक के जरिए यह समझने की कोशिश की जाती है कि देश विशेष के घरों या व्यक्तियों के बीच आय, संपत्ति और उसके उपभोग के वितरण में कितनी समानता है। इसे शून्य से लेकर 100 के सूचकांक के स्तर पर मापा जाता है। इस सूचकांक के अनुसार, जिस देश का स्कोर शून्य है, उसका मतलब है कि उस देश में पूरी तरह समानता है यानी आय का वितरण पूरे नागरिकों में समान है। इस सूची में 100 स्कोर का अर्थ है कि एक ही व्यक्ति के पास पूरी आय और संपत्ति है और वही सबसे ज्यादा उपभोग करता है, जबकि दूसरों के पास कुछ भी नहीं है। इसका मतलब यह होता है कि उस देश विशेष में पूरी तरह असमानता व्याप्त है। मोटे तौर पर समझ सकते हैं कि जिस देश का गिनी इंडेक्स जितना ज्यादा होगा, उस देश में उतनी ही असमानता होगी।

विश्व बैंक का मानना है कि गिनी इंडेक्स में भारत की मजबूत स्थिति की वजह उसके गरीबी हटाओ उपाय हैं। जिनके जरिए ग्रामीण और शहरी दोनों ही क्षेत्रों में गरीबी को कम करने में देश लगातार आगे बढ़ रहा है। इस रिपोर्ट के अनुसार, बीते दशक में 17.1 करोड़ लोगों को अत्यधिक गरीबी से बाहर निकालने में कामयाबी हासिल की गई है। विश्व बैंक ने गरीबी के लिए रोजाना  2.15 अमेरिकी डॉलर से नीचे की आय को रखा है। इस लिहाज से भारत में 2011-12 के दौरान करीब 16.2 प्रतिशत लोग गरीबी रेखा से नीचे जी रहे थे, उनकी संख्या में साल 2022-23 में घटकर सिर्फ 2.3 प्रतिशत रह गई है। 

भारत में समानता लाने में मोदी सरकार की योजनाओं का बहुत योगदान है। इसमें नई योजनाएं हैं और पुरानी का बेहतर कार्यान्वयन भी है। इन योजनाओं के जरिए लोगों तक आर्थिक पहुंच में सुधार करना, राज्य की ओर से दिए जा रहे कल्याणकारी फायदों को जमीनी स्तर तक पहुंचाना और इस पूरी प्रक्रिया में समाज के कमज़ोर और कमजोर प्रतिनिधित्व वाले समूहों का सहयोग करना है। इसमें प्रधानमंत्री जन धन योजना को पहले स्थान पर रखा जा सकता है। जिस योजना के तहत  25 जून, 2025 तक 55.69 करोड़ से ज़्यादा लोगों के पास जन धन खाते थे। इनके जरिए ना सिर्फ लोगों को राज्य की ओर से मिलने वाली कल्याणकारी योजनाओं का फायदा सीधे पहंच रहा है, बल्कि वित्तीय कामकाज के लिए बैंकों तक इन लोगों का जुड़ाव बढ़ा है। इससे लोगों की आर्थिक स्थिति सुधर रही है। 

