इधर एक रक्षा समझौता कर उछल रहा पाकिस्तान, उधर मोदी की Defence Diplomacy ने बिछा दिया रणनीतिक सुरक्षा का जाल

By नीरज कुमार दुबे | Aug 12, 2026

भले ही तुर्किये, सऊदी अरब और पाकिस्तान 7 अगस्त 2026 के मक्का संयुक्त रक्षा समझौते के बाद इसे अपनी बड़ी रणनीतिक कामयाबी के तौर पर पेश कर रहे हों, लेकिन भारत ने इस बदलते शक्ति-संतुलन का जवाब किसी एक मोर्चे पर नहीं, बल्कि कई दिशाओं में पहले ही तैयार कर लिया था। सिर्फ एक साल के ही घटनाक्रमों को देखें तो फरवरी 2026 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की इजराइल यात्रा के दौरान दोनों देशों ने अपने संबंधों को “Special Strategic Partnership for Peace, Innovation and Prosperity” के स्तर तक पहुंचाया और रक्षा, सुरक्षा, अंतरिक्ष, साइबर तथा अत्याधुनिक तकनीकों में सहयोग को नई धार दी। उसी फरवरी में फ्रांस के साथ रिश्तों को “Special Global Strategic Partnership” तक पहुँचाया गया, जिसके तहत रक्षा उत्पादन, HAMMER मिसाइलों के भारत में संयुक्त निर्माण और उन्नत सैन्य तकनीक पर सहयोग बढ़ा है। इससे पहले अगस्त 2025 में फिलीपींस के साथ भारत ने Strategic Partnership स्थापित की थी, जिसके केंद्र में रक्षा, समुद्री सुरक्षा और हिंद-प्रशांत सहयोग है। साथ ही अप्रैल 2026 में दक्षिण कोरिया के साथ Special Strategic Partnership को अगले पांच वर्षों के लिए नई रणनीतिक दिशा दी गई, जबकि मई 2026 में वियतनाम के साथ Enhanced Comprehensive Strategic Partnership के तहत रक्षा खरीद, समुद्री सुरक्षा, साइबर सहयोग और हिंद-प्रशांत में समन्वय को और मजबूत किया गया। मई 2026 में ही नीदरलैंड के साथ भी संबंधों को Strategic Partnership तक ले जाने की प्रक्रिया आगे बढ़ी। यानी पाकिस्तान-तुर्किये-सऊदी अरब ने जहां एक त्रिकोण बनाया है, वहीं भारत ने इजराइल, फ्रांस, फिलीपींस, दक्षिण कोरिया, वियतनाम, नीदरलैंड और खाड़ी के महत्वपूर्ण साझेदारों के साथ अलग-अलग लेकिन आपस में जुड़े रणनीतिक रिश्तों का ऐसा व्यापक नेटवर्क खड़ा किया है, जिसमें रक्षा तकनीक, मिसाइलें, समुद्री सुरक्षा, खुफिया सहयोग और रक्षा उत्पादन सभी शामिल हैं।

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कहानी यहीं खत्म नहीं होती। भारत-इजराइल सहयोग में “होराइजन स्कैनिंग” जैसी AI आधारित व्यवस्था पर भी काम हो रहा है, जिसके जरिए भविष्य के सुरक्षा जोखिमों, सीमाई चुनौतियों और तकनीकी बदलावों का पहले से आकलन किया जा सकेगा। AI, क्वांटम कंप्यूटिंग, सेमीकंडक्टर और साइबर सुरक्षा में संयुक्त शोध का अर्थ है कि भारत अपनी अगली पीढ़ी की सुरक्षा क्षमता केवल आज के युद्ध के लिए नहीं, बल्कि कल के युद्ध की प्रकृति को ध्यान में रखकर तैयार कर रहा है। साथ ही रक्षा उत्पादन में संयुक्त शोध, तकनीकी हस्तांतरण और घरेलू सह-उत्पादन “आत्मनिर्भर भारत” को सैन्य शक्ति से जोड़ते हैं।

