By अभिनय आकाश | Dec 31, 2025
जब हाशिये पर स्थित देश केंद्र की भाषा बोलने लगते हैं, तो वैश्विक शक्ति संतुलन में बदलाव आता है। 2026 वह वर्ष है जब भारत 1 जनवरी से ब्रिक्स (दस देशों का एक अंतर-सरकारी संगठन: ब्राजील, चीन, मिस्र, इथियोपिया, भारत, इंडोनेशिया, ईरान, रूस, दक्षिण अफ्रीका और संयुक्त अरब अमीरात) की अध्यक्षता ग्रहण करेगा। औपचारिक रूप से, भारत एक वर्ष के लिए, यानी 31 दिसंबर, 2026 तक, इस जिम्मेदारी को निभाएगा। हालांकि, इसे केवल एक कैलेंडर-आधारित जिम्मेदारी के रूप में देखना संकीर्ण सोच होगी। भारत की अध्यक्षता केवल एक नियमित राजनयिक प्रक्रिया नहीं है; यह सभ्यतागत और भू-राजनीतिक नेतृत्व में एक महत्वपूर्ण बदलाव का प्रतीक है। भारत इस जिम्मेदारी को ऐसे समय में ग्रहण कर रहा है जब वह वैश्विक शक्ति के खेल में अब केवल एक दर्शक नहीं है, बल्कि नियम बनाने की स्थिति में है।
वो दौर बीत चुका है जब पश्चिमी मीडिया ब्रिक्स को "एक ढीला-ढाला समूह" कहकर उपहास उड़ाता था। अब यह समूह केवल ब्राजील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका तक सीमित नहीं है। सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, ईरान और मिस्र जैसे देशों के शामिल होने से यह पेट्रो-डॉलर प्रणाली के विकल्प के रूप में उभर कर सामने आया है। इस समूह ने 2024 में विश्व के लगभग 42 प्रतिशत तेल का उत्पादन किया। आज, ब्रिक्स वैश्विक जीडीपी में लगभग 40 प्रतिशत का योगदान देता है, जो पश्चिमी अभिजात वर्ग के समूह जी-7 से कहीं अधिक है। ब्रिक्स समूह में विश्व की आधी से अधिक आबादी रहती है। यह ऊर्जा, कच्चा माल, विनिर्माण और उपभोक्ता बाजार - इन चार क्षेत्रों में निर्णायक भूमिका निभाता है। इसके अलावा, ब्रिक्स देशों के पास विश्व के स्वर्ण भंडार का 20 प्रतिशत हिस्सा है।
भारत ब्रिक्स अध्यक्षता में समूह को एक नया स्वरूप देने का प्रयास करेगा। वैश्विक दक्षिण के मुद्दों को महत्व देने, आर्थिक सहयोग बढ़ाने और व्यापार और वित्तीय प्रणाली में स्थानीयकरण के उपाय अपनाने की दिशा में भारत सक्रिय रहेगा। इससे न सिर्फ ब्रिक्स का वैश्विक प्रभाव बढ़ेगा बल्कि भारत की विदेश नीति को भी मजबूती मिलेगी।