आधार और डिजिटल पहचान के जरिए कल्याणकारी योजनाओं की पहुंच अंतिम व्यक्ति तक सुनिश्चित हुई है। तीन जुलाई, 2025 तक देश के 142 करोड़ से अधिक लोगों के आधार कार्ड जारी किए जा चुके थे। राज्य के कल्याणकारी योजनाओं का भुगतान और सब्सिडी आदि को अब सीधे लोगों के खातों में पहुंचाया जा रहा है। इसकी वजह से देश की बचत बढ़ी है। एक आंकड़े के अनुसार, मार्च 2023 तक देश की संचयी बचत ₹3.48 लाख करोड़ तक पहुंच चुकी थी। जाहिर है कि इनमें से ज्यादातर लोगों का पैसा प्रत्यक्ष और सीधे खातों तक वित्तीय मदद पहुंच रहा है। भारत की आर्थिक और सामाजिक असमानता को कम करने में आयुष्मान भारत योजना का भी हाथ मान सकते हैं। इसके जरिए इससे कवर परिवार को सालाना 5 लाख रूपए तक का स्वास्थ्य बीमा मिल रहा है। केंद्र सरकार के आंकड़ों के अनुसार तीन जुलाई, 2025 तक देशभर में 41.34 करोड़ से अधिक आयुष्मान कार्ड जारी किए जा चुके हैं। जिसके दायरे में देश भर के 32,000 से अस्पताल शामिल हैं। इस योजना के तहत 70 वर्ष और उससे अधिक आयु के सभी नागरिकों के लिए आयुष्मान वय वंदना योजना शुरू की जा चुकी है, चाहे उनकी आय जो भी हो। आयुष्मान भारत डिजिटल मिशन की वजह से यह प्रयास और मजबूत हुआ, जिसमें लोगों को डिजिटल स्वास्थ्य सेवाओं से जोड़ने के लिए 79 करोड़ से अधिक स्वास्थ्य खाते बनाए जा चुके हैं। भारत में आर्थिक और सामाजिक असमानता को दूर करने में स्टैंड-अप इंडिया जैसी योजना के योगदान को नकारा नहीं जा सकता। देश में उद्यमिता को बढ़ावा देने के लिए स्थापित इस योजना के जरिए दलित और आदिवासी एवं महिला उद्यमियों को ग्रीनफील्ड उद्योग स्थापित करने के लिए 10 लाख से एक करोड़ रूपए तक का कर्ज दिया जा रहा है। केंद्र सरकार के आंकड़ों के अनुसार इस साल जुलाई के पहले हफ्ते तक इस योजना के तहत पूरे देश में  2.75 लाख से अधिक आवेदन स्वीकृत किए जा चुके थे। इसके तहत नव उद्यमियों को 62,807.46 करोड़ रूपए दिये जा चुके हैं। एक तरह से इस योजना के जरिए वंचित समुदाय की आर्थिक तरक्की हो रही है। आर्थिक तरक्की की राह सामाजिक विकास को भी प्रभावित करती है।

भारत में जारी प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना देश की खाद्य और सामाजिक सुरक्षा का मजबूत स्तंभ बन चुकी है। कोरोना महामारी के दौरान शुरू की गई इस योजना तहत  80.67 करोड़ लोगों को खाद्यान्न दिया जा रहा है। मुफ़्त मिल रहे खाद्यान्न का उद्देश्य है कि देश का कोई भी व्यक्ति भूखे पेट ना सोए। भारत में गरीबी कम करने में प्रधानमंत्री विश्वकर्मा योजना का भी अपना विशेष योगदान मान सकते हैं। इसके तहत पारम्‍परिक कारीगरों और शिल्पकारों बिना किसी जमानत के ऋण, टूलकिट, डिजिटल प्रशिक्षण और मार्केटिंग सहायता दिए जा रहे हैं। इस साल जुलाई के पहले सप्ताह तक इस योजना के तहत 29.95 लाख व्यक्तियों को फायदा मिल चुका है। इससे शहरी और ग्रामीण, दोनों तरह की गरीबी दूर करनें में मदद मिली है। 

इसका यह मतलब नहीं कि ऑक्सफैम की रिपोर्ट को अनदेखा कर दिया जाए। इसके  अनुसार देश में आर्थिक असमानता बहुत ज्यादा है। इस रिपोर्ट के अनुसार देश के सबसे अमीर महज एक प्रतिशत लोगों के पास देश की चालीस फीसद से ज्यादा की संपत्ति है, जबकि सबसे गरीब आधी आबादी के पास सिर्फ तीन प्रतिशत संपत्ति है। यह असमानता आय, संपत्ति और अवसरों में भी साफ तौर पर दिखती है। ऑक्सफैम की रिपोर्ट के अनुसार, भारत के शीर्ष दस प्रतिशत लोगों के पास कुल राष्ट्रीय संपत्ति का 77 फीसद % हिस्सा है। इस रिपोर्ट के अनुसार, देश में 119 अरबपति हैं। 2000 में इनकी संख्या केवल 9 थी, जो 2017 में बढ़कर 101 हो गई और अब यह बढ़कर सौ से ज्यादा हो गई है। इस रिपोर्ट के मुताबिक, देश में अरबपतियों की संपत्ति में एक दशक में करीब 10 गुना की बढ़ोतरी हुई है। उनकी कुल संपत्ति वित्त वर्ष 2018-19 के भारत के केंद्रीय बजट से भी ज्यादा रहा। साफ है कि गिनी सूचकांक में भारत की स्थिति सुधरी तो है, लेकिन ऑक्सफैम की रिपोर्ट असमानता की ओर भी ध्यान दिलाती है। इसकी ओर भी ध्यान दिया जाना होगा। तभी हम सही मायन में समतामूलक और समाजवादी समाज बन सकेंगे। क्योंकि समाजवाद का मतलब पूंजी का विकेंद्रण होता है, संकेंद्रण नहीं।

-उमेश चतुर्वेदी

लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तम्भकार हैं

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