इसी संदर्भ में इजराइल की प्रस्तावित “Hexagon of Alliances” अवधारणा भी महत्वपूर्ण हो जाती है, जिसमें भारत, इजराइल, ग्रीस, साइप्रस और अन्य साझेदारों के बीच सुरक्षा और आर्थिक सहयोग की परिकल्पना की गई है। इसका रणनीतिक संदेश यह है कि भारत पश्चिम एशिया और भूमध्यसागर में बन रहे नए शक्ति-संतुलन को केवल देख नहीं रहा, बल्कि अपने लिए वैकल्पिक रणनीतिक नेटवर्क भी तैयार कर रहा है।

मक्का समझौते से जुड़े सवाल

अब आते हैं मक्का संयुक्त रक्षा समझौते पर। सऊदी अरब, तुर्की और पाकिस्तान ने सामूहिक प्रतिरोध का संकल्प लेते हुए कहा है कि तीनों में से किसी एक पर सशस्त्र हमला सभी पर हमला माना जाएगा। आंकड़ों के मुताबिक, तीनों देशों के पास संयुक्त रूप से करीब 14 लाख सक्रिय सैन्यकर्मी, 3,415 विमान, 6,046 टैंक, 344 नौसैनिक परिसंपत्तियां और लगभग 124.4 अरब डॉलर का वार्षिक रक्षा बजट है। सऊदी अरब पूंजी और रणनीतिक भूगोल देता है, तुर्की रक्षा उद्योग, ड्रोन, मिसाइल और नौसैनिक तकनीक देता है, जबकि पाकिस्तान मानवबल, सैन्य अनुभव और परमाणु क्षमता लेकर आता है। लेकिन इस गठजोड़ को “इस्लामिक नाटो” कह देना इसकी वास्तविक क्षमता का अंतिम प्रमाण नहीं है। सबसे बड़ा सवाल यह है कि हमला होने की स्थिति में बाकी सदस्य वास्तव में कितनी और किस प्रकार की सैन्य सहायता देने के लिए बाध्य होंगे। फिलहाल अभी कोई स्थायी केंद्रीय संयुक्त सैन्य कमान स्थापित नहीं हुई है। यानी राजनीतिक घोषणा और वास्तविक संयुक्त युद्ध क्षमता के बीच अभी लंबी दूरी है।

रणनीतिक साझेदारियों का नेटवर्क खड़ा कर रहा है हिंदुस्तान

साथ ही पाकिस्तान, तुर्किये और सऊदी अरब के बीच बने नए रक्षा समीकरण को समझने के लिए केवल तीन देशों की सैन्य ताकत देखना काफी नहीं है। असली तस्वीर यह है कि पिछले एक साल में भारत ने भी अपनी रणनीतिक साझेदारियों और रक्षा सहयोग का दायरा तेजी से बढ़ाया है। अगस्त 2025 में भारत और फिलीपींस ने अपने संबंधों को औपचारिक रूप से Strategic Partnership यानि रणनीतिक साझेदारी का दर्जा दिया। फरवरी 2026 में भारत-इजराइल संबंधों को Special Strategic Partnership for Peace, Innovation and Prosperity तक पहुँचाया गया। फरवरी में ही भारत और फ्रांस ने अपने रिश्तों को Special Global Strategic Partnership के स्तर तक पहुंचाया। मई 2026 में भारत और वियतनाम ने संबंधों को Enhanced Comprehensive Strategic Partnership में बदल दिया। यूएई के साथ जनवरी 2026 में दोनों देशों ने Strategic Defence Partnership स्थापित करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाया।

इन साझेदारियों की खासियत यह है कि ये केवल कागज पर कूटनीतिक घोषणाएं नहीं हैं। इनके पीछे रक्षा, समुद्री सुरक्षा, खुफिया सहयोग, तकनीक, साइबर सुरक्षा, अंतरिक्ष और रक्षा उत्पादन जैसे ठोस क्षेत्र जुड़े हैं। यानी पाकिस्तान-तुर्किये-सऊदी गठजोड़ अगर एक तरफ शक्ति का त्रिकोण बना रहा है, तो भारत दूसरी तरफ अलग-अलग क्षेत्रों में कई मजबूत साझेदारों का नेटवर्क खड़ा कर रहा है।

