अमरीकी दोस्ती में बांह मरोडऩे की कोशिश बर्दाश्त नहीं करेगा भारत

By योगेंद्र योगी | Mar 30, 2024

दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल के मामले में अमरीका को उसी के लहजे में सख्त जवाब देकर भारत ने बता दिया है भारत के अंदरूनी मामलों में किसी भी देश का हस्तक्षेप बर्दाश्त नहीं किया जाएगा, चाहे वे मित्र देश ही क्यों न हों। कड़ा जवाब देकर भारत ने अमरीका को यह भी समझा दिया कि दोस्ती की आड़ में बांह मरोडऩे का प्रयास दोनों देशों के रिश्तों में दरार डाल सकता है। 


ऐसा करने पर भारत-अमरीका के रिश्तों पर फर्क पड़ सकता है। केजरीवाल की गिरफ्तारी पर की गईं कुछ टिप्पणियों के विरोध में अमेरिका के एक वरिष्ठ राजनयिक को भारत द्वारा तलब किये जाने पर वाशिंगटन ने दोहराया था कि वह निष्पक्ष, पारदर्शी और समयबद्ध कानूनी प्रक्रियाओं को प्रोत्साहित करता है। अमेरिका के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता मैथ्यू मिलर ने कहा था मैं किसी निजी राजनयिक बातचीत के बारे में बात नहीं करने जा रहा हूं, लेकिन निश्चित रूप से, हमने सार्वजनिक रूप से जो कहा है, वही मैंने यहां से कहा है कि हम निष्पक्ष, पारदर्शी, समयबद्ध कानूनी प्रक्रियाओं को प्रोत्साहित करते हैं। हमें नहीं लगता कि किसी को इस पर आपत्ति होनी चाहिए। यही बात हम निजी तौर पर स्पष्ट कर देंगे। विदेश मंत्रालय के अधिकारियों ने अमेरिकी दूतावास की कार्यवाहक उपप्रमुख ग्लोरिया बरबेना को तलब किया था, अमेरिकी विदेश विभाग की टिप्पणी को अनुचित करार देते हुए कहा था कि उसे अपनी स्वतंत्र और मजबूत लोकतांत्रिक संस्थाओं पर गर्व है और वह इन्हें किसी भी प्रकार के अनावश्यक बाहरी प्रभाव से बचाने के लिए प्रतिबद्ध है। विदेश मंत्रालय ने इस मामले में अमेरिकी डिप्लोमैट ग्लोरिया बारबेना को तलब किया था। मंत्रालय ने कहा था कि भारत में कानूनी कार्रवाई पर अमेरिकी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता का बयान गलत है। कूटनीति में उम्मीद की जाती है कि देश एक दूसरे के आंतरिक मसलों और संप्रभुता का सम्मान करेंगे। अगर दो देश लोकतांत्रिक हों तो इसकी उम्मीद और बढ़ जाती है नहीं तो अव्यवस्था की स्थिति बन सकती है। गौरतलब है कि प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने आबकारी नीति घोटाले से जुड़े धन शोधन मामले में केजरीवाल को गिरफ्तार किया है।

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केजरीवाल मुद्दे पर अमेरिका की तरफ से आए दूसरे बयान पर विदेश मंत्रालय ने कहा कि अमेरिका के बयान पर भारत पहले ही आपत्ति जता चुका है। उसका ताजा बयान अवांछनीय है। इसे स्वीकार नहीं किया जा सकता। इसी मुद्दे पर भारत ने अमरीका के साथ ही जर्मनी को करारा जवाब दिया। विदेश मंत्रालय ने कहा कि भारत में न्याय प्रणाली स्वतंत्र है। भारतीय विदेश मंत्रालय ने नई दिल्ली स्थित जर्मन दूतावास मिशन के उप प्रमुख जॉर्ज एन्ज़वीलर को तलब किया। भारत ने जर्मनी के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता की टिप्पणी को भारत के आंतरिक मामलों में दखल बताते हुए अपना कड़ा विरोध दर्ज किया। भारतीय विदेश मंत्रालय ने बयान जारी कर कहा कि हम ऐसी टिप्पणियों को हमारी न्यायिक प्रक्रिया में दखल और हमारी न्यायपालिका की स्वतंत्रता को कमजोर करने के रूप में देखते हैं।   


यह पहला मौका नहीं है जब भारत ने अमरीका की सुनने से इंकार कर दिया। इससे पहले अमरीका निवासी खालिस्तानी आतंकी गुरवंत सिंह पन्नू के मामले में भी भारत ने अमरीका को सख्त लहजे में समझाते हुए दर्शा दिया था कि भारत विरोधी कार्रवाई को किसी भी सूरत में सहन नहीं किया जा जाएगा। भारत की दोस्ती को अमरीका कमजोरी नहीं समझे। अमेरिकी अफसरों ने दो भारतीय नागरिकों पर गुरपतवंत सिंह पन्नू की हत्या की विफल साजिश में शामिल होने का आरोप लगाया था। निखिल गुप्ता और एक अनाम सरकारी अधिकारी पर यह आरोप लगाए थे। अमेरिका का ये भी दावा है कि यही आरोपी हरदीप सिंह निज्जर के मर्डर की प्लानिंग में भी शामिल थे। इसको लेकर न्याय विभाग ने मैनहैटन अदालत में अभियोग (आरोप पत्र) दर्ज किया था। भारत ने इस मुद्दे पर करारा जवाब देते हुए अमरीका को अपनी जमीन से भारत विरोधी गतिविधियां संचालित करवाने का आरोप लगाया था।   