भारत-फिलीपींस रक्षा संबंध

सबसे महत्वपूर्ण उदाहरण फिलीपींस है। भारत पहले ही उसे करीब 375 मिलियन डॉलर की ब्रह्मोस मिसाइल प्रणाली बेच चुका है और फिलीपींस को इसकी अतिरिक्त प्रणालियों में भी रुचि है। इसके अलावा आकाश मिसाइल प्रणाली की संभावित बिक्री पर भी बातचीत हुई है। इसका सामरिक महत्व इसलिए बड़ा है क्योंकि फिलीपींस दक्षिण चीन सागर में चीन के साथ गंभीर समुद्री तनाव का सामना कर रहा है। भारत की मिसाइलें वहां पहुंचकर न केवल भारतीय रक्षा उद्योग की ताकत दिखाती हैं, बल्कि हिंद-प्रशांत में भारत की सुरक्षा भूमिका को भी मजबूत करती हैं।

भारत-वियतनाम रक्षा संबंध

दूसरी बड़ी सफलता वियतनाम की है। मई 2026 में दोनों देशों ने अपने संबंधों को Enhanced Comprehensive Strategic Partnership तक पहुंचाया और उसी दौरान भारत की ब्रह्मोस मिसाइल के लिए वियतनाम के साथ सौदे की आधिकारिक पुष्टि हुई। यह कदम बेहद महत्वपूर्ण है क्योंकि वियतनाम दक्षिण चीन सागर में चीन के दबाव का सामना कर रहा है। भारत के लिए इसका अर्थ है कि उसकी मिसाइल और रक्षा तकनीक हिंद-प्रशांत के एक और महत्वपूर्ण तटीय देश तक पहुंच रही है।

भारत-इंडोनेशिया रक्षा संबंध

इसके बाद इंडोनेशिया आता है। जुलाई 2026 में भारत और इंडोनेशिया ने ब्रह्मोस के साथ-साथ अस्त्र एयर-टू-एयर मिसाइल और रक्षा तकनीक से जुड़े कई समझौते किए। रिपोर्टों के अनुसार इंडोनेशिया को दो ब्रह्मोस बैटरियों की आपूर्ति का सौदा करीब 200 मिलियन डॉलर का है। इंडोनेशिया की भौगोलिक स्थिति को देखते हुए यह केवल हथियार बिक्री नहीं, बल्कि हिंद महासागर और दक्षिण-पूर्व एशिया के समुद्री सुरक्षा ढांचे में भारत की बढ़ती भूमिका का संकेत है।

भारत-आर्मेनिया रक्षा संबंध

वहीं आर्मेनिया भारत की रणनीतिक रक्षा नीति का एक अलग लेकिन बेहद महत्वपूर्ण मोर्चा है। भारत ने उसे आकाश एयर डिफेंस सिस्टम, पिनाका रॉकेट सिस्टम, स्वाति रडार और अन्य हथियार प्रणालियां उपलब्ध कराई हैं। 2022-24 के दौरान आर्मेनिया के हथियार आयात में भारत की हिस्सेदारी 43 प्रतिशत बताई गई है। यह साझेदारी इसलिए भी अहम है क्योंकि आर्मेनिया अजरबैजान के साथ संघर्ष में है और अजरबैजान के पाकिस्तान तथा तुर्किये के साथ करीबी रक्षा संबंध हैं। इसलिए भारत-आर्मेनिया रक्षा सहयोग सीधे तौर पर उस क्षेत्रीय समीकरण में नई सैन्य धुरी बनाता है, जिसमें तुर्किये और पाकिस्तान पहले से सक्रिय हैं।

भारत-यूएई रक्षा समझौता

वहीं भारत के लिए दूसरा बड़ा मोर्चा अरब जगत में उसकी बढ़ती रक्षा साझेदारी है। यूएई द्वारा ब्रह्मोस मिसाइल में रुचि इसी रणनीतिक समीकरण को बदल सकती है। यदि सौदा अंतिम रूप लेता है तो यह खाड़ी में भारत की शक्तिशाली उपस्थिति होगी। इससे तुर्की के ड्रोन और मिसाइल निर्यात को चुनौती मिल सकती है तथा यूएई को अपनी रक्षा क्षमता में नया विकल्प मिलेगा।

पाकिस्तान के लिए यह बड़ा रणनीतिक झटका बन सकता है। एक तरफ वह तुर्की और सऊदी अरब के साथ मिलकर नया रक्षा मोर्चा मजबूत कर रहा है, तो दूसरी तरफ भारत यूएई के साथ ब्रह्मोस जैसे अत्याधुनिक हथियारों के सहयोग की दिशा में आगे बढ़ रहा है। अगर यह सौदा हुआ, तो अरब सागर और ओमान की खाड़ी में पाकिस्तान की नौसैनिक रणनीति पर दबाव बढ़ सकता है। इतना ही नहीं, यूएई के बाद सऊदी अरब जैसे दूसरे खाड़ी देश भी भारत की रक्षा तकनीक में रुचि ले सकते हैं। साथ ही चूंकि यूएई फारस की खाड़ी, होर्मुज जलडमरूमध्य और अरब सागर के बीच एक अत्यंत महत्वपूर्ण सामरिक स्थिति में है। ऐसे में भारतीय लंबी दूरी की सटीक मारक क्षमता यूएई को तुर्किये या पाकिस्तान पर निर्भर हुए बिना अपनी सुरक्षा क्षमता बढ़ाने का विकल्प दे सकती है।

यही वह बिंदु है जहां पाकिस्तान-तुर्किये-सऊदी गठजोड़ की काट साफ दिखाई देती है। सऊदी अरब को पाकिस्तान से सैन्य मानवबल और परमाणु प्रतिरोध की छाया मिलती है, तुर्किये से ड्रोन, मिसाइल और रक्षा उद्योग की ताकत मिलती है। लेकिन भारत यूएई जैसे खाड़ी देश को अलग रक्षा विकल्प दे सकता है। दूसरी तरफ फिलीपींस, वियतनाम और इंडोनेशिया में भारतीय मिसाइलों की मौजूदगी हिंद-प्रशांत में भारत की समुद्री पहुंच बढ़ाती है, जबकि आर्मेनिया के साथ सहयोग तुर्किये-पाकिस्तान समर्थित क्षेत्रीय समीकरण को दूसरी दिशा से चुनौती देता है।

इसलिए पाकिस्तान-तुर्किये-सऊदी गठजोड़ का जवाब भारत किसी एक नए सैन्य गठबंधन से देने की बजाय कई दिशाओं में दे रहा है। इजराइल से अत्याधुनिक तकनीक, फ्रांस से उच्चस्तरीय रक्षा औद्योगिक सहयोग, यूएई से खाड़ी में रणनीतिक पहुंच और फिलीपींस-वियतनाम-इंडोनेशिया के जरिए हिंद-प्रशांत में मिसाइल तथा समुद्री सुरक्षा नेटवर्क। यही भारत की असली रणनीतिक बढ़त है। यानि एक गठजोड़ के सामने दूसरा गठजोड़ खड़ा करने की बजाय भारत ने साझेदारियों का ऐसा जाल बिछाना शुरू किया है जिसमें पाकिस्तान, तुर्किये और सऊदी अरब को हर दिशा में अलग-अलग रणनीतिक समीकरणों का सामना करना पड़ेगा। बहरहाल, एक चीज स्पष्ट है कि पाकिस्तान अगर डाल-डाल चलने की कोशिश कर रहा है तो उसे पता होना चाहिए कि भारत पहले से पात-पात पर अपनी रणनीतिक मौजूदगी दर्ज करा रहा है।

-नीरज कुमार दुबे

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