इसी तरह भारत ने आतंकी हरदीप सिंह निज्जर की हत्या के मामले में कनाड़ा और अमरीका को कड़ा जवाब दिया था। हालांकि इस मुद्दे पर अमरीका ने सीधे कोई हस्तक्षेप नहीं किया। भारत ने कनाडा के प्रधानमंत्री जस्टिन टूडो के निज्जर की हत्या करवाने के आरोपों का खारिज करते हुए करीब दो दर्जन से ज्यादा डिप्लोमट को बाहर का रास्ता दिखाते हुए अपनी बदली हुई विदेश नीति से वाकिफ भी करा दिया था। भारत के ऐसे सख्त रवैये से कनाडा भौचक्का रह गया। टूडो ने सपने में भी नहीं सोचा होगा कि भारत ऐसा रवैया भी अख्तियार कर सकता है। भारत ने कनाडा पर खालिस्तानी आतंकियो को पनाह देने का आरोप लगाया था। भारत पर लगाए निज्जर की हत्या के आरोपों का कनाडा साबित नहीं कर सका। केवल सिक्ख वोट बैंक पाने के लिए कनाड़ा ने भारत पर यह आरोप लगाया था।   


इसी तरह भारत ने अंदरूनी मामलों में हस्तक्षेप को लेकर तुर्की की भी खिचाई की थी। कश्मीर के मुद्दे पर भारत-तुर्कीये एक बार फिर से आमने-सामने आ गए थे। संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद के 55वें सत्र में तुर्किये ने कश्मीर में मानवाधिकारों को लेकर सवाल उठाया और भारत को घेरने का प्रयास किया था। हालांकि, राइट टू रिप्लाई के तहत संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद में भारत की प्रथम सचिव अनुपमा सिंह ने तुर्किये को जवाब देते हुए कहा कि हमें दुख है कि तुर्किये ने भारत के आंतरिक मामले पर टिप्पणी की। उम्मीद है कि वह आगे इस तरह के गैर-जरूरी बयान से बचेगा। वैसे तुर्किये द्वारा कश्मीर का मुद्दा उठाना कोई पहला वाक्या नहीं है। तुर्किये पहले भी कई बार कश्मीर का राग अलाप चुका है। भारत ने हर बार तुर्की को इसी तरह जवाब दिया है।   


आश्चर्य की बात यह है कि अमरीका की पूरे विश्व में अब कोई नहीं सुन रहा है। इजराइल ने भी अमेरिका को अनसुना करके हमास से युद्धविराम करने से साफ इंकार कर दिया। इसी तरह यूक्रेन युद्ध के मामले में अमरीका की नीति विफल साबित हुई। फ्रांस ने साफ कह दिया कि वह अमरीका का पिछलग्गू नहीं बनेगा। हालात यह है कि अमरीका अपना घर संभालने के बजाए दूसरे मुल्कों में टांड अड़ाने से बाज नहीं आ रहा है।   


अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन के प्रवक्ता जेम्स सिंगर ने एक बयान में कहा था कि पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प एक और 6 चाहते हैं। यह बयान ट्रंप के द्वारा शनिवार को दिए गए बयान के बाद आया है, जिसमें ट्रंप ने खून-खराबे का जिक्र किया था। इस बयान की निंदा करते हुए प्रवक्ता ने इस बात पर जोर दिया कि अमेरिका के नागरिक ट्रंप को इस नवंबर में एक और चुनावी शिकस्त देने जा रहे हैं क्योंकि वे उनके उग्रवाद, हिंसा के प्रति लगाव और बदला लेने की उनकी प्यास को लोग खारिज करते रहेंगे। डोनाल्ड ट्रंप ने उस वक्त बयान दिया, जब उन्होंने अमेरिका के बाहर बनी कारों पर 100 प्रतिशत टैरिफ का वादा किया। ओहियो के डेटन के पास एक रैली को संबोधित करते हुए, ट्रम्प ने कहा कि हम लाइन में आने वाली हर एक कार पर 100 फीसदी टैरिफ लगाने जा रहे हैं। अगर मैं नहीं चुना गया, तो देश में खून-खराबा होगा। अमरीका को यह समझना होगा कि बदली वैश्विक परिस्थितियों में भारत ग्लोबल साउथ का नेतृत्व कर रहा है। यही वजह है कि भारत इंडिया फस्र्ट की नीति के तहत विदेश नीति पर अमल कर रहा है। अमरीका की मजबूरी चीन के मामले मे भारत को साथ लेने की है। भारत में ही चीन का मुकाबला करने की काबलियत है। इसके अलावा अमरीका और भारत के व्यापारिक रिश्ते लगातार बढ़ रहे हैं। ऐसे में घरेलू मामलों में अमरीका या किसी दूसरे पश्चिमी देशों की किसी तरह की टीका-टिप्पणी को भारत बर्दाश्त नहीं करेगा।


- योगेन्द्र योगी